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किताबों में Jinnah, कैंपस में बवाल - जम्मू यूनिवर्सिटी में क्यों बढ़ा टकराव?

जम्मू यूनिवर्सिटी में M.A. पॉलिटिकल साइंस सिलेबस में Muhammad Ali Jinnah को अल्पसंख्यकों का नेता बताने पर विवाद. छात्र और ABVP ने विरोध किया, यूनिवर्सिटी ने कमेटी बनाई.

Jammu University Jinnah Controversy MA Political Science Syllabus
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( Image Source:  https://www.jammuuniversity.ac.in/https://parepjeddah.org )

जम्मू यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के सिलेबस में जिन्ना को शामिल करने का मामला अचानक विवाद का विषय बन गया. अब इसने ऐसी बहस छेड़ दी है, जो अब कैंपस से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गई है. दरअसल, Muhammad Ali Jinnah को अल्पसंख्यकों के नेता के तौर पर पढ़ाए जाने को लेकर छात्रों और संगठनों के विरोध ने अकादमिक आजादी बनाम राष्ट्रवाद की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है. एक तरफ यूनिवर्सिटी इसे महज शैक्षणिक प्रक्रिया बता रही है, तो दूसरी ओर विरोध करने वाले इसे इतिहास की गलत व्याख्या मान रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर क्लासरूम में क्या पढ़ाया जाए और इसकी सीमा कौन तय करेगा?

Jinnah को ‘अल्पसंख्यकों के नेता’ बताने पर विवाद क्यों?

जम्मू यूनिवर्सिटी में M.A. पॉलिटिकल साइंस के सिलेबस को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. सिलेबस में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को अल्पसंख्यकों और राष्ट्रों के संदर्भ में शामिल किए जाने पर छात्रों के एक वर्ग ने आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि जिन्ना को इस रूप में पेश करना ऐतिहासिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से गलत संदेश दे सकता है. खासकर ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ से जुड़ी उनकी भूमिका को देखते हुए इस प्रस्तुति को लेकर संवेदनशीलता बढ़ गई है. यही वजह है कि यह मुद्दा अकादमिक दायरे से निकलकर राजनीतिक और वैचारिक बहस का रूप ले चुका है.

क्या यूनिवर्सिटी ने इस विवाद को गंभीरता से लिया?

विवाद बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने तुरंत कदम उठाते हुए एक उच्च-स्तरीय जांच समिति का गठन किया है. कुलपति Umesh Rai के निर्देश पर बनी इस कमेटी की अध्यक्षता प्रोफेसर नरेश पाधा कर रहे हैं. इस पैनल में दर्शनशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र और स्ट्रेटेजिक स्टडीज विभाग के प्रमुख भी शामिल हैं. ताकि विषय का बहु-आयामी विश्लेषण हो सके. समिति को निर्देश दिया गया है कि वह सिलेबस की पूरी समीक्षा कर जल्द रिपोर्ट सौंपे. यह कदम दर्शाता है कि प्रशासन इस मुद्दे को केवल एक छात्र विरोध नहीं, बल्कि व्यापक अकादमिक और सामाजिक चिंता के रूप में देख रहा है.

ABVP का विरोध किस आधार पर?

इस विवाद का सबसे मुखर विरोध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की ओर से सामने आया है. संगठन का आरोप है कि सिलेबस में जिन्ना और सर सैयद अहमद खान जैसे व्यक्तित्वों को “अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधि” के रूप में प्रस्तुत करना गलत है, क्योंकि ये वही लोग हैं जिनकी विचारधारा ने भारत के विभाजन को जन्म दिया. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ऐसे विषयों को पढ़ाने से छात्रों में भ्रम पैदा हो सकता है और राष्ट्रीय भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर सिलेबस में बदलाव नहीं किया गया, तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू करेंगे.

क्या यह एकेडमिक आजादी बनाम राष्ट्रवाद का टकराव है?

यह पूरा विवाद बड़े प्रश्न को जन्म देता है. विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली सामग्री पूरी तरह एकेडमिक एप्रोच से तय होनी चाहिए या उसमें राष्ट्रीय भावनाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए? विरोध करने वाले पक्ष का मानना है कि अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे व्यक्तित्वों को सकारात्मक या संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करना उचित नहीं है. वहीं, दूसरी ओर कई शिक्षाविदों का तर्क है कि इतिहास और राजनीति को समझने के लिए सभी पक्षों को पढ़ाना जरूरी है, चाहे वे कितने ही विवादित क्यों न हों.

विश्वविद्यालय और विभाग जिन्ना का बचाव कैसे कर रहे हैं?

पॉलिटिकल साइंस विभाग के प्रमुख प्रो. बलजीत सिंह मान ने सिलेबस का बचाव करते हुए स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह अकादमिक उद्देश्य से तैयार किया गया है. उनका कहना है कि जिन्ना या अन्य नेताओं को शामिल करने का मकसद किसी का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि छात्रों को विभिन्न दृष्टिकोणों से परिचित कराना है. उन्होंने यह भी कहा कि यह सिलेबस देश की अन्य विश्वविद्यालयों और यूजीसी (UGC) के दिशानिर्देशों के अनुरूप है. विभाग का मानना है कि छात्रों को इतिहास और राजनीति के जटिल पहलुओं को समझने के लिए आलोचनात्मक सोच विकसित करनी चाहिए, न कि एकतरफा नजरिया अपनाना चाहिए.

आगे क्या - सिलेबस में बदलाव संभव है?

अब इस पूरे मामले की दिशा काफी हद तक जांच समिति की रिपोर्ट पर निर्भर करेगी. यदि समिति को लगता है कि सिलेबस में बदलाव जरूरी है, तो संशोधन किए जा सकते हैं. वहीं, अगर अकादमिक दृष्टिकोण को सही ठहराया गया, तो सिलेबस यथावत रह सकता है. फिलहाल यह विवाद सिर्फ एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देशभर में “अकादमिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय संवेदनशीलता” की बहस को फिर से जिंदा कर चुका है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विश्वविद्यालय इस संतुलन को कैसे साधता है और क्या यह मामला अन्य शैक्षणिक संस्थानों में भी असर डालता है.

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