2026 का सियासी कैलेंडर: 5 राज्यों के चुनाव, ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’, जनगणना-परिसीमन… किसके पक्ष में बनेगा माहौल?
2026 भारतीय राजनीति के लिए निर्णायक साल बनने जा रहा है. 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव, एक राष्ट्र एक चुनाव, जनगणना और परिसीमन जैसे मुद्दों पर सियासी घमासान तय है- जानिए किसका पलड़ा भारी दिख रहा है.
साल 2026 भारतीय राजनीति के लिए सिर्फ एक और चुनावी वर्ष नहीं, बल्कि सिस्टम, सत्ता और संतुलन की अग्निपरीक्षा बनने जा रहा है. इसको लेकर विपक्ष और बीजेपी दोनों अभी से संजीदा दिखाई दे रही है. एक तरफ 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, तो दूसरी ओर केंद्र सरकार के एजेंडे में शामिल ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’, जनगणना और परिसीमन जैसे मुद्दे विपक्ष के लिए बड़े हथियार साबित हो सकते हैं. यही वजह है कि 2026 का सियासी कैलेंडर पहले से ही टकराव, रणनीति और ध्रुवीकरण से भरा नजर आ रहा है. विधायी प्रस्तावों को लेकर बवाल मचने की भी संभावना है.
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2026 में इन राज्यों में होंगे चुनाव
बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों में इस साल विधानसभा चुनाव, राज्यसभा सदस्यों के चुनाव, नक्सलवाद और जनगणना से लेकर कुछ विवादित विधायी प्रस्तावों और बड़ी पार्टियों में नेतृत्व परिवर्तन तक, नया साल घटनाओं से भरा और उथल-पुथल वाला होने वाला है.
नया साल कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों का गवाह बनने वाला है जो देश में राजनीति और शासन की व्यापक दिशा तय कर सकते हैं। बड़े दांव वाले राज्य चुनावों से लेकर कुछ विवादित विधायी प्रस्तावों तक, और बड़ी पार्टियों में नेतृत्व परिवर्तन या बदलाव तक – 2026 सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी कांग्रेस सहित कई प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ियों के लिए हिसाब-किताब का साल होने की संभावना है.
साल 2024 के लोकसभा चुनावों में औसत सफलता के बाद, भाजपा ने अपनी गति फिर से पकड़ ली है. झारखंड को छोड़कर, पार्टी ने तब से दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की है. हालांकि, जम्मू और कश्मीर चुनाव नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने जीता, लेकिन भाजपा ने जम्मू क्षेत्र में मजबूत प्रदर्शन किया, जिससे वहां उसकी संगठनात्मक ताकत मजबूत हुई.
विपक्ष के लिए 2026 अहम क्यों?
लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष के लिए राहत वाली कोई खबर सामने नहीं आई है. झारखंड विधानसभा चुनाव जेएमएम कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव जीतने में जरूर सफल रही, लेकिन अब हेमंत सोरेन का रुख केंद्र के मिलकर काम करने की है. ऐसे में बीजेपी के लिए चुनावी चक्र अहम साबित होने वाला है.
15 जनवरी को BMC चुनाव के लिए डाले जाएंगे वोट
विपक्ष के सामने चुनौतियों की भरमार है. उसे राजनीतिक गति की तत्काल आवश्यकता है और पहली परीक्षा 15 जनवरी को महाराष्ट्र भर में 28 अन्य नगर निगमों के साथ होने वाले बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) चुनावों के रूप में होगी. 16 जनवरी को मतगणना के बाद परिणाम घोषित किए जाएंगे. भारत के सबसे अमीर नागरिक निकाय पर नियंत्रण का मतलब न केवल प्रशासनिक शक्ति है, बल्कि इसका बहुत बड़ा सियासी महत्व भी है.
पश्चिम बंगाल : ध्रुवीकरण से BJP को नहीं होगा फायदा
पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा देखे जाने वाले मुकाबलों में से एक का गवाह बनने जा रहा है. भाजपा एक बार फिर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती दे रही है, जो लगातार तीन कार्यकालों के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सत्ता से हटाने की कोशिश कर रही है. हालांकि, TMC का जमीनी स्तर पर संगठनात्मक नेटवर्क और उसका समर्थन आधार काफी मजबूत बना हुआ है. जबकि बनर्जी के पास अभी भी काफी राजनीतिक पूंजी है.
