Kanhaiya Kumar Report Card: JNU से देशभर में छाए, 2 लोकसभा चुनाव में हार, अब NSUI का भी किया बंटाधार, राजनीति में कहां खड़े कन्हैया?
JNU से राष्ट्रीय पहचान पाने वाले कन्हैया कुमार दो लोकसभा चुनाव हार चुके हैं. NSUI की DUSU हार के बाद उनकी सियासी रणनीति और राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं.
कन्हैया कुमार की राजनीतिक कहानी बिहार के बेगूसराय से शुरू होकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), दिल्ली की छात्र राजनीति और फिर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंची. जेएनयू छात्र नेता के रूप में मिली पहचान ने उन्हें देशभर में चर्चित चेहरा बनाया, लेकिन दो लोकसभा चुनाव लड़ने के बावजूद उन्हें अब तक चुनावी जीत नहीं मिली है. 2026 में NSUI की जिम्मेदारी संभाल रहे कन्हैया के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव के नतीजे एक नई राजनीतिक परीक्षा बनकर सामने आए हैं.
कहां से हुआ कन्हैया कुमार का उदय?
कन्हैया कुमार का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ. वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन यानी AISF से जुड़े. JNU में पढ़ाई के दौरान उनकी सक्रियता बढ़ी और 2015 में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए. साल 2016 में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह, इंशाअल्लाह.” “हमें चाहिए आजादी, भूख से आजादी, गरीबी से आजादी, जातिवाद से आजादी, मनुवाद से आजादी, पूंजीवाद से आजादी.” AISF के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी. इसके बाद कन्हैया कुमार की पहचान दिल्ली की छात्र राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर बनने लगी.
जेएनयू के किस नारे से मिली पहचान
कन्हैया कुमार की पहचान 2016 के JNU विवाद के दौरान उनके चर्चित भाषण से बनी. “आजादी” के नारों को लेकर हुए विवाद के बीच उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया. हालांकि, विवादित नारे किसने लगाए, इस पर बाद में भी बहस और कानूनी विवाद रहा. कन्हैया ने अपने भाषणों में “आजादी” को सामाजिक अन्याय और भेदभाव से मुक्ति के अर्थ में पेश किया. साथ ही 'भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह, इंशाअल्लाह” का नारा खुद लगाने से बाद में इनकार कर दिया था.
2016 में JNU विवाद ने कैसे बदली Image?
फरवरी 2016 में JNU परिसर में हुए एक कार्यक्रम को लेकर विवाद हुआ. कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया और इस मामले ने राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया. कन्हैया ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया. गिरफ्तारी, जेल से बाहर आने के बाद उनका भाषण और पूरे मामले पर राजनीतिक बहस ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई.
यहीं से कन्हैया कुमार केवल JNU के छात्र नेता नहीं रहे. वे टीवी डिबेट, राजनीतिक सभाओं और सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देने वाले युवा राजनीतिक चेहरे बन गए. उनकी भाषण शैली और सरकार की नीतियों पर मुखर रुख ने उन्हें खास तौर पर युवा वर्ग में चर्चित बनाया.
CPI में कैसे बढ़ा कन्हैया का कद?
JNU से मिली राष्ट्रीय पहचान के बाद कन्हैया कुमार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की राजनीति में सक्रिय हुए. 2018 में वे CPI की National Council में पहुंचे और बाद में पार्टी की National Executive का हिस्सा बने. इस दौर में पार्टी ने उन्हें युवा चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाया.
2019 में पहली चुनावी परीक्षा कहां हुई?
2019 के लोकसभा चुनाव में CPI ने कन्हैया कुमार को बिहार की बेगूसराय सीट से उम्मीदवार बनाया. मुकाबला BJP के गिरिराज सिंह से था. देशभर में चर्चित युवा नेता होने के बावजूद कन्हैया चुनाव हार गए. उन्हें करीब 22 फीसदी वोट मिले, जबकि गिरिराज सिंह को करीब 56 फीसदी वोट मिले.
