कितना मुश्किल है NEET एग्जाम कराना, कहां हो रही NTA से गलती, नितिन विजय सर ने बता दिया सॉल्यूशन
NEET 2026 पेपर लीक विवाद पर एजुकेटर नितिन विजय ने बताया कि 23 लाख बच्चों के लिए 5,500 सेंटरों पर पेन-पेपर मोड में एग्जाम कराना बहुत बड़ा चैलेंज है. साथ ही उन्होंने बताया कि अगर यह एग्जाम कंप्यूटर बेस्ड हो जाए, तो पेपर लीक नहीं होगा.
NEET (UG) 2026 परीक्षा रद्द होने के बाद देशभर में एजुकेशन सिस्टम और परीक्षा सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने 3 मई को आयोजित हुई परीक्षा को पेपर लीक की चर्चाओं के बीच कैंसिल कर दिया. करीब 23 लाख छात्रों की इस परीक्षा में शामिल होने की तैयारी थी, लेकिन पेपर परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने से पहले ही लीक होने की बात सामने आने के बाद दोबारा एग्जाम कराने का फैसला लिया गया.
इसी मुद्दे पर एजुकेटर और मोशन एजुकेशन के फाउंडर नितिन विजय ने बताया कि आखिर NEET जैसी बड़ी परीक्षा को सुरक्षित तरीके से कराना इतना मुश्किल क्यों होता है. उन्होंने बताया कि पेन और पेपर मोड में 5,500 सेंटरों और 550 शहरों में परीक्षा कराना बहुत बड़ी चुनौती है. साथ ही उन्होंने NTA की कमियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि NEET को भी JEE की तरह कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट बनाया जाए, ताकि पेपर लीक और नकल जैसी घटनाओं पर काफी हद तक रोक लगाई जा सके.
पेपर लीक आखिर होता कैसे है?
नितिन विजय के अनुसार, पेन और पेपर मोड में परीक्षा कराने का सबसे बड़ा खतरा यही है कि पेपर कई लेवल से होकर गुजरता है. सबसे पहले पेपर प्रिंटिंग प्रेस तक जाता है. वहां कई कर्मचारी उस पेपर को देखते हैं. इसके बाद पेपर अलग-अलग शहरों और सेंटरों तक भेजा जाता है. यानी लाखों कॉपियों का मूवमेंट होता है. उन्होंने कहा कि जब कोई पेपर 550 शहरों और हजारों सेंटरों तक पहुंचाया जाता है, तब उसके लीक होने की संभावना अपने आप बढ़ जाती है. अगर सिस्टम में शामिल किसी भी लेवल पर कोई व्यक्ति लालच में आ जाए, तो वह पेपर बाहर पहुंच सकता है. यही वजह है कि बार-बार पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं.
पेपर कंडक्ट कराने में कितने लोग शामिल?
पेपर कंडक्ट कराने में लगभग 2 लाख लोग किसी न किसी रूप में शामिल होते हैं. मान लीजिए कि इनमें से कोई एक भी शख्स लालच में आ गया, तो पेपर लीक होना तय है. इसलिए बार बार इस एग्जाम में ऐसी घटनाएं होती हैं.
क्या है सॉल्यूशन?
नितिन विजय ने सबसे बड़ा समाधान परीक्षा मोड बदलने को बताया. उन्होंने कहा कि जिस तरह JEE परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT) मोड में होती है, उसी तरह NEET को भी कंप्यूटर आधारित बना देना चाहिए. उनके मुताबिक, अगर किसी रास्ते पर बार-बार दुर्घटना हो रही हो, तो रास्ता बदलना जरूरी हो जाता है. पेन और पेपर मोड में पेपर पहले प्रिंटिंग प्रेस में जाता है, फिर वहां से अलग-अलग सेंटरों तक पहुंचता है. इस पूरी प्रक्रिया में लीक होने के कई मौके बन जाते हैं. लेकिन कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट में यह खतरा काफी हद तक कम हो सकता है, क्योंकि सवाल डिजिटली सीधे सिस्टम में आते हैं.
क्यों कंप्यूटर बेस्ड नहीं होता NEET का एग्जाम?
हालांकि, अक्सर यह दलील दी जाती है कि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को कंप्यूटर की जानकारी कम होती है. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि अब सरकारी स्कूलों और कॉलेजों तक भी कंप्यूटर और इंटरनेट पहुंच चुका है. ऐसे में छात्रों को कंप्यूटर एक्सपोजर देना कोई मुश्किल काम नहीं है.
एक सेंटर पर चीटिंग होने पर क्या होता है?
नितिन विजय ने बताया कि पहले भी कई बार कुछ परीक्षा केंद्रों पर चीटिंग की घटनाएं सामने आई हैं. ऐसे मामलों में NTA उस सेंटर की परीक्षा रद्द करके दोबारा परीक्षा करवाती थी और नॉर्मलाइजेशन ऑफ परसेंटाइल के जरिए रिजल्ट जारी कर देती थी. लेकिन इस बार मामला अलग है. इस बार किसी एक सेंटर पर नकल नहीं हुई, बल्कि पेपर परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने से पहले ही लीक हो गया.
नकल माफिया इतने मजबूत क्यों हैं?
