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जनसंख्या विस्फोट नहीं, जनसंख्या संकट कहिए जनाब! 145 करोड़ की आबादी के बावजूद भारत में क्यों ऐसी स्थिति, Explainer

जिस देश को कभी 'जनसंख्या विस्फोट' का खतरा बताया जाता था, वहीं अब जन्मदर इतनी गिर चुकी है कि भविष्य में आबादी घटने की आशंका जताई जा रही है.

जनसंख्या विस्फोट नहीं, जनसंख्या संकट कहिए जनाब! 145 करोड़ की आबादी के बावजूद भारत में क्यों ऐसी स्थिति, Explainer
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( Image Source:  AI Created )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय8 Mins Read

Updated on: 7 Jun 2026 9:36 AM IST

1970 के दशक में दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में हर तरफ बच्चों की किलकारियां गूंजती थी. उस दौर में महिलाएं बड़े परिवारों में पली-बढ़ीं, जहां 6 से 11 भाई-बहन होना एक आम बात थी. ज्यादातार उस दौर में 16 साल की उम्र में लड़कियों की शादी हो जाती थी बाकि बचते थे सात भाई-बहन थे. लेकिन आज 58 वर्ष की उम्र में एक कमरे के फ्लैट में रहने वाली सीमा के परिवार की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. उनके तीन वयस्क बच्चों में से केवल दो ने ही आगे बच्चे पैदा किए, और दोनों ने ही 'एक बच्चे' के बाद फैमिली प्लानिंग अपना लिया. सीमा कहती हैं, 'एक बच्चा अकेला महसूस करता है, लेकिन आज की हकीकत यही है.' यह कहानी सिर्फ सीमा के परिवार की नहीं है, बल्कि पूरे भारत की है. भारत, जिसे कभी 'जनसंख्या विस्फोट' का केंद्र माना जाता था, अब एक ऐसे जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है, जिसकी कल्पना कुछ दशकों पहले किसी ने नहीं की थी.

1. जनसंख्या के आंकड़े: अतीत से वर्तमान तक

सन् 1950 में भारत की कुल आबादी महज 360 मिलियन (36 करोड़) थी और तब एक औसत भारतीय महिला के करीब छह बच्चे होते थे. आज 2026 में, भारत की जनसंख्या 1.45 बिलियन (145 करोड़) तक पहुंच चुकी है, जो दुनिया की कुल आबादी का छठवां हिस्सा (18%) है. साल 2023 में ही भारत ने चीन को पछाड़कर दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश का तमगा हासिल किया था. लेकिन इस विशाल आबादी के पीछे एक चौंकाने वाला सच छिपा है. भारत की कुल प्रजनन दर (TFR - Total Fertility Rate), यानी एक महिला द्वारा अपने जीवनकाल में औसतन बच्चों को जन्म देने की संख्या, घटकर 1.9 रह गई है.

अगर वर्तमान में जो बच्चे हैं, वे आने वाले समय में माता-पिता बनेंगे, जिससे आबादी कुछ समय तक बढ़ती रहेगी, लेकिन अगर प्रजनन दर 2.15 के स्तर को पार नहीं करती, तो भविष्य में भारत की जनसंख्या में भारी गिरावट आना तय है.

2. राजनेताओं की चिंता और बदलती नीतियां

दुनिया के समृद्ध और मध्यम आय वाले देश पहले से ही घटते वर्कफोर्स और बूढ़ी होती आबादी से परेशान हैं. वहां की सरकारें माता-पिता को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए नकद इनाम या रियायतें देती हैं, जिसका कोई खास असर नहीं दिख रहा है. अब भारत भी इसी कतार में शामिल हो गया है.

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बदलता नजरिया: साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'जनसंख्या विस्फोट' की चेतावनी दी थी. लेकिन उनके सलाहकार संजीव सान्याल के मुताबिक, अब सरकार की सोच बदल गई है क्योंकि भारत भी अब चीन के रास्ते पर है, जिसकी आबादी 2021 से लगातार घट रही है.

3. यह बदलाव क्यों आया? मुख्य कारण

आमतौर पर माना जाता था कि जब कोई देश अमीर होता है, महिलाएं ज्यादा कामकाजी होती हैं और देर से शादी करती हैं, तब प्रजनन दर गिरती है. लेकिन भारत में 90% से अधिक महिलाएं शादी करती हैं और केवल 33% ही कामकाज में शामिल हैं. इसके बावजूद यहां प्रजनन दर तेजी से गिर रही है. इसके पीछे तीन मुख्य सामाजिक और सांस्कृतिक कारण हैं:

- क्वांटिटी वर्सेज क्वालिटी

मॉडर्न भारतीय माता-पिता अब ज्यादा बच्चों के बजाय एक या दो बच्चों को ही बेहतर भविष्य देना चाहते हैं. चेन्नई की 42 वर्षीय संजिनी रमन बताती हैं कि उन्होंने और उनके पति ने तय किया कि वे अपने सारे संसाधन अपनी इकलौती बेटी पर खर्च करेंगे. उसकी पढ़ाई और निजी ट्यूशन का खर्च ही करीब ₹35 लाख बैठता है.