बेगूसराय चुनाव ने पहली बार यह सवाल खड़ा किया कि राष्ट्रीय स्तर पर बनी लोकप्रियता को क्या कन्हैया कुमार अपने चुनाव क्षेत्र में वोट में बदल पाएंगे?
2021 में कांग्रेस में क्यों आए कन्हैया?
सितंबर 2021 में कन्हैया कुमार ने CPI छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा. राहुल गांधी की मौजूदगी में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली. कांग्रेस में आने के बाद उनकी भूमिका केवल चुनाव लड़ने वाले नेता तक सीमित नहीं रही. पार्टी ने उन्हें युवा और छात्र राजनीति में भी सक्रिय भूमिका दी.
राहुल गांधी से नजदीकी कैसे बढ़ी?
कांग्रेस में आने के बाद कन्हैया कुमार राहुल गांधी के साथ कई राजनीतिक कार्यक्रमों में नजर आए. उनकी भाषण शैली, छात्र राजनीति का अनुभव और युवाओं के बीच उनकी पहचान कांग्रेस के लिए उपयोगी राजनीतिक पूंजी मानी गई. समय के साथ वे राहुल गांधी के करीबी युवा नेताओं में दिखाई देने लगे.
2024 में दूसरी चुनावी परीक्षा क्यों अहम थी?
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कन्हैया कुमार को उत्तर-पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार बनाया. उनका मुकाबला BJP के मनोज तिवारी से था. कन्हैया को करीब 6.86 लाख वोट मिले, जबकि मनोज तिवारी को करीब 8.24 लाख वोट मिले. कन्हैया करीब 1.39 लाख वोटों के अंतर से चुनाव हार गए.
इस हार के साथ कन्हैया कुमार के लोकसभा चुनावी रिकॉर्ड में दो चुनाव और दो हार दर्ज हो गईं. 2019 में बेगूसराय और 2024 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में राष्ट्रीय पहचान होने के बावजूद वे संसद तक नहीं पहुंच सके.
यूथ ब्रिगेड में बड़ा नाम, फिर चुनावी जीत क्यों नहीं?
कन्हैया कुमार की राजनीतिक पहचान और चुनावी प्रदर्शन के बीच अंतर उनकी राजनीति का सबसे बड़ा सवाल है. उनका राष्ट्रीय कद मुख्य रूप से छात्र राजनीति, भाषणों और राष्ट्रीय राजनीतिक बहसों से बना. लेकिन लोकसभा चुनाव में जीत के लिए केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता पर्याप्त नहीं होती. स्थानीय संगठन, बूथ स्तर की मशीनरी, क्षेत्रीय सामाजिक समीकरण, गठबंधन और उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता भी भूमिका निभाते हैं.
NSUI की जिम्मेदारी कब मिली?
कांग्रेस में सक्रिय भूमिका बढ़ने के साथ कन्हैया कुमार को छात्र राजनीति की जिम्मेदारी भी मिली. 2026 में वे कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI के प्रभारी की भूमिका में हैं. इसका मतलब है कि अब उनकी राजनीतिक परीक्षा केवल व्यक्तिगत चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. छात्र संगठन को विश्वविद्यालयों में मजबूत करना भी उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा है.
DUSU चुनाव में NSUI की हार क्यों बनी सवाल?
सितंबर 2026 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के नतीजे कांग्रेस और NSUI के लिए महत्वपूर्ण रहे. DUSU के चार केंद्रीय पदों में ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद जीते, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन के खाते में गया. NSUI चारों केंद्रीय पदों में जीत हासिल नहीं कर सकी.
कन्हैया कुमार के लिए यह नतीजा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे NSUI की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. ऐसे में छात्र संगठन के प्रदर्शन और चुनावी रणनीति पर सवाल उठना स्वाभाविक था.
राहुल गांधी ने DUSU चुनाव के बाद कन्हैया को क्यों बुलाया?
