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मणिपुर में कब और कैसे आएगी शांति? ताजा हिंसा में जलाए गए 20 घर, 3 साल बाद भी क्यों उलझा है मामला, सरकार ने अब तक क्या किया?

मणिपुर में तीन साल बाद भी हिंसा क्यों नहीं थम रही? 20 घर जलने की ताजा घटना, जातीय संघर्ष की जड़, सरकार की अब तक की कार्रवाई और शांति की संभावनाएं जानिए.

Manipur Violence
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मई 2023 में शुरू हुई जातीय हिंसा के तीन साल बाद भी मणिपुर पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया है. बीच-बीच में हालात सुधरते दिखते हैं, लेकिन एक छोटी सी घटना भी हिंसा की नई लहर पैदा कर देती है. इंडियन एक्सप्रेस और टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक ताजा घटनाओं में फिर 20 से अधिक घर जला दिए गए हैं, जिससे साफ है कि जमीनी स्तर पर अविश्वास और हथियारबंद समूहों की गतिविधियां अभी भी खत्म नहीं हुई हैं.

सवाल यह है कि आखिर तीन साल बाद भी मणिपुर में शांति क्यों नहीं लौट पाई, सरकार ने अब तक क्या किया और स्थायी समाधान का रास्ता क्या हो सकता है.

हिंसा में फिर जले 20 से ज्यादा घर

कुछ दिनों की अपेक्षाकृत शांति के बाद मणिपुर के कामजोंग और नोनी जिलों में हिंसा फिर भड़क उठी. अधिकारियों के अनुसार अज्ञात हमलावरों ने तीन गांवों में 20 से अधिक घरों में आग लगा दी. सबसे ज्यादा नुकसान भारत-म्यांमार सीमा के पास स्थित फाइमोल गांव में हुआ, जहां लगभग पूरा गांव जलकर राख हो गया. इसके बाद जवाबी कार्रवाई में तांगखुल नागा बस्तियों को भी निशाना बनाया गया.

दूसरी ओर, कुकी संगठनों ने आरोप लगाया कि नोनी जिले के लेइकोट कुकी गांव पर हमला NSCN-IM के हथियारबंद कैडरों ने किया. संगठन का दावा है कि गांव के स्वयंसेवकों ने सीमित संसाधनों के साथ मुकाबला किया, लेकिन आधुनिक हथियारों के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ा और बाद में गांव में आग लगा दी गई. हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस जांच जारी है.

मणिपुर में हिंसा की शुरुआत कैसे हुई?

मणिपुर में वर्तमान संघर्ष की शुरुआत 3 मई 2023 को हुई थी. इसकी तत्काल वजह मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग और उसके विरोध में आयोजित "ट्राइबल सॉलिडेरिटी मार्च" बना. लेकिन असली वजहें इससे कहीं ज्यादा गहरी हैं.

  • मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जमीन और संसाधनों को लेकर विवाद है.
  • पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विकास में असमानता.
  • अवैध हथियारों और उग्रवादी संगठनों की मौजूदगी.
  • भारत-म्यांमार सीमा से जुड़े सुरक्षा और घुसपैठ के मुद्दे.
  • दोनों समुदायों के बीच वर्षों से बढ़ता अविश्वास.
  • यह संघर्ष केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और जातीय विश्वास के संकट का रूप ले चुका है.

तीन साल बाद भी क्यों नहीं सुलझा मामला?

  1. विशेषज्ञों के अनुसार इसके कई कारण हैं. पहला, दोनों प्रमुख समुदायों के बीच भरोसा लगभग खत्म हो चुका है. आज भी हजारों लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं और अपने पुराने घरों में लौटने से डरते हैं.
  2. दूसरा, कई इलाकों में हथियारबंद समूह सक्रिय हैं. सुरक्षा बल लगातार हथियार बरामद कर रहे हैं, लेकिन पूरी तरह निरस्त्रीकरण नहीं हो पाया है.
  3. तीसरा, हिंसा की कई घटनाओं की जांच अभी भी पूरी नहीं हुई है. दोषियों को सजा मिलने में देरी से लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है.
  4. चौथा, मणिपुर में नागा, कुकी और मैतेई समुदायों के अलग-अलग राजनीतिक और क्षेत्रीय हित हैं, जिन पर अभी तक व्यापक सहमति नहीं बन सकी है.
  5. यही वजह है कि छोटी घटनाएं भी बड़े संघर्ष का रूप ले लेती हैं.

