ममता का सच्चा सिपाही या TMC में दिख रहा बड़ा मौका? BJP से लेकर अमित शाह तक पर यूं ही आक्रामक नहीं हैं कीर्ति आजाद
TMC की अंदरूनी कलह के बीच कीर्ति आजाद का BJP और अमित शाह पर लगातार हमला चर्चा में है. क्या वह ममता के सबसे भरोसेमंद नेता हैं या भविष्य की तैयारी कर रहे हैं?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा संकट बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच नहीं, बल्कि खुद TMC के भीतर दिखाई दे रहा है. पार्टी के अंदर जिस तरह मतभेद सार्वजनिक हुए हैं, उसने ममता बनर्जी के नेतृत्व, अभिषेक बनर्जी की भूमिका और संगठन के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. इसी बीच एक नेता लगातार बीजेपी, अमित शाह और केंद्र सरकार पर सबसे आक्रामक हमले कर रहा है. वो नेता पहले खुद बीजेपी में था, फिर कांग्रेस का हिस्सा बना और अब टीएमसी में है. उसका नाम कीर्ति आजाद है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कीर्ति आजाद सिर्फ ममता बनर्जी के वफादार सिपाही हैं या फिर बदलते राजनीतिक समीकरणों में अपने लिए भी बड़ी भूमिका तलाश रहे हैं.
TMC में फूट की शुरुआत आखिर कहां से हुई?
2024 के लोकसभा चुनाव में TMC ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 29 सीटें जीतकर अपनी ताकत साबित की थी. लेकिन चुनाव के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की आवाजें तेज होने लगीं. सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने एक दिन पहले सार्वजनिक रूप से अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और संगठन में बढ़ते केंद्रीकरण पर सवाल उठाए. इसके बाद कई नेताओं ने संकेत दिए कि पार्टी के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर नाराजगी मौजूद है. यहीं से यह विवाद व्यक्तिगत मतभेद से निकलकर शक्ति संघर्ष की बहस में बदल गया.
TMC में किस गुट के पास क्या ताकत है?
मौजूदा हालात में TMC के भीतर तीन शक्ति केंद्र दिखाई देते हैं. पहला और सबसे बड़ा केंद्र खुद ममता बनर्जी हैं, जिनके पास मुख्यमंत्री पद, पार्टी संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं का सबसे बड़ा आधार है. दूसरा केंद्र अभिषेक बनर्जी हैं, जो राष्ट्रीय महासचिव होने के साथ-साथ पार्टी के युवा चेहरे और चुनावी रणनीति के प्रमुख सूत्रधार माने जाते हैं. तीसरा केंद्र उन वरिष्ठ नेताओं का है जो खुद को ममता के पुराने सिपाही बताते हैं और मानते हैं कि संगठन में पुराने नेताओं की भूमिका कम होती जा रही है. ऐसे नेताओं ने रितब्रत बनर्जी, काकोली, कल्याण बनर्जी जैसे नाम शामिल हैं. राजनीतिक रूप से यह लड़ाई विचारधारा की नहीं, बल्कि संगठनात्मक प्रभाव और भविष्य के नेतृत्व की मानी जा रही है.
बागी गुट आखिर कितना मजबूत है?
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा दावा बागी खेमे की संख्या शक्ति को लेकर किया जा रहा है. बागी नेता रितब्रत बनर्जी और उनके समर्थकों का दावा है कि उनके साथ 58 से 64 विधायक हैं. यही नहीं, संसद काकोली घोष दस्तीदार का दावा है कि लोकसभा में लगभग 19 से 20 सांसद उनके संपर्क में हैं.
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना जरूर है कि पहली बार TMC के भीतर संख्या बल को लेकर खुली राजनीतिक लड़ाई सामने आई है. यही कारण है कि ममता बनर्जी को भी लगातार संगठनात्मक बैठकें करनी पड़ रही हैं. खास बात यह है कि इस बार विरोधी गुट ममता और अभिषेक पर काबिज होता दिख रहा है.
ममता खेमे में कौन-कौन नेता दिखाई दे रहे हैं?
ममता बनर्जी के साथ सार्वजनिक रूप से खड़े नेताओं में कल्याण बनर्जी, कीर्ति आजाद, डेरेक ओ'ब्रायन, सुदीप बंद्योपाध्याय, डोला सेन और कई वरिष्ठ नेता शामिल हैं. ये नेता लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी की असली ताकत अभी भी ममता बनर्जी के साथ है.
विशेष रूप से कल्याण बनर्जी और कीर्ति आजाद की जोड़ी हाल के दिनों में सबसे ज्यादा चर्चा में रही है. दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व का बचाव किया और बागियों पर निशाना साधा. हालांकि, कल्याण बनर्जी ने भी गुरुवार को नाराजगी जाहिर करते हुए ममता दीदी से साफ कर दिया है कि वो अभिषेक और कलयाण में से किसी एक को चुन लें.
इस पूरी लड़ाई में कीर्ति आजाद की एंट्री अहम क्यों?