DUSU चुनाव परिणाम के बाद राहुल गांधी ने कन्हैया कुमार और NSUI अध्यक्ष विनोद जाखड़ के साथ बैठक की. रिपोर्टों के अनुसार बैठक में चुनावी प्रदर्शन, उम्मीदवारों के चयन और संगठन की रणनीति पर चर्चा हुई. यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय देश के सबसे चर्चित छात्र राजनीतिक केंद्रों में शामिल है और DUSU का चुनाव छात्र संगठनों के लिए बड़ा संगठनात्मक परीक्षण माना जाता है.
कन्हैया कुमार का राइज टाइमलाइन
- बेगूसराय से छात्र राजनीति की शुरुआत.
- AISF से जुड़कर छात्र राजनीति में सक्रियता.
- 2015 में JNU छात्रसंघ अध्यक्ष बने.
- 2016 के JNU विवाद और गिरफ्तारी के बाद राष्ट्रीय पहचान बनी.
- 2018 में CPI National Council में पहुंचे.
- 2019 में CPI के टिकट पर बेगूसराय से लोकसभा चुनाव लड़ा, हार मिली.
- 2021 में CPI छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए.
- 2024 में कांग्रेस के टिकट पर उत्तर-पूर्वी दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ा, दूसरी बार हार मिली.
- 2026 में NSUI की जिम्मेदारी संभाली.
- सितंबर 2026 में DUSU चुनाव में NSUI के प्रदर्शन पर सवाल उठे.
क्या छात्र राजनीति और रियल पॉलिटिक्स का खेल अलग है?
स्टेट मिरर की ओर से यह पूछे जाने पर कि कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार रियल पॉलिटिक्स में अपेक्षित सफलता क्यों हासिल नहीं कर पा रहे हैं और उनकी राजनीतिक क्षमता पर सवाल क्यों उठने लगे हैं, JNU की एक प्रोफेसर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं. उनके मुताबिक, छात्र नेता होना और रियल पॉलिटिक्स में सक्रिय होना दो अलग चीजें हैं. दोनों के नियम, समीकरण और राजनीतिक खेल अलग होते हैं.
जेएनयू के प्रोफेसर के मुताबिक यूनिवर्सिटी की राजनीति में कोई बयान या भाषण अचानक लोकप्रिय हो सकता है. वह कुछ समय के लिए बहस का विषय बन सकता है और सोशल मीडिया पर भी वायरल हो सकता है. लेकिन केवल इससे कोई व्यक्ति जमीनी राजनीति का बड़ा नेता नहीं बन जाता.
क्या तर्क और भाषण से ही बड़ा नेता बन सकते हैं?
JNU प्रोफेसर के मुताबिक, अगर केवल तर्क और भाषण देने की क्षमता से ही कोई बड़ा राजनेता बनता, तो कपिल सिब्बल जैसे नेता देश की राजनीति में सबसे बड़े नेताओं में होते. उनके पास तर्क रखने की क्षमता है, लेकिन रियल पॉलिटिक्स की कसौटी केवल भाषण और तर्क नहीं है.
उनके अनुसार, असली सवाल यह है कि नेता की राजनीतिक समझ क्या है, उसका सामाजिक आधार कितना मजबूत है और वह अपनी सोच से लोगों को कितना जोड़ पाता है.
क्या मीडिया की लोकप्रियता राजनीतिक जनाधार है?
प्रोफेसर ने कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया में लोकप्रिय होना तथा जमीन पर राजनीतिक स्वीकार्यता हासिल करना अलग-अलग चीजें हैं. अगर सोशल मीडिया की लोकप्रियता ही राजनीतिक सफलता का पैमाना होती, तो सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर सबसे सफल राजनेता होते. रियल पॉलिटिक्स में लोगों के बीच लगातार संपर्क और भरोसा कायम करना महत्वपूर्ण है.