सरकार ने अब तक क्या-क्या किया?

  • हिंसा रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने कई कदम उठाए हैं.
  • सबसे पहले बड़ी संख्या में सेना, असम राइफल्स, CRPF और अन्य केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की गई.
  • हिंसाग्रस्त इलाकों में बार-बार कर्फ्यू और इंटरनेट प्रतिबंध लगाए गए ताकि अफवाहों को रोका जा सके.
  • फरवरी 2025 में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया.
  • बाद में फरवरी 2026 में नई सरकार बनने के बाद राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया और नई निर्वाचित सरकार ने कामकाज संभाला.
  • केंद्र सरकार ने विभिन्न समुदायों के बीच शांति वार्ता की कोशिशें भी शुरू कीं.
  • राहत और पुनर्वास के लिए केंद्र ने सैकड़ों करोड़ रुपये मंजूर किए.
  • सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों विस्थापित लोगों के लिए राहत शिविर, अस्थायी प्री-फैब्रिकेटेड मकान और पुनर्वास योजनाएं चलाई जा रही हैं.
  • सुरक्षा एजेंसियां लगातार तलाशी अभियान चलाकर बड़ी संख्या में अवैध हथियार और गोला-बारूद भी बरामद कर रही हैं.

फिर भी शांति क्यों नहीं लौट रही?

सरकारी प्रयासों के बावजूद स्थायी शांति इसलिए नहीं आ पा रही क्योंकि संघर्ष केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि विश्वास का संकट बन चुका है.

एक समुदाय दूसरे की सुरक्षा गारंटी पर भरोसा नहीं करता. विस्थापित लोग अपने गांव लौटने से डरते हैं. कई इलाकों में अलग-अलग समुदायों के बीच सामाजिक संपर्क लगभग खत्म हो चुका है. जब तक राजनीतिक संवाद, न्यायिक कार्रवाई और पुनर्वास समानांतर रूप से आगे नहीं बढ़ेंगे, केवल सुरक्षा बलों के सहारे स्थायी शांति स्थापित करना कठिन माना जा रहा है.

राहुल गांधी ने क्या कहा?

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ताजा हिंसा पर केंद्र सरकार की आलोचना की. उन्होंने कहा कि मणिपुर वर्षों से जल रहा है और अब फिर 20 घर आग की भेंट चढ़ गए हैं. उनका आरोप है कि सरकार के रहते और राष्ट्रपति शासन के बावजूद संघर्ष गहराता गया है. राहुल गांधी ने इसे केंद्र की "विभाजनकारी विचारधारा" का परिणाम बताया और कहा कि मणिपुर को न्याय और भरोसे की जरूरत है.

मणिपुर में शांति कब और कैसे आएगी?

मणिपुर विवाद के जानकारों का मानना है कि मणिपुर में स्थायी शांति किसी एक फैसले से नहीं आएगी. इसके लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा.

सबसे पहले सभी समुदायों के बीच भरोसा बहाल करने के लिए निरंतर राजनीतिक संवाद जरूरी होगा. अवैध हथियारों का पूर्ण निरस्त्रीकरण और उग्रवादी गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है. हिंसा के मामलों की निष्पक्ष जांच और दोषियों को समयबद्ध सजा मिलनी चाहिए ताकि न्याय का भरोसा बने. विस्थापित परिवारों की सुरक्षित घर वापसी, पुनर्वास और आजीविका सुनिश्चित करनी होगी. साथ ही सीमा सुरक्षा मजबूत करने और स्थानीय विकास, रोजगार तथा शिक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा.

जब तक सुरक्षा, न्याय, पुनर्वास और राजनीतिक समाधान साथ-साथ आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक मणिपुर में स्थायी शांति की राह आसान नहीं होगी. ताजा आगजनी की घटनाएं यही संकेत देती हैं कि हिंसा भले कम हुई हो, लेकिन उसका मूल कारण अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है.

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