कुछ अन्य राज्यों के विपरीत, बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण का मतलब अपने आप भाजपा के लिए फायदा नहीं होता है. TMC मुस्लिम मतदाताओं के अनुमानित 30% की वफादारी बनाए हुए है. लेफ्ट और कांग्रेस, दोनों ही 2021 के चुनावों में एक भी सीट जीतने में नाकाम रहे और अब उन्हें अपनी राजनीतिक पहचान फिर से बनाने के लिए कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
तमिलनाडु : DMK और AIADMK का दबदबा
तमिलनाडु का सियासी माहौल दो-ध्रुवीय रहा है, जिस पर द्रविड़ पार्टियों DMK और AIADMK का दबदबा रहा है. सत्ताधारी DMK ने अपने कल्याणकारी शासन मॉडल और कमजोर, बंटी हुई AIADMK आगामी चुनाव में जीत हासिल करने के लिए तैयारी में जुटी गई है.
लोकप्रिय फिल्म स्टार विजय के राजनीति में आने से अनिश्चितता की एक और परत जुड़ गई है. उनकी मौजूदगी कई सवाल खड़े करती है. क्या वह विपक्ष के वोटों को बांटेंगे? क्या उनकी अपील पार्टी लाइनों से ऊपर होगी? क्या वह वोटों के बंटवारे को रोकने के लिए AIADMK के साथ कोई अनौपचारिक समझौता कर सकते हैं?
क्या मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के नेतृत्व में DMK की लोकलुभावन नीतियां लगातार दूसरा कार्यकाल हासिल करने के लिए पर्याप्त होंगी? अप्रैल में प्रस्तावित चुनाव से ही इन सवालों के जवाब मिलेंगे.
असम : बीजेपी का गठबंधन मजबूत
असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर अग्नि परीक्षा का सामना करेगी. वह विपक्ष में एक दशक बिताने के बाद सत्ता में लौटने की कोशिश में जुटी है. जबकि BJP एक मजबूत गठबंधन के साथ मैदान में उतरी है, जिसमें असम गण परिषद (AGP) और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) शामिल हैं. असम में ध्रुवीकरण की राजनीति BJP के पक्ष में जाता है.
कांग्रेस ने CPI (M), रायजोर दल, असम जातीय परिषद, CPI, CPI(ML), जातीय दल-असम और कार्बी आंगलोंग स्थित ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियों को मिलाकर एक बड़ा गठबंधन बनाया है. हालांकि, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के साथ गठबंधन न करने का उसका फैसला मुस्लिम वोटों के बंटवारे का कारण बन सकता है, जिससे विपक्ष की चुनावी संभावनाएं कमजोर हो सकती हैं.
केरल : LDF कमजोर, UDF को चुनौती दे पाएगी BJP?
केरल के चुनाव राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकते हैं. अगर हाल के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे कोई संकेत हैं, तो सत्ताधारी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) कमजोर स्थिति में दिख रहा है. जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) उत्साहित है. लेफ्ट की हार का मतलब होगा कि लगभग पांच दशकों में पहली बार, भारत में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा.
BJP केरल की राजनीति में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही है और धीरे-धीरे बढ़त हासिल करने की उम्मीद कर रही है. वह आगामी राज्य चुनावों में दो अंकों की सीटों का लक्ष्य बना रही है. हाल ही में बीजेपी को निकाय चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी सफलता मिली है. यह मुकाबला विपक्षी INDIA ब्लॉक के अंदरूनी समीकरणों और डायनामिक्स की भी परीक्षा लेगा, क्योंकि लेफ्ट और कांग्रेस दोनों ही इसके प्रमुख घटक हैं.
पुडुचेरी : NDA गठबंधन में सब कुछ अच्छा नहीं
पुडुचेरी में एन. रंगासामी के नेतृत्व में ऑल इंडिया एन.आर. कांग्रेस यानी कि AINRC और बीजेपी का गठबंधन सत्ता में है. 2021 में 30 सीटों वाली विधानसभा में AINRC ने 10 और बीजेपी ने 6 सीटें जीती थीं, लेकिन फिलहाल गठबंधन में सब कुछ अच्छा होता नहीं दिख रहा. विपक्ष में DMK और कांग्रेस जैसी पार्टियां इस छोटे लेकिन महत्वपूर्ण केंद्र शासित प्रदेश की सत्ता पर अपना दावा मजबूती से पेश करती दिख रही हैं. पुडुचेरी में लोकल गवर्नेंस और विकास के मुद्दे प्रमुख हैं. ऐसे में ये चुनाव बीजेपी के लिए दक्षिण में गठबंधन बचाने का टेस्ट है, जहां एंटी-इनकंबेंसी है. यदि कांग्रेस और DMK की फिर से हार होती है तो उनके लिए पुडुचेरी में अपना संगठन बचाना मुश्किल हो सकता है.