क्या यूनिवर्सिटी से चुनावी राजनीति का सफर आसान है?
JNU प्रोफेसर ने कहा कि यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स से रियल पॉलिटिक्स में शिफ्ट होना बेहद कठिन है. उन्होंने योगेंद्र यादव, मेधा पाटकर और इरोम शर्मिला का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग मुद्दों पर मजबूत सार्वजनिक पहचान बनाने के बावजूद चुनावी राजनीति के नियम अलग होते हैं.
उनके मुताबिक चुनावी राजनीति में जाति, धर्म, समुदाय और स्थानीय सामाजिक समीकरण भी भूमिका निभाते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात लोगों से कनेक्टिविटी और उनका भरोसा हासिल करना है.
क्या प्रशांत किशोर और कन्हैया में फर्क है?
प्रोफेसर ने कन्हैया कुमार की तुलना प्रशांत किशोर से करते हुए कहा कि दोनों की राजनीतिक यात्राओं में बड़ा अंतर है. प्रशांत किशोर की राजनीति सफल रही या नहीं, यह अलग सवाल है, लेकिन वे लगातार जमीन पर संघर्ष करते और अपनी मुहिम को आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं. उनके मुताबिक, संघर्ष की ऐसी छवि कन्हैया कुमार में उतनी स्पष्ट दिखाई नहीं देती.
क्या कन्हैया को अब जमीन पर संघर्ष करना होगा?
JNU प्रोफेसर का कहना है कि अगर कन्हैया कुमार को रियल पॉलिटिक्स में अपनी पहचान मजबूत करनी है तो उन्हें जमीन पर लगातार संघर्ष करना होगा. उनके मुताबिक, मीडिया की सुर्खियां या सोशल मीडिया की लोकप्रियता पर्याप्त नहीं है. लोगों के बीच मौजूदगी, सामाजिक आधार और भरोसा हासिल करना ही उनकी अगली राजनीतिक परीक्षा होगी.
क्या मास पॉलिटिक्स में कन्हैया पीछे हैं?
जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर अजय कुमार का कहना है कि रियल पॉलिटिक्स और स्टूडेंट पॉलिटिक्स में फर्क होता है. उनके मुताबिक, कन्हैया कुमार की चुनौती यह हो सकती है कि वह अभी मास पॉलिटिक्स नहीं कर पा रहे हैं. सियासी लैंग्वेज के स्तर पर भी वह एक तय सीमा से नीचे नहीं उतर पाते. जबकि मास पॉलिटिक्स का अपना तरीका होता है, जिसमें हर स्तर पर लोगों और विरोधियों से संवाद करना पड़ता है.
उनके अनुसार, इस मामले में कन्हैया अभी बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं. इसकी एक वजह बीजेपी की आक्रामक राजनीति भी है. जिस स्तर की राजनीतिक भाषा में बीजेपी अपनी बात रखती है, वैसी भाषा की उम्मीद कन्हैया से नहीं की जा सकती.
प्रोफेसर अजय कुमार के मुताबिक, कन्हैया ने पहला चुनाव वामपंथी पार्टी के टिकट पर और दूसरा कांग्रेस के टिकट पर लड़ा. कांग्रेस फिलहाल बीजेपी के सामने कमजोर स्थिति में है. चुनाव में हार-जीत पर राजनीतिक माहौल का भी असर पड़ता है. DUSU चुनाव में NSUI की हार को केवल कन्हैया कुमार से जोड़ना उचित नहीं होगा.
उनके अनुसार, इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों की राजनीतिक सोच और चुनावी पसंद की भी भूमिका होती है. JNU की तुलना में DU का राजनीतिक माहौल अलग है. DUSU चुनाव में स्थानीय समीकरण और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच के समीकरण भी महत्वपूर्ण होते हैं. जाट, गुर्जर, पंजाबी, स्थानीय और बाहरी जैसे वर्गों के बीच के समीकरण चुनाव को प्रभावित करते हैं.




