Tiger Shroff Siring Case: सभी आरोपियों पर लगा MCOCA, कितना खतरनाक है ये कानून, कब और क्यों लाया गया, कांपता था अंडरवर्ल्ड
टाइगर श्रॉफ की कार पर फायरिंग वाले मामले में गिरफ्तार आरोपियों पर मकोका लगाए जाने के बाद महाराष्ट्र का यह सख्त कानून चर्चा में है. साल 1999 में संगठित अपराध पर लगाम लगाने के लिए लाए गए इस कानून का इस्तेमाल अंडरवर्ल्ड, तेलगी स्टांप पेपर घोटाले और जेडे हत्याकांड जैसे चर्चित मामलों में भी हुआ. जानिए मकोका कब और किन परिस्थितियों में लगाया जाता है.
महाराष्ट्र में बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर फायरिंग के मामले में सभी आरोपियों पर मकोका लगाया गया है. महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट यानी MCOCA संगठित अपराध और आपराधिक गिरोहों पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया था. साल 1999 में लागू हुए इस कानून में जमानत से लेकर सजा तक के कड़े प्रावधान हैं. आइए जानते हैं कि मकोका कब आया, इसे किन परिस्थितियों में लगाया जाता है और अब तक किन चर्चित मामलों में इसका इस्तेमाल हुआ है.
मकोका यानी महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट, 1999 को महाराष्ट्र में संगठित अपराध पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से लाया गया था. इसे पहली बार 24 फरवरी 1999 को अध्यादेश के रूप में पेश किया गया. इसके बाद 23 अप्रैल 1999 को तत्कालीन राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और 24 अप्रैल 1999 को इसे आधिकारिक गजट में प्रकाशित किया गया. इस कानून को लाने में महाराष्ट्र के इस समय के उप मुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे की अहम भूमिका है.
कब आया था मकोका?
दरअसल, 1980 और 1990 के दशक में मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई इलाकों में अंडरवर्ल्ड का प्रभाव बढ़ रहा था. दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन और अरुण गवली जैसे गैंगस्टरों के गिरोहों पर जबरन वसूली, सुपारी लेकर हत्या, गैंगवार और तस्करी जैसे अपराधों में शामिल होने के आरोप लगते रहे. पुलिस और जांच एजेंसियों के सामने इन गिरोहों के खिलाफ ठोस सबूत जुटाने और गवाहों को सुरक्षा देने जैसी चुनौतियां थीं. इसी बैकग्राउंड में संगठित अपराध से निपटने के लिए मकोका बनाया गया.
किन परिस्थितियों में लगाया जाता है मकोका?
मकोका सामान्य आपराधिक मामलों के लिए नहीं, बल्कि कानून में निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले संगठित अपराध के मामलों में लगाया जाता है. इसके तहत किसी गिरोह या सिंडिकेट की आपराधिक गतिविधियों, उनके उद्देश्य और आरोपियों की भूमिका की जांच की जाती है. कानून के प्रावधानों के अनुसार, संगठित अपराध से जुड़े मामलों में लगातार आपराधिक गतिविधियों और निर्धारित अवधि में एक से अधिक आरोपपत्र जैसी शर्तें भी महत्वपूर्ण होती हैं.
इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसके सख्त प्रावधान हैं.
जमानत की कठिन शर्तें: मकोका के तहत आरोपी के लिए जमानत हासिल करना सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में कठिन होता है. अदालत को कानून में निर्धारित शर्तों पर विचार करना पड़ता है.
कबूलनामे से जुड़ा प्रावधान: सामान्य आपराधिक कानून के विपरीत, मकोका में पुलिस अधीक्षक यानी एसपी या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के सामने निर्धारित प्रक्रिया के तहत दिया गया कबूलनामा सबूत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है.
अवैध संपत्ति पर कार्रवाई: संगठित अपराध से अर्जित संपत्ति को कानून के प्रावधानों के तहत जब्त या कुर्क करने की कार्रवाई की जा सकती है.
कड़ी सजा: अपराध की प्रकृति और संबंधित धाराओं के आधार पर दोषी पाए जाने पर कम से कम पांच साल की कैद से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है. कुछ गंभीर परिस्थितियों में मृत्युदंड का भी प्रावधान है.
