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...तो दिल के मरीजों में लगा पेसमेकर भी हो सकता है हैक, जानें- क्या है विशेषज्ञों की राय

दिल की मरीजों की जिंदगी को बचाने के लिए हार्ट इम्प्लांट या पेसमेकर लगाया जाता है. इसके जरिए इंसान की जिंदगी को बचाना संभव है, लेकिन टेक्नोलॉजी के विस्तार की वजह से अहम सवाल यह है कि क्या पेसमेकर या आईसीडी (ICD) को हैक किया जा सकता है. इस स्टोरी के जरिए जानें पूरा सच कि पेसमेकर लगाने वालों की जिंदगी कितनी है सुरक्षित?

...तो दिल के मरीजों में लगा पेसमेकर भी हो सकता है हैक, जानें- क्या है विशेषज्ञों की राय
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( Image Source:  Sora AI )

डिजिटल दौर में जब मोबाइल फोन, कार और घर तक हैक होने की घटनाएं सामने आती रहती है. ऐसे में मेडिकल साइंस के क्षेत्र में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या दिल को नियंत्रित करने वाला पेसमेकर या हार्ट इंप्लांट भी हैक किया जा सकता है? यह सवाल किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन असलियत यह है कि आधुनिक मेडिकल डिवाइसेज अब वायरलेस टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर पर निर्भर हैं. पेसमेकर, ICD (Implantable Cardioverter Defibrillator) और अन्य हार्ट इंप्लांट डॉक्टरों से दूर बैठकर डेटा शेयर करते हैं. ताकि मरीज की स्थिति पर नजर रखी जा सके.

इसी कनेक्टिविटी ने साइबर सिक्योरिटी को लेकर चिंता भी बढ़ा दी है. अहम सवाल है क्या कोई हैकर इन्हें कंट्रोल कर सकता है? अगर हां, तो क्या यह जानलेवा हो सकता है? और सबसे अहम-आम मरीज को कितना डरने की जरूरत है?

इसके बगैर तो मैं मर जाऊंगा

डीडब्ल्यू (dw.com) न्यूज वेबसाइट के मुताबिक अगर आप दिल की बीमारी से जूझ रहे हैं तो हर हर दिन का मतलब एक मौत होता है. ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है. यह एक ऐसा हार्ट इम्प्लांट है जो जान बचाने की बजाय जान लेता है. साइट ने मरीज मार्को स्वाब के हवाले से बताया है कि उन्होंने हार्ट इम्प्लांट के बाद आईसीडी डिवाइस की सहायता से 16 साल की जिंदगी बिताई है. वो क्या सोचते हैं. ईमानदारी से कहूँ तो मुझे थोड़ा डर लगा. आज के सुरक्षा मानकों में भी लापरवाही है. इसे दूर नहीं किया गया तो इसके बगैर तो मैं मर जाऊंगा. .

दरअसल, जेनेटिक समस्या की वजह से मार्के स्वाब का दिल किसी भी वक्त रुक सकता है. ये ट्रांसमीटर उनके दिल से आंकड़े लेकर अस्पताल को भेजता है. अस्पताल के कार्डियो उन पर नजर रख सकते हैं. यह इम्प्लांट उनके सीने में लगे हैं. इम्प्लांट में छोटा पेसमेकर लगा है. जो दिल की धड़कन रुकने पर उसे फिर से चालू कर देता है.

नहीं आया ऐसा मामला सामने

पिछले कुछ सालों के दौरान हार्ट एक्सपर्ट के बीच यह विषय चर्चा का महत्वपूर्ण विषय है. हालांकि, अब तक पेसमेकर हैक करने का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन एक्सपर्ट इस तरह की घटना से पहले पेसमेकर को किसी भी साइबर अटैक से बचाने की फुल प्रूफ तैयारी में जुटे हैं.

हार्ट एक्सपर्ट का कहना है कि हाई एंड पेसमेकर दिल के मरीजों के लिए कारगर है, लेकिन इसके खतरे भी कम नहीं हैं. जिस तरह से साइबर अपराध बढ़ रहा है, उससे हृदय रोगी भी खतरे में हैं. ऐसे में इसके बारे में मरीजों और डॉक्टरों दोनों को जागरूक करने की जरूरत है. कंपनियों को भी इस खतरे से निबटने के लिए हाई एंड पेसमेकर में बैरियर विकसित करना होगा.

हार्ट इम्प्लांट क्या है?

हार्ट इम्प्लांट, जैसे पेसमेकर या ICD, एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है जिसे दिल की धड़कन को रेगुलेट करने के लिए शरीर में लगाया जाता है. पेसमेकर और इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICDs) जैसे डिवाइस दिल की एक्टिविटी पर नजर रखते हैं और असामान्य धड़कन (अरिथमिया) को ठीक करने के लिए इलेक्ट्रिक पल्स या झटके देते हैं. इनमें एक जनरेटर (बैटरी और सर्किटरी) होता है जिसे त्वचा के नीचे लगाया जाता है और तार (लीड) होते हैं जो दिल में डाले जाते हैं.

रिमोट मॉनिटरिंग

मॉडर्न इम्प्लांट डेटा को डॉक्टरों को रिमोट मॉनिटरिंग के लिए भेजने के लिए वायरलेस टेक्नोलॉजी (रेडियोफ्रीक्वेंसी, ब्लूटूथ) का इस्तेमाल करते हैं, जिससे देखभाल बेहतर होती है लेकिन कनेक्टिविटी के जोखिम भी आते हैं.

क्या इन्हें हैक किया जा सकता है?

नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन के नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक इसका जवाब है, हां. मेडिकल साइंस के एक्सपर्ट बताते हैं कि आईसीडी में इस्तेमाल सॉफ्टवेयर और वायरलेस प्रोटोकॉल में संभावित कमजोरियों की पुष्टि हुई है. लैब सेटिंग्स में इन्हें दिखाया गया है. एक हैकर पेसिंग को रोक सकता है (डिवाइस को काम करने से रोक सकता है). ये भी हो सकता है कि हैकर जानलेवा झटके दे सकता है. यह बैटरी को जल्दी खत्म कर सकता है.

साइबर हमलों को कैसे रोकें?

नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन की वेबसाइट के मुताबिक इम्प्लांट के बाद की निगरानी मजबूत होनी चाहिए. डिवाइस की कमजोरियों की पहचान करनी चाहिए और इन समस्याओं को तेजी से हल करना चाहिए. CIEDs की पूरी उम्र तक ऐसा करते रहना चाहिए. मरीज का डाटा हमेशा एन्क्रिप्टेड होना चाहिए. एक सुरक्षित नेटवर्क के जरिए डाटा ट्रांसफर किया जाना चाहिए. डेटा ट्रांसमिशन में उच्च स्तर की सुरक्षा का इस्तेमाल गोपनीयता, जवाबदेही और भरोसा बनाए रखना चाहिए. हैकर्स को आईसीडी तक पहुंचने से रोकना चाहिए. ऐसा करने के लिए कभी-कभी रिमोट मॉनिटरिंग विकल्प को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ सकता है.

हकीकत क्या है?

किसी भी व्यक्ति के कार्डियक डिवाइस पर टारगेटेड हैक से मरीजों की मौत या चोट की कोई पुष्टि नहीं हुई है. साबित खतरा रैंसमवेयर या मैलवेयर है जो हॉस्पिटल नेटवर्क पर हमला करता है, जिससे देखभाल में रुकावट आती है. इस बात को ध्यान में रखते हुए मैन्युफैक्चरर्स लगातार डिवाइस को अपडेