Company ही Exist नहीं करती, फिर 13.5 करोड़ किससे लिया? I-PAC का फाइनेंस गेम समझ से बाहर, मचा बवाल
राजनीतिक रणनीति बनाने वाली कंपनी I-PAC एक बार फिर विवादों में है. दस्तावेजों की जांच में सामने आया है कि I-PAC ने 2021 में रोहतक स्थित ‘Ramasetu Infrastructure India (P) Limited’ से 13.5 करोड़ रुपये का अनसिक्योर्ड लोन लेने का दावा किया था, लेकिन यह कंपनी आधिकारिक रिकॉर्ड्स में मौजूद ही नहीं है.
पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हस्तक्षेप के बाद से राजनीतिक रणनीति बनाने वाली कंपनी I-PAC लगातार सुर्खियों में है. लेकिन अब मामला सिर्फ सर्च या सियासत तक सीमित नहीं रहा. एक कथित लोन ट्रांजैक्शन ने I-PAC की फाइनेंशियल पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जांच में सामने आया है कि I-PAC ने जिस कंपनी से 13.5 करोड़ रुपये का लोन लेने का दावा किया, वह कंपनी कागज़ों में ही मौजूद नहीं है.
यह खुलासा ऐसे समय पर हुआ है, जब पहले से ही I-PAC और उसके डायरेक्टर को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल मची हुई है. सवाल यह नहीं है कि लोन लिया गया या नहीं, सवाल यह है कि अगर लिया गया, तो आखिर किससे?
कागज़ों में दर्ज लोन, जमीन पर नहीं मिला कोई सबूत
रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़ (ROC) के दस्तावेजों के मुताबिक, I-PAC ने 17 दिसंबर 2021 की एक फाइलिंग में दावा किया कि उसे ‘Ramasetu Infrastructure India (P) Limited’ नाम की एक कंपनी से 13.50 करोड़ रुपये का “अनसिक्योर्ड लोन” मिला है. लोन देने वाली कंपनी का पता हरियाणा के रोहतक स्थित अशोका प्लाज़ा, दिल्ली रोड बताया गया. लेकिन जब इसी पते की भौतिक जांच की गई, तो वहां ऐसी किसी कंपनी के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं मिला. इतना ही नहीं, ROC रिकॉर्ड्स में भी ‘Ramasetu Infrastructure India (P) Limited’ नाम की किसी कंपनी के रजिस्ट्रेशन का कोई रिकॉर्ड नहीं है.
तीन साल पहले कंपनी हो चुकी थी बंद
ROC रिकॉर्ड्स में एक मिलती-जुलती कंपनी जरूर दर्ज है ‘Ramsetu Infrastructure India Private Limited’. यह कंपनी अक्टूबर 2013 में उसी रोहतक पते पर रजिस्टर्ड हुई थी, लेकिन अगस्त 2018 में इसे आधिकारिक तौर पर बंद (Strike Off) कर दिया गया था. यानी जिस कंपनी से 2021 में लोन लेने का दावा किया गया, वह तीन साल पहले ही अस्तित्व में नहीं थी. इससे सवाल और गहरे हो जाते हैं कि I-PAC ने अपने दस्तावेजों में किस संस्था का नाम लिखा और किस आधार पर इतना बड़ा फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन दिखाया गया.
शेयरधारकों ने भी किया लोन से इनकार
Ramsetu Infrastructure India Private Limited के छह शेयरधारकों विक्रम मुंजाल, संदीप राणा, विजेंदर, बलजीत जांगड़ा, प्रदीप कुमार और जगबीर सिंह सभी ने किसी भी तरह के लोन या I-PAC से लेनदेन की जानकारी होने से साफ इनकार किया है. इनका कहना है कि कंपनी कुछ सालों में ही बंद हो गई थी और कोई बड़ा व्यवसाय या फाइनेंशियल डील कभी हुई ही नहीं. कुछ शेयरधारकों ने यह भी कहा कि वे अब एक-दूसरे के संपर्क में तक नहीं हैं.
I-PAC का दावा: लोन चुकाने की भी एंट्री
मामले को और उलझाने वाली बात यह है कि I-PAC ने 27 जून 2025 की एक और फाइलिंग में दावा किया कि उसने 2024-25 के दौरान इस लोन में से 1 करोड़ रुपये चुका भी दिए हैं. यानी कंपनी के मुताबिक अब भी 12.5 करोड़ रुपये बकाया हैं. लेकिन जब लोन देने वाली कंपनी ही रिकॉर्ड्स में मौजूद नहीं है, तो यह भुगतान किसे किया गया. इस सवाल का जवाब अभी तक सामने नहीं आया है.
जवाब से बचते दिखे I-PAC के जिम्मेदार लोग
इस पूरे मामले पर जब I-PAC के को-फाउंडर और डायरेक्टर प्रतीक जैन से सवाल किए गए, तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. कंपनी की चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी ने भी इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. यह चुप्पी ऐसे वक्त में और ज्यादा सवाल खड़े करती है, जब दस्तावेज़ी विसंगतियां सामने आ चुकी हैं और मामला सार्वजनिक जांच के दायरे में आ गया है.
क़ब बनी थी कंपनी
ROC दस्तावेजों के अनुसार, Ramsetu Infrastructure India Private Limited को कंपनियों अधिनियम की धारा 248(1) के तहत बंद किया गया था, जो उन कंपनियों पर लागू होती है, जो कारोबार शुरू नहीं कर पातीं या वैधानिक शर्तें पूरी नहीं करतीं. वहीं I-PAC की बात करें तो यह कंपनी 2015 में पटना में रजिस्टर्ड हुई थी और 2022 में इसका रजिस्टर्ड ऑफिस कोलकाता शिफ्ट किया गया. इसके डायरेक्टर और शेयरहोल्डर अब तक वही बने हुए हैं.
राजनीति, फंडिंग और पारदर्शिता पर सवाल
यह मामला अब सिर्फ एक फाइनेंशियल गड़बड़ी का नहीं रहा. राजनीतिक रणनीति गढ़ने वाली कंपनी की फंडिंग को लेकर उठे सवाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया और पारदर्शिता दोनों पर असर डालते हैं. जब एक गैर-मौजूद कंपनी के नाम पर करोड़ों रुपये के लेनदेन का दावा सामने आए, तो जांच एजेंसियों और नियामक संस्थाओं की भूमिका अपने आप सवालों के घेरे में आ जाती है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि इस कथित लोन की असल सच्चाई क्या है और इसके पीछे जिम्मेदारी किसकी बनती है.