मेडिकल सीट पाने की होड़ इतनी ज्यादा है कि कई छात्र और परिवार लाखों रुपये खर्च करने को तैयार रहते हैं. उन्होंने बताया कि जिन छात्रों की रैंक कम आती है, वे एमबीबीएस सीट पाने के लिए भारी रकम देने को मजबूर हो जाते हैं. यही बात नकल माफिया अच्छी तरह समझते हैं. ऐसे में वे उन लोगों को निशाना बनाते हैं, जो परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े होते हैं. क्योंकि परीक्षा संचालन में लगभग 2 लाख लोग शामिल रहते हैं, इसलिए किसी कमजोर कड़ी तक पहुंचना माफिया के लिए मुश्किल नहीं होता.लालच और कमजोर निगरानी मिलकर इस पूरे नेटवर्क को मजबूत बना देते हैं.
NTA से कहां हो रही है सबसे बड़ी गलती?
एक्सपर्ट ने बताया कि सबसे बड़ी कमी सिस्टम के इंट्रोस्पेक्शन यानी आत्मविश्लेषण में है. उन्होंने कहा कि आज भी कई फैसले पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर और पुराने तरीकों को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं. जबकि समय बदल चुका है. आज देश में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से कहीं ज्यादा बेहतर है. स्कूलों और कॉलेजों तक कंप्यूटर और इंटरनेट की पहुंच बढ़ चुकी है. लेकिन परीक्षा सिस्टम अभी भी पुराने मॉडल पर चल रहा है. उनका मानना है कि NTA को पुराने ट्रेंड्स और लगातार हो रही घटनाओं का गंभीर विश्लेषण करना चाहिए. अगर एक ही समस्या बार-बार सामने आ रही है, तो सिर्फ सुरक्षा बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरी व्यवस्था को बदलने की जरूरत है.
क्या हर साल छोटे लेवल पर लीक होता रहा है?
नितिन विजय ने एक और बड़ा सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि इस बार मामला बड़े स्तर पर सामने आ गया, इसलिए परीक्षा दोबारा करवाई जा रही है. लेकिन यह भी संभव है कि हर साल छोटे स्तर पर ऐसी घटनाएं होती रही हों और सिस्टम उन्हें पकड़ ही न पाया हो. यही वजह है कि लड़ाई सिर्फ पेपर लीक रोकने की नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसा सिस्टम तैयार करने की होनी चाहिए जिसमें परीक्षा निष्पक्ष तरीके से करवाई जा सके.
UPSC में क्यों नहीं होता पेपर लीक?
इस सवाल पर नितिन विजय ने कहा कि UPSC का स्ट्रक्चर अलग है. UPSC में उम्मीदवारों की संख्या NEET के मुकाबले काफी कम होती है. साथ ही वहां मल्टीपल लेवल पर परीक्षा होती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर परीक्षा सिर्फ 500 सेंटरों पर हो रही हो, तो उसे कंट्रोल करना आसान होता है. लेकिन जब वही परीक्षा 5,500 सेंटरों पर हो, तो निगरानी और सुरक्षा की चुनौती कई गुना बढ़ जाती है. यानी छात्रों की संख्या और सेंटरों की संख्या जितनी बढ़ती है, पेपर लीक की संभावना भी उतनी बढ़ती जाती है.
सरकार का रुख कैसा होना चाहिए?
सरकार और NTA दोनों को अब परीक्षा मोड पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. साथ ही पेपर लीक में शामिल लोगों के खिलाफ बेहद सख्त कार्रवाई जरूरी है. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाने चाहिए ताकि दोषियों को जल्दी सजा मिल सके और समाज में मजबूत मैसेज जाए कि इस तरह के अपराध करके बच निकलना आसान नहीं होगा.
बच्चे कैसे रखें खुद को मोटिवेट?
NEET जैसी परीक्षा सिर्फ एक एग्जाम नहीं, बल्कि लाखों बच्चों का सपना होती है. कई छात्र सालों तक डॉक्टर बनने के लिए मेहनत करते हैं. ऐसे में परीक्षा रद्द होने के बाद बच्चों की मानसिक स्थिति को समझना बेहद जरूरी है. नितिन विजय ने कहा कि जिन बच्चों को भरोसा था कि उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज मिल जाएगा, उनके लिए यह झटका बहुत बड़ा है. उन्होंने छात्रों को समझाते हुए कहा कि जीवन में कठिन परिस्थितियां आती रहती हैं. अगर भविष्य में कोई डॉक्टर पूरी कोशिश के बाद भी किसी मरीज की जान न बचा पाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह अगले मरीज के इलाज में मेहनत करना छोड़ देगा. उसी तरह छात्रों को भी अगली परीक्षा के लिए फिर से अपना बेस्ट देना होगा.
पेरेंट्स को क्या करना चाहिए?
नितिन विजय ने खासतौर पर पेरेंट्स से अपील की कि इस समय बच्चों का मनोबल टूटने न दें. अभी बच्चे अपने पेरेंट्स को बेहद आशा के साथ देख रहे हैं. अगर माता-पिता की आंखों में उन्हें निराशा नजर आएगी, तो वह टूट जाएंगे. अभी बच्चों का मनोबल बढ़ाने का समय है. उन्हें बोलें की जीवन में ऐसी विपदाएं बहुत आती हैं. तुमने पहली लड़ाई भी बहुत शिद्दत के साथ लड़ी और हमें तुम पर गर्व है. हम जानते हैं कि दूसरी लड़ाई अपेक्षित नहीं थी पर हमें दोबारा यह लड़ाई लड़नी है. पूरा परिवार तुम्हारे साथ खड़ा है.




