अपनों से ही हारती है कांग्रेस! मिडिल ईस्ट संकट पर 2 बड़े कांग्रेसियों का हाथ सरकार के साथ
मिडिल ईस्ट वार पर कांग्रेस में मतभेद तेज. थरूर और तिवारी सरकार के साथ, जबकि नेतृत्व सवालों में. जानिए भारत की विदेश नीति पर क्यों बढ़ी सियासी खींचतान.
पश्चिम एशिया में जारी मिडिल ईस्ट युद्ध ने जहां वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था को हिला दिया है, वहीं इसका असर अब भारत की सियासत पर भी दिखने लगा है. कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे पर गहरे मतभेद सामने आए हैं. एक तरफ पार्टी नेतृत्व सरकार के रुख पर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी ओर मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे वरिष्ठ नेता केंद्र की रणनीतिक नीति का समर्थन कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मिडिल ईस्ट संकट कांग्रेस के भीतर नई दरार पैदा कर रहा है?
क्या मिडिल ईस्ट वार पर कांग्रेस दो खेमों में बंट गई?
मौजूदा हालात में कांग्रेस के भीतर साफ तौर पर दो अलग-अलग दृष्टिकोण नजर आ रहे हैं. मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और जयराम रमेश जैसे नेता जहां सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं मनीष तिवारी और शशि थरूर खुले तौर पर सरकार के रुख का समर्थन कर रहे हैं. यह स्थिति कांग्रेस के भीतर एक लाइन की कमी को दिखाती है, जहां पार्टी का आधिकारिक स्टैंड और वरिष्ठ नेताओं की व्यक्तिगत राय टकरा रही है.
क्यों मनीष तिवारी और शशि थरूर सरकार के साथ हुए खड़े?
मनीष तिवारी का मानना है कि मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष बेहद जटिल है और इसमें भारत का सीधा हित सीमित है. उनके अनुसार, भारत को इस तरह के बहुस्तरीय युद्ध में सतर्क रहना चाहिए और किसी एक पक्ष में खुलकर नहीं जाना चाहिए.
वहीं, शशि थरूर ने इसे जिम्मेदार कूटनीति करार दिया है. उनका तर्क है कि भारत की चुप्पी को कमजोरी नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन के तौर पर देखा जाना चाहिए. थरूर ने यह भी कहा कि केवल नैतिक बयानबाजी से अंतरराष्ट्रीय राजनीति नहीं चलती, बल्कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं.
पार्टी नेतृत्व सरकार की नीति पर क्यों उठा रहा सवाल?
दूसरी ओर, कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि भारत को इस मुद्दे पर ज्यादा स्पष्ट और नैतिक रुख अपनाना चाहिए. राहुल गांधी ने एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों का खुलकर विरोध करने की बात कही है.
मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य नेताओं का तर्क है कि अगर भारत लगातार चुप रहता है, तो उसकी पारंपरिक विदेश नीति - जो शांति, संवाद और संतुलन पर आधारित रही है, कमजोर पड़ सकती है. यानी पार्टी का एक धड़ा इसे नैतिक जिम्मेदारी का मुद्दा मान रहा है, जबकि दूसरा धड़ा रणनीतिक मजबूरी के नजरिए से देख रहा है.
भारत सरकार का रुख क्या है और उस पर विवाद क्यों?
भारत सरकार ने अब तक संतुलित रुख अपनाया है. उसने एक तरफ ईरान के हमलों की निंदा की है, वहीं दूसरी ओर बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया है. साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम ऊर्जा मार्ग की सुरक्षा को लेकर भी सक्रिय कूटनीतिक प्रयास जारी हैं.
सरकार का फोकस साफ है ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता. लेकिन कांग्रेस के भीतर इसी संतुलन को लेकर मतभेद पैदा हो गया है, कुछ इसे मजबूती मानते हैं, तो कुछ इसे अस्पष्टता.
क्या पहले भी विदेश नीति पर कांग्रेस में दिखी है ऐसी दरार?
यह पहला मौका नहीं है, जब कांग्रेस के भीतर विदेश नीति को लेकर मतभेद सामने आए हों. इससे पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी शशि थरूर के रुख को लेकर पार्टी के अंदर असहमति दिखी थी.
बार-बार सामने आ रही ये दरारें इस बात का संकेत हैं कि कांग्रेस अभी भी एक “एकीकृत विदेश नीति नैरेटिव” तय करने में संघर्ष कर रही है.
क्या मिडिल ईस्ट संकट कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है?
मिडिल ईस्ट संकट ने कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है. एक तरफ उसे सरकार को घेरना है, वहीं दूसरी ओर अपने ही नेताओं के अलग रुख को संतुलित करना है.
अगर पार्टी एक स्पष्ट और एकजुट स्टैंड नहीं बना पाती, तो इसका असर उसकी विश्वसनीयता पर पड़ सकता है. खासकर ऐसे समय में जब विदेश नीति जैसे मुद्दे पर राष्ट्रीय एकता और स्पष्टता की अपेक्षा ज्यादा होती है.
रणनीति बनाम नैतिकता, कांग्रेस किस ओर जाएगी?
मिडिल ईस्ट वार ने कांग्रेस के भीतर “रणनीति बनाम नैतिकता” की बहस को खुलकर सामने ला दिया है. मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे नेता जहां व्यावहारिक और रणनीतिक सोच की वकालत कर रहे हैं, वहीं पार्टी नेतृत्व नैतिक और स्पष्ट रुख की मांग कर रहा है.
अब देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस इस आंतरिक मतभेद को कैसे सुलझाती है. क्योंकि आने वाले समय में यही तय करेगा कि पार्टी राष्ट्रीय और वैश्विक मुद्दों पर कितनी प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभा पाती है.