दाऊद इब्राहिम से छोटा राजन तक, अंडरवर्ल्ड के खिलाफ इस्तेमाल
मकोका का इस्तेमाल मुंबई के अंडरवर्ल्ड से जुड़े मामलों में बड़े पैमाने पर किया गया. दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, छोटा शकील और अरुण गवली के गिरोहों से जुड़े आरोपियों के खिलाफ जबरन वसूली, धमकी, सुपारी लेकर हत्या और अन्य संगठित अपराधों की जांच में इस कानून का सहारा लिया गया.
मुंबई के बिल्डरों और फिल्म जगत की हस्तियों को कथित तौर पर धमकाकर पैसे वसूलने के मामलों में भी मकोका लगाया गया. जांच एजेंसियों का उद्देश्य ऐसे आपराधिक नेटवर्क को तोड़ना था, जिन पर एक से अधिक अपराधों को संगठित तरीके से अंजाम देने के आरोप थे.
तेलगी स्टांप पेपर घोटाला और भरत शाह केस
देश के चर्चित नकली स्टांप पेपर घोटाले के मुख्य आरोपी अब्दुल करीम तेलगी और उसके नेटवर्क के खिलाफ भी मकोका लगाया गया था. जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया था कि इस नेटवर्क के जरिए बड़े पैमाने पर नकली स्टांप पेपर तैयार कर सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया गया. इस मामले में संगठित अपराध से जुड़े पहलुओं की जांच के लिए कानून का इस्तेमाल किया गया.
वहीं, फिल्म फाइनेंसर और हीरा कारोबारी भरत शाह को 2001 में मकोका के तहत गिरफ्तार किया गया था. उन पर छोटा शकील और अंडरवर्ल्ड से कथित संबंधों तथा फिल्मों में अपराध से जुड़े धन के इस्तेमाल के आरोप लगे थे. इस मामले ने फिल्म उद्योग और अंडरवर्ल्ड के कथित रिश्तों को लेकर व्यापक चर्चा पैदा की.
मालेगांव विस्फोट से जेडे हत्याकांड तक
साल 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और अन्य आरोपियों के खिलाफ महाराष्ट्र एटीएस ने मकोका की धाराएं लगाई थीं. बाद में विशेष अदालत ने आरोपियों को मकोका के आरोपों से मुक्त कर दिया. हालांकि, मामले में अन्य कानूनों के तहत कार्यवाही अलग से चली. यह उदाहरण दिखाता है कि किसी मामले में मकोका लगाया जाना अपने आप में आरोपी का दोष साबित नहीं करता.
मुंबई में खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे, जिन्हें जे. डे के नाम से जाना जाता था, की 2011 में हत्या कर दी गई थी. इस मामले में छोटा राजन और अन्य आरोपियों के खिलाफ मकोका लगाया गया. अदालत ने छोटा राजन और अन्य दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई.
मुंबई पर 26/11 के आतंकी हमलों के मामले में भी अजमल कसाब और अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच के दौरान मकोका के प्रावधानों का इस्तेमाल हुआ. इसके अलावा, तेलगी घोटाले से जुड़े मामले में महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक आर. एस. शर्मा की भूमिका भी जांच के दायरे में आई थी. संगठित मादक पदार्थ तस्करी के नेटवर्क के खिलाफ भी इस कानून का इस्तेमाल किया जाता रहा है.
टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस में क्यों चर्चा में आया मकोका?
अक्टूबर 2026 में टाइगर श्रॉफ की कार पर हुई फायरिंग के मामले में लॉरेंस बिश्नोई गैंग से कथित रूप से जुड़े आरोपियों के खिलाफ मकोका लगाए जाने की जानकारी सामने आई है. इस कार्रवाई के जरिए जांच एजेंसियां केवल फायरिंग की घटना ही नहीं, बल्कि इसके पीछे कथित संगठित आपराधिक नेटवर्क, आरोपियों के आपसी संबंध और उनकी भूमिका की भी जांच कर सकती हैं.
हालांकि, मकोका लगाया जाना किसी आरोपी को दोषी ठहराए जाने के बराबर नहीं है. अदालत में आरोप साबित होने के बाद ही दोष और सजा पर फैसला होता है. इस मामले में आगे की जांच से यह स्पष्ट होगा कि कथित फायरिंग के पीछे किसकी क्या भूमिका थी और संगठित अपराध से जुड़े आरोपों को लेकर जांच एजेंसियां कौन से साक्ष्य पेश करती हैं.




