18 की उम्र में शादी, 8 साल से अदालतों के चक्कर- एक बेटी की अधूरी ज़िंदगी की दास्तान
महज़ 18 साल की उम्र में हुई शादी ने उसकी ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। सपनों और पढ़ाई की उम्र में उसने समझौते का बोझ उठाया, और आज 8 साल बाद 26 की उम्र में उसकी ज़िंदगी अदालतों की तारीखों के बीच उलझी हुई है. यह कहानी सिर्फ एक टूटे रिश्ते की नहीं, बल्कि उस संघर्ष, दर्द और अधूरेपन की दास्तान है जिसे एक बेटी ने समाज, परिवार और हालात के बीच जीया.
हर लड़की का ख़्वाब होती है… नहीं, ये ख़्वाब सबका नहीं होता. ये ख़्वाब तब होता है जब बंदिशें न हों, जब सब कुछ सिर्फ़ मन का हो. लेकिन जब समाज और परिवार बीच में आ जाते हैं, तब बनती है एक ऐसी मुस्लिम लड़की की दास्तान, जो महज़ 18 की होकर 26 की उम्र तक कोर्ट के चक्कर काट रही है. इस बीच उसने जो देखा, वह शायद ही किसी को देखना चाहिए.
यह सिर्फ एक रिश्ते के टूटने की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसी ज़िंदगी की दास्तान है जो फैसलों के बोझ तले दबती रही, और फिर भी खुद को संभालने की कोशिश करती रही. कहानी है शाजिया की, जिसकी ज़िन्दगी इस शादी के बोझ तले कहीं दब गयी है.
जब रिश्ता तय हुआ तब दिमाग में क्या था?
हमारे मुस्लिम समाज में कई बार रिश्ते बचपन से ही तय कर दिए जाते हैं, और मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. जब मेरा रिश्ता तय हुआ, तब मुझे यह एहसास ही नहीं था कि यह मेरे जीवन का कितना बड़ा फैसला है. बचपन में तो जिंदगी वैसे ही चल रही थी- स्कूल, दोस्त, सपने. किसी ने यह महसूस नहीं होने दिया कि यह बात एक दिन मेरी दुनिया बदल देगी. लेकिन किशोरावस्था में आते-आते जब घर में शादी की जल्दी होने लगी, तब मेरे मन में हमेशा “ना” थी.
मैं पढ़ना चाहती थी, आगे बढ़ना चाहती थी. फिर भी सच यही है कि मैंने कभी अपने घरवालों के सामने खुलकर “हाँ” या “ना” कहना सीखा ही नहीं था. जब हिम्मत करके मना किया, तो इमोशनल दबाव और तरह-तरह की बातें हुईं और आखिरकार मेरी “ना” को “हाँ” में बदल दिया गया. उस दिन मुझे पहली बार लगा कि मेरी आवाज मेरी नहीं रही.
क़्या सोचकर शादी के लिए हां कहा?
मैं एक मिडिल क्लास मुस्लिम परिवार से हूं, जहां बच्चों की इच्छाओं से ज्यादा परिवार की परंपराएं और समाज की बातें मायने रखती हैं. जब मैंने कहा कि मुझे पढ़ना है और शादी नहीं करनी, तब ससुराल पक्ष ने भरोसा दिया कि शादी के बाद पढ़ाई भी होगी और नौकरी भी. घर में मुझे यह बताया गया कि मैं इकलौती बेटी हूं और पिता की इज्जत मेरे फैसले पर टिकी है. इन सबके बीच 18 साल की उम्र में मेरे पास ऑप्शन कम थे और मैंने समझौता कर लिया. उस समझौते में मेरी इच्छा नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का बोझ था.
