गुदड़ी के लाल से देश के PM तक: लाल बहादुर श्रीवास्तव कैसे बने ‘शास्त्री’, पुलिस की लाठीचार्ज पर लिया था बड़ा फैसला
लाल बहादुर श्रीवास्तव कैसे बने ‘शास्त्री’? जानिए काशी विद्यापीठ की उपाधि से प्रधानमंत्री बनने तक का सफर और पुलिस मंत्री रहते लाठीचार्ज की जगह पानी की बौछार का फैसला.
2 अक्टूबर को देशभर में दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाई जाएगी. 1904 में मुगलसराय में जन्मे शास्त्री का जीवन अभावों से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने की सभी के लिए प्रेरक यात्रा हमेशा से रहा है. उनका मूल नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था. काशी विद्यापीठ से मिली ‘शास्त्री’ की उपाधि आगे चलकर उनके नाम का हिस्सा बन गई. लेकिन शास्त्री की पहचान केवल उनके सरल जीवन और सादगी तक सीमित नहीं थी. स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश में पुलिस एवं परिवहन मंत्री रहते हुए उन्होंने प्रशासन और भीड़ नियंत्रण को लेकर अलग दृष्टिकोण अपनाया.
खास बात यह है कि यूपी सरकार में पुलिस मंत्री रहते हुए उन्होंने उग्र भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेजी विरासत को अलविदा कहते हुए पुलिश प्रशासन के कहा था कि धरना प्रदर्शन की स्थिति में लोगों पर लाठीचार्ज के बजाय पानी की बौछार का इस्तेमाल करें.
लाल बहादुर श्रीवास्तव से ‘शास्त्री’ कैसे बने?
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय में हुआ था. उनका मूल नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था. आगे चलकर उन्होंने जातिसूचक उपनाम ‘श्रीवास्तव’ का परित्याग कर दिया. काशी विद्यापीठ में शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त हुई. यही उपाधि धीरे-धीरे उनके नाम का स्थायी हिस्सा बन गई. इस प्रकार लाल बहादुर श्रीवास्तव, लाल बहादुर शास्त्री के रूप में प्रसिद्ध हुए.
पुलिस मंत्री रहते लाठी की जगह पानी क्यों चुना?
आजादी के बाद जब देश अपनी नई प्रशासनिक व्यवस्था गढ़ रहा था, तब पुलिस के काम करने के तौर-तरीकों में बदलाव की जरूरत भी महसूस की जा रही थी. 15 अगस्त 1947 के बाद लाल बहादुर शास्त्री उत्तर प्रदेश के पुलिस एवं परिवहन मंत्री बने. इसी कार्यकाल से जुड़ा एक चर्चित प्रसंग भी सामने आता है. मामला यह है कि उन्होंने अनियंत्रित भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज के बजाय पानी की बौछार का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया था.
इस फैसले का मूल विचार भीड़ से सीधे शारीरिक टकराव को कम करना था. लाठीचार्ज में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच सीधा संपर्क होता है, जिससे चोट और तनाव बढ़ने की आशंका रहती है. इसके विपरीत पानी की तेज बौछार का उद्देश्य भीड़ को पीछे हटने और स्थान खाली करने के लिए मजबूर करना था.
जो लोग शास्त्री के सार्वजनिक जीवन को समझते हैं, उनका कहना है कि उनकी सोच प्रशासनिक दृष्टिकोण की एक झलक देता है. वे कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते थे, लेकिन जहां संभव हो, टकराव को कम करने का रास्ता भी तलाशते थे. आगे चलकर प्रधानमंत्री के रूप में उनका नाम ‘जय जवान, जय किसान’ जैसे संदेशों से जुड़ा, जिसने सैनिकों और किसानों की भूमिका को राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में रखा.
'गुदड़ी का लाल' की पहचान इतनी खास क्यों बनी?
साधारण जीवन से निकलकर देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंचे शास्त्री की सबसे विशिष्ट पहचान उनकी सादगी और सार्वजनिक जीवन में अनुशासन रही. स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के बाद उन्होंने विभिन्न प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियां संभालीं. प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने जीवनशैली में आडंबर को स्थान नहीं दिया. उनके व्यक्तित्व में विनम्रता और कर्तव्यबोध प्रमुख थे. यही कारण है कि उनका नाम केवल प्रधानमंत्री पद से नहीं, बल्कि सादगीपूर्ण राजनीतिक जीवन की एक विशिष्ट मिसाल के रूप में भी याद किया जाता है. इसलिए उन्हें गुदड़ी का लाल कहा जाता है.
‘जय जवान, जय किसान’ का नारा क्यों दिया?
1965 में भारत के सामने एक साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और खाद्यान्न उपलब्धता की चुनौती थी. पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान सीमा पर सैनिक देश की रक्षा कर रहे थे, जबकि कृषि उत्पादन बढ़ाना भी आवश्यक था. इसी परिस्थिति में शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का आह्वान किया. इस उद्घोष के माध्यम से उन्होंने सैनिक और किसान, दोनों के राष्ट्रीय योगदान को रेखांकित किया. एक देश की सुरक्षा करता है तो दूसरा उसके लिए अन्न जुटाता है. बाद में यह नारा भारतीय राजनीतिक और सामाजिक जीवन में शास्त्री की पहचान से गहराई से जुड़ गया.
सोमवार के दिन उपवास की अपील क्यों की?
1965 के युद्धकाल में देश खाद्यान्न संकट से भी गुजर रहा था. ऐसे समय शास्त्री ने नागरिकों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने का आग्रह किया, ताकि अनाज की खपत घटाई जा सके. यह अपील सरकारी व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय जनता की सहभागिता बढ़ाने का प्रयास थी. शास्त्री स्वयं भी इस अनुशासन का पालन करने के पक्षधर थे. उनके आह्वान का मूल भाव यही था कि संकट की घड़ी में प्रत्येक नागरिक अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे. इस पहल ने खाद्यान्न बचत को व्यक्तिगत संयम और राष्ट्रीय दायित्व से जोड़ दिया.