प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता ट्रेंड:

साल 2015 में फी-बेस्ड प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले भारतीय बच्चों का अनुपात 31.7% था

साल 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 38.8% हो गया है

यह चलन बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्यों में भी देखा जा रहा है, जहां माता-पिता केवल एक बच्चा पैदा कर रहे हैं ताकि उसे अच्छी ट्यूशन दिला सकें

- संयुक्त परिवारों का बिखरना

साल 2001 तक भारत के लगभग आधे परिवार संयुक्त (Multi-generational) होते थे, जहां दादा-दादी, चाचा-चाची सब साथ रहते थे और बच्चों की देखभाल मिलकर हो जाती थी. शहरीकरण और नौकरियों के कारण आज 70% परिवार एकल (Nuclear) हो चुके हैं. इससे बच्चों की देखभाल का पूरा बोझ माता-पिता पर आ गया है, जिससे वे छोटा परिवार रखना पसंद कर रहे हैं.

- स्मार्टफोन और कल्चर में बदलाव

पहले माना जाता था कि केवल शिक्षा ही प्रजनन दर घटाती है (लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के लैंट प्रिचेट के अनुसार, लड़कियों का स्कूल जाना सबसे बड़ा कारक है). लेकिन अब स्मार्टफोन और केबल टीवी ने इस बदलाव को गांवों तक पहुंचा दिया है. टीवी धारावाहिकों और सोशल मीडिया वीडियो में दिखाए जाने वाले छोटे, सुखी और मॉडर्न परिवारों को देखकर ग्रामीण महिलाओं की सोच भी बदल गई है. वे अब एक बेटी होने पर भी संतुष्ट हैं, जिससे 'लड़के की चाहत' में होने वाले लगातार जन्मों पर रोक लगी है.

4. भविष्य का अनुमान: जनसंख्या कब चरम पर होगी?

विभिन्न संस्थाओं और जनसांख्यिकी विशेषज्ञों (demographers) के पास भारत की जनसंख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं:

पीक पॉपुलेशन का अनुमानित टाइमलाइन

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के IHME मॉडल के अनुसार, सदी के अंत तक (साल 2100) भारत की आबादी में करीब आधा अरब (50 करोड़) की कमी आएगी और यह घटकर महज एक अरब के आसपास रह जाएगी. डेटा की कमी (क्योंकि आखिरी पूर्ण जनगणना 2011 में हुई थी, के कारण सटीक गति को भांपना थोड़ा कठिन है, लेकिन गिरावट तय है.

5. दूर तक जाने वाले इसके गंभीर प्रभाव

कम बच्चों वाले भारत की यह तस्वीर पूरी तरह सुखद नहीं है. इसके समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर गहरे प्रभाव पड़ेंगे:

अमीर होने से पहले बुढ़ापा: भारत अपनी आर्थिक तरक्की के चरम पर पहुंचने से पहले ही बूढ़ा होने लगेगा. केरल में, जहां TFR 1.3 है, वहां की पांचवीं आबादी 60 वर्ष से अधिक की है और वहां 'वृद्धावस्था प्रबंधन विभाग' बनाना पड़ा है. भारत में केवल 12% वर्कफाॅर्स के पास ही पेंशन सुरक्षा है.

बुजुर्गों की अनदेखी: एकल परिवारों और बच्चों के रोजगार के लिए पलायन करने की वजह से बुजुर्ग गांवों में अकेले छूट रहे हैं. दक्षिण भारत में अब विकसित देशों की तरह ओल्ड एज होम खुल रहे हैं. कुंभ मेले जैसे आयोजनों में बुजुर्गों को छोड़े जाने की दर्दनाक घटनाएं भी बढ़ रही हैं.

उत्तर-दक्षिण राजनीतिक और आर्थिक विवाद: दक्षिण के राज्य (जैसे तमिलनाडु, केरल) अपनी कम जन्मदर के कारण डरे हुए हैं कि संसद में उनकी सीटें कम कर दी जाएंगी, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों का राजनीतिक दबदबा बढ़ेगा. इसके अलावा, दक्षिण के कारखानों और खेतों को चलाने के लिए उत्तर और पूर्वी भारत (जैसे ओडिशा, बिहार) से भारी प्रवासन हो रहा है, जिससे स्थानीय स्तर पर भाषाई और सांस्कृतिक तनाव बढ़ रहा है.

क्या कहना है एक्सपर्ट्स का?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत की प्रजनन दर पिछले 70 सालों से लगातार गिर रही है और इसे किसी राजनेता के उपदेश या सरकारी वित्तीय इनाम से अचानक नहीं बदला जा सकता. भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) यानी कामकाजी आबादी का हिस्सा 2030 तक चरम पर पहुंच सकता है. इसके बाद, आर्थिक गति को बनाए रखने के लिए देश को महिलाओं के श्रम का बेहतर उपयोग करना होगा और एक बूढ़े होते समाज की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करना होगा.

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