शादी के कागज़ों पर साइन करते वक्त क्या सोच रही थी
सच कहूं तो उस वक्त मेरे दिमाग में कुछ भी नहीं चल रहा था. मैं जैसे पूरी तरह सुन्न हो गई थी. न कोई विचार, न कोई विरोध, न कोई सपना- बस एक खालीपन. जैसे मैं खुद को बाहर से देख रही हूं और सब कुछ अपने आप हो रहा है. लोग कहते हैं शादी का दिन जिंदगी का सबसे खुशहाल दिन होता है, लेकिन मेरे लिए वह एक धुंधला सा पल था- जहां मैं मौजूद थी, पर सच में जी नहीं रही थी.
पति, मेरठ और ससुराल में क्या-क्या हुआ
शादी के बाद जब मैं मेरठ गई, तो शुरुआत से ही मेरा अपने पति के साथ तालमेल नहीं बैठा. पति से दूरी का असर पूरे घर के व्यवहार पर पड़ा. लोग मेरे साथ रूखे रहे, ताने देते, मेरे परिवार को लेकर बातें करते. मुझे ऐसा महसूस होने लगा कि मैं वहां किसी रिश्ते का हिस्सा नहीं बल्कि एक बोझ हूं. हर दिन जैसे संघर्ष था- बस किसी तरह दिन गुजारना.
मारपीट और घरवालों से नहीं करने देते थे बात
दिल्ली में मेरा माहौल खुला था. पहनावे या बाहर जाने पर इतनी रोक-टोक नहीं थी. लेकिन मेरठ में सब कुछ बदल गया. घर से बाहर निकलने के लिए बुर्का जरूरी था, यहां तक कि पड़ोस तक जाने के लिए भी. मुझे अपने परिवार से खुलकर बात करने नहीं दी जाती थी. फोन छीन लिया गया और अगर बात होती भी थी तो रिकॉर्ड की जाती थी. बाद में उसी आधार पर मुझे अपमानित किया जाता, मारा जाता. यह सिर्फ माहौल का बदलाव नहीं था. यह मेरी पहचान और आज़ादी के छिन जाने जैसा था.
कब तय किया कि अब साथ नहीं रहना?
सच बोलूं तो शादी की पहली रात से ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी नींद से जागी हूं और पता नहीं कहां आ गई हूं. जब उस लड़के ने मेरी उम्र पूछी, तो मैंने कहा 18। इस पर उसने कहा कि तुम्हारे घरवालों को तुम पर भरोसा नहीं था, जो इतनी जल्दी शादी कर दी. मैंने उससे कहा कि शादी की जल्दी तुम्हारी माँ ने की है. यह सुनकर वह गुस्से में आ गया और मुझे चोट पहुंचाने की कोशिश करने लगा.
घरवालों को कैसे मनाया कि वापस ससुराल नहीं जाऊंगी
मैं जब भी दिल्ली आती, वापस जाने का मन नहीं करता था, लेकिन फिर भी भेज दिया जाता. धीरे-धीरे मेरे परिवार ने मेरे पति का बर्ताव और मेरा टूटना देखा. आखिरी बार जब मैं लौटी, तब दो दिन बाद वह तलाक के कागज़ लेकर जबरदस्ती साइन करवाने आ गया. उस घटना ने घरवालों को सब दिखा दिया. उसी के बाद उन्होंने तय किया कि मैं वापस नहीं जाऊंगी.
तलाक का केस पहले किसने डाला?
हमने शुरुआत में केस दर्ज नहीं किया था. पहले उन्होंने ही कोर्ट का रास्ता चुना. पंचायत से पहले ही मामला अदालत पहुंच गया. पंचायत में दोष उन्हीं का पाया गया, लेकिन कानूनी प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी. उसके बाद से यह केस मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया- एक ऐसा हिस्सा जो खत्म ही नहीं होता.
शुरुआत में कोर्ट जाने पर क्या होता था?