कीर्ति आजाद TMC के पारंपरिक बंगाली नेताओं में शामिल नहीं हैं. पूर्व क्रिकेटर और 1983 विश्व कप विजेता टीम के सदस्य कीर्ति आजाद 2019 में TMC में शामिल हुए थे. 2024 में उन्होंने बर्धमान-दुर्गापुर सीट से जीत दर्ज की और धीरे-धीरे पार्टी के राष्ट्रीय चेहरों में शामिल हो गए.
दिलचस्प बात यह है कि संगठन में उनकी ताकत किसी गुट से नहीं, बल्कि सीधे ममता बनर्जी से जुड़ी हुई मानी जाती है. यही वजह है कि पार्टी में संकट बढ़ने के साथ-साथ उनकी आक्रामकता भी बढ़ती दिखाई दे रही है.
BJP और अमित शाह पर हमलावर क्यों कीर्ति?
कीर्ति आजाद अच्छी तरह जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में TMC की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा BJP विरोध है. ऐसे में जो नेता सबसे आक्रामक होकर भाजपा पर हमला करता है, उसकी राजनीतिक उपयोगिता भी बढ़ती है.
लेकिन इसके पीछे सिर्फ विपक्षी राजनीति नहीं है. पार्टी के अंदर जब शक्ति संघर्ष चल रहा हो, तब ममता बनर्जी की राजनीतिक लाइन का सबसे मुखर समर्थक बनना भी एक रणनीति माना जाता है. कीर्ति आजाद लगातार अमित शाह, केंद्रीय एजेंसियों और भाजपा नेतृत्व पर हमला बोलकर यह संदेश दे रहे हैं कि वे पार्टी नेतृत्व के सबसे भरोसेमंद सार्वजनिक रक्षक हैं.
क्या कीर्ति आजाद सिर्फ वफादारी निभा रहे हैं?
राजनीति में वफादारी और अवसर दोनों साथ चलते हैं. कीर्ति आजाद जानते हैं कि TMC के भीतर भविष्य के नेतृत्व को लेकर चर्चा लगातार चल रही है. ऐसे में खुद को ममता बनर्जी के सबसे विश्वसनीय नेताओं में स्थापित करना उनके राजनीतिक कद को बढ़ा सकता है.
खास बात यह है कि उन्होंने खुद को अभिषेक समर्थक या बागी खेमे के नेता के रूप में पेश करने के बजाय सीधे ममता बनर्जी की राजनीतिक लाइन से जोड़ा है. यह रणनीति उन्हें दोनों पक्षों के संघर्ष से ऊपर रखते हुए ममता के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शामिल करती है.
क्यों बढ़ जाएगी कीर्ति आजाद की अहमियत?
विधानसभा चुनाव 2026 के बाद TMC के लिए सिर्फ पार्टी को बचा लेने की नहीं बल्कि यह ममता बनर्जी की राजनीतिक विरासत की भी परीक्षा माना जाएगा. BJP लगातार बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है, जबकि पार्टी के भीतर भी असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं.
ऐसे समय में TMC को ऐसे नेताओं की जरूरत होगी जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का पक्ष मजबूती से रख सकें. कीर्ति आजाद की राष्ट्रीय पहचान, संसदीय अनुभव और मीडिया में आक्रामक शैली उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त बनाती है.
ममता का सिपाही या भविष्य का खिलाड़ी?
फिलहाल, इतना साफ है कि कीर्ति आजाद का हर बयान सिर्फ BJP के खिलाफ राजनीतिक हमला नहीं है. वह TMC के भीतर चल रही शक्ति की लड़ाई में भी एक संदेश देता है. एक तरफ वह ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सार्वजनिक चेहरों में खुद को स्थापित कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भविष्य के किसी भी राजनीतिक समीकरण में अपनी उपयोगिता भी बढ़ा रहे हैं.
यही वजह है कि कीर्ति आजाद को सिर्फ ममता का सिपाही मानना अधूरा विश्लेषण होगा. वह ममता की लड़ाई भी लड़ रहे हैं और बदलते राजनीतिक माहौल में अपने लिए नई जमीन भी तैयार कर रहे हैं.
शाह और दुबे की भूमिका पर क्या कहा?
हालिया चुनावी नतीजों के बाद टीएमसी के कई नेताओं के पार्टी छोड़ने की चर्चाओं के बीच उन्होंने बीबीसी से बातचीत में ममता बनर्जी के नेतृत्व, अभिषेक बनर्जी की भूमिका और पार्टी पर लगाए जा रहे आरोपों पर अपनी बात रखी. उन्होंने ममता बनर्जी की खुलकर वकालत की. साथ ही कहा कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी के खिलाफ अमित शाह और बीजेपी के नेता निशिकांत दुबे व अन्य आपरेशन लोटस चला रहा हैं. ऐसा काम वो कई राज्यों में कर रहे है. उसी को बंगाल में रिपीट करने की कोशिश में जुटे हैं. हो सकता है कि वो ऐसा कर भी लें.
टीएमसी के कांग्रेस में विलय पर कहा कि ऐसा नहीं हो सकता. टीएमसी के बागी नेताओं द्वारा अभिषेक पर जारी हमले को लेकर कहा है कि वो अभी नया लड़का है. अगर कुछ गलती करता है, तो उसे साथ बैठकार समझाने की जरूरत है. वरिष्ठ लोग ऐसे पार्टी छोड़ते हैं क्या?