एक राष्ट्र, एक चुनाव
मोदी सरकार 2026 के दौरान सबसे ज्यादा विवादित राजनीतिक बहसों में से एक नरेंद्र मोदी सरकार के देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के प्रस्ताव पर केंद्रित हो सकती है, जिसे आमतौर पर "एक राष्ट्र, एक चुनाव" कहा जाता है. बीजेपी के लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक लक्ष्य जैसे अनुच्छेद 370 को खत्म करना, अयोध्या में राम मंदिर और यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए दबाव पहले ही पूरे किए जा चुके हैं. अब एक साथ चुनाव पार्टी की नई राजनीतिक परियोजनाओं के हिस्से के रूप में उभर रहे हैं. हालांकि, बीजेपी के पास इसके लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत दोनों सदनों में किसी भी सदन में नहीं है.
2026 में होगा नक्सलवाद का अंत?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश में वामपंथी उग्रवाद या नक्सलवाद को खत्म करने के लिए मार्च 2026 की समय सीमा तय की है. पिछले साल छत्तीसगढ़ और कुछ पड़ोसी राज्यों में माओवादी विरोधी अभियानों में तेजी देखी गई, जिसमें वरिष्ठ नक्सली नेताओं की हत्याएं और माओवादियों के आत्मसमर्पण में वृद्धि शामिल है. नक्सलियों के खिलाफ केंद्र के सुरक्षा दृष्टिकोण पर सीमित राजनीतिक विरोध के साथ, कुछ बहसें NDA की रणनीति की तुलना UPA द्वारा इस मुद्दे को संभालने के तरीके से करने पर केंद्रित होने की संभावना है. बता दें कि पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने एक बार नक्सलवाद को "भारत के लिए सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा खतरा" बताया था.
जनगणना के साथ परिसीमन, होगी जाति की गिनती
16 साल के अंतराल के बाद भारत की दशकीय जनगणना आखिरकार 2026 में शुरू होगी. यह देश की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना होगी और आजादी के बाद पहली जनगणना होगी, इसमें जाति की गिनती शामिल होगी. शुरुआती घर-घर जाकर गिनती का चरण अप्रैल से सितंबर 2026 तक चलेगा, जिसके बाद फरवरी 2027 में जनसंख्या गणना होगी.
वैकल्पिक फार्मूले पर विचार संभव
जनगणना में देरी से पहले ही कई विवाद हो चुके हैं, और परिसीमन का मुद्दा - जो 2026 के बाद पहली जनगणना के बाद अनिवार्य है - राजनीतिक तनाव को बढ़ाने की उम्मीद है. दक्षिणी राज्यों को डर है कि अगर जनसंख्या परिसीमन का एकमात्र मानदंड बन जाती है तो वे संसदीय प्रतिनिधित्व खो देंगे. हालांकि, परिसीमन की प्रक्रिया तभी शुरू होगी जब जनगणना के अंतिम आंकड़े उपलब्ध हो जाएंगे, लेकिन खबर है कि केंद्र सरकार अलग-अलग हितों को संतुलित करने के लिए वैकल्पिक फॉर्मूलों पर विचार कर रही है.
नितिन नवीन बनेंगे स्थायी अध्यक्ष!
बीजेपी 2026 के पहले छमाही में औपचारिक रूप से अपने नए नेतृत्व को स्थापित करने जा रही है, जिसमें बिहार के मंत्री और पांच बार के विधायक नितिन नवीन, जो पार्टी के नवनियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं, को पार्टी अध्यक्ष चुना जाएगा. नवीन के सामने चुनौती होगी कि वे बीजेपी की चुनावी जीत की लय को बनाए रखें. साथ ही पूर्वी और दक्षिणी भारत में पार्टी के विस्तार पर जोर दें.
दूसरी तरफ, विपक्षी समूह अभी भी बिखरा हुआ है. कांग्रेस ने आजीविका और आर्थिक मुद्दों पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने का संकेत दिया है. MGNREGA की जगह G राम G कानून 2025 लाने के खिलाफ देशव्यापी अभियान चलाने की योजना बना रही है.
राज्यसभा चुनाव
अप्रैल और जून में 17 राज्यों की 59 सीटों के लिए राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनावों से बीजेपी और कांग्रेस दोनों को थोड़ा फायदा होने की संभावना है, जिसमें सत्ताधारी NDA को विभिन्न राज्यों में मौजूदा विधानसभा सीटों के आधार पर अधिक महत्वपूर्ण लाभ होने की उम्मीद है.
कुल मिलाकर, 2026 का सियासी कैलेंडर साफ संकेत देता है कि यह साल सिर्फ चुनावों का नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला मोड़ हो सकता है. 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव, ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’, जनगणना और परिसीमन, ये सभी मिलकर सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक युद्ध को और तीखा करेंगे. फिलहाल, इतना तय है कि 2026 में सियासत शांत नहीं, निर्णायक होगी.