जब केस शुरू हुआ, मैं बहुत छोटी थी- मानसिक रूप से तैयार नहीं थी. कोर्ट का माहौल, वकीलों के सवाल, लोगों की नजरें- सब भारी लगता था. मुझे समझ नहीं आता था कि क्या हो रहा है और मैं इस सबका सामना कैसे करूँ. जैसे अचानक मुझे ऐसी दुनिया में डाल दिया गया जहां मुझे जीना नहीं आता था.
हर कोर्ट डेट पर आपको क्या फील होता है?
आज भी मैं अपनी ज़िंदगी में कितना ही आगे बढ़ गई हूँ, लेकिन जब-जब कोर्ट की तारीख आती है, मुझे भावनाएँ तो पूरी तरह महसूस नहीं होतीं, पर दिल बहुत दुखी हो जाता है. अपनी ज़िंदगी खुद से जी नहीं पाना, अभी तक यही मलाल बना रहता है, जो मुझे फिजिकली, इमोशनली और मेंटली रूप से आज भी थका कर रखता है. मुझे माइग्रेन और अनिद्रा की समस्या है. मैं ज़्यादा तनाव नहीं ले पाती, नहीं तो नींद और तबीयत दोनों खराब हो जाती हैं. अब खुलकर रोना भी नहीं आता, कुछ महसूस ही नहीं होता- प्यार, मोहब्बत या लगाव किसी से भी नहीं. अब ज़िंदगी के बारे में यह सोच भी नहीं पाती कि किसी के साथ पूरी उम्र बिताऊँ.
अगर उस शादी में अभी तक होती तो क्या होता?
सच बोलूँ तो पहले मैं अपने आप को बहुत कोसती थी, क्यों और कैसे मेरे साथ यह सब हुआ. लेकिन समय के साथ मैंने खुद को खड़ा किया और नज़रें उठाईं. अगर शादी नहीं होती तो शायद करियर के लिहाज़ से सब सही चल रहा होता, लेकिन शादी फिर भी होती ही या नहीं भी होती, तो कहीं और जल्दी हो जाती. अगर मैं उस शादी में रह रही होती, तो बस पिंजरे में कैद होकर रह जाती उसी दुनिया में, क्योंकि सब कुछ अलग था. मेरा रहना दिल्ली में था और वह जगह बिल्कुल बंद थी. बहुत ज़्यादा अलग सांस्कृतिक माहौल, औरतों की कोई इज़्ज़त नहीं. इसलिए शायद कुछ भी कभी ठीक चल ही नहीं पाता.
शादी को लेकर कैसे कैसे सवाल पूछते हैं लोग?
शुरुआत में माहौल थोड़ा गर्म था। सब कुछ नया-नया सा था. घर वाले, आसपास के लोग- सब बहुत बातें करते थे, देखते थे, ख्याल और बर्ताव सब अलग था. मैं तो बस घर में ही रहती थी, कहीं निकलने का मन नहीं करता था. बिल्कुल अकेले रहने का मन होता था. बहुत बुरे-बुरे ख़याल आते थे. तरह-तरह की बातें मुझसे पूछते थे. यहाँ तक कि यह भी पूछते थे कि अगर शादी नहीं चली तो क्या मैं लेस्बियन तो नहीं हूँ वगैरह-वगैरह. ऐसे सवाल मुझे अंदर से तोड़ देते थे.
क्या घरवाले अब भी तुम्हारी शादी के बारे में सोचते हैं?
इंडियन फैमिली में कोई भी अपनी बेटी को शादी के बाद अपने घर पर नहीं रखता, लेकिन हाँ यह है कि अब बहुत सी चीज़ों और फैसलों को लेने की आज़ादी मुझे है. अभी जब मैं उस घर वापस आई हूँ, कोर्ट केस चलते हुए, तो मेरे पापा ने शादी से जुड़ी कोई बात मेरे सामने नहीं की है, लेकिन अंदर ही अंदर सबको अब पता होता है. इन सब बातों से मुझे कभी अजीब लगता था, कभी भारीपन महसूस होता था, और कभी लगता था जैसे बहुत कुछ अनकहा होते हुए भी सब समझ में आ रहा है.
शादी के बाद मायके में रहने पर घरवालों का कैसा है बर्ताव
मेरी दादी की बात ही अलग है. उन्होंने उस ज़माने में घर चलाने के लिए नौकरी की थी, जब औरतों को घर से बाहर कदम रखने तक नहीं दिया जाता था. वह मुझे हमेशा दिलासा और बढ़ावा देती हैं कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो. लेकिन भाई लोग थोड़ा कंजरवेटिव हो गए हैं, क्योंकि दूसरों को क्या लगेगा- इससे उन्हें फर्क पड़ता है. मैं कुछ भी कैसे भी रहूँ, अगर किसी को पता चल जाए तो आज भी रोक-टोक होती है. उनके हिसाब से चलते रहो तो ठीक, नहीं तो लड़ाई-झगड़ा सब हो जाता है. इन सब बातों से मुझे कभी दबाव महसूस होता है, कभी घुटन सी लगती है, और कभी लगता है कि मुझे खुद को समझाने और संभालने में ही बहुत ताकत लगानी पड़ती है.
क्या कभी पति से बात सुलझाने की कोशिश की?
शुरू-शुरू में मैंने सब करके देख लिया. उससे बात करने की कोशिश की, उसके साथ ढलने की कोशिश की, लेकिन वह बिल्कुल ऐसा इंसान था जिसे इज़्ज़त देना या लाइफ पार्टनर क्या होता है, इसका कुछ भी पता नहीं था. हर बात में अपनी माँ को बीच में ले आता, छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना देता और चुगली कर देता, इसलिए हमेशा लड़ाई-झगड़ा और मार-पीट ही होती रहती थी. इन सब से मुझे बहुत डर, अपमान और टूटन महसूस होती थी- जैसे मेरी बात, मेरी इज़्ज़त और मेरी पहचान की कोई कीमत ही नहीं है. धीरे-धीरे मेरे अंदर घुटन, असहायता और अकेलेपन का एहसास घर करने लगा.
जब उसकी दूसरी शादी की खबर मिली
मेरे मन में यही विचार आते थे कि यह शादी सिर्फ मतलब की थी, क्योंकि मेरे पिता की सरकारी नौकरी है, पैसा हड़पना था. औरत बस रात को पति के साथ रहे और दिन में काम करती रहे. शायद उन्हें उतना भी नहीं मिल पाया, तो फिर सारा खेल खेला गया और चुपचाप दूसरी शादी कर ली. बोलने के लिए बहुत से रिश्तेदार आसपास हैं, लेकिन कोई काम नहीं आता. मुश्किल या ज़रूरत के समय साथ देने की बजाय बस चुगली करने के लिए ही सब मौजूद रहते हैं. इन सब बातों से मुझे बहुत ठेस पहुँचती थी. कभी खुद को इस्तेमाल किया हुआ महसूस करती थी, कभी बेहद अकेला, और कभी ऐसा लगता था जैसे मेरी तकलीफ किसी के लिए मायने ही नहीं रखती.
आज जहां मैं खड़ी हूं....
आज मैं 26 साल की हूं, MBA कर चुकी हूँ. फिर भी जिंदगी पूरी तरह आगे नहीं बढ़ पाई. अदालत के चक्कर, अधूरे फैसले- सब साथ चल रहे हैं. लेकिन मैं टूटी नहीं हूँ. मैंने खुद को खड़ा करना सीखा है. मेरी कहानी सिर्फ मेरी नहीं. उन कई लड़कियों की है जो मुस्कुराती दिखती हैं, पर भीतर बहुत कुछ दबाकर जीती हैं. शायद एक दिन यह सब खत्म होगा. और उस दिन मैं पहली बार अपनी जिंदगी अपने लिए जी पाऊँगी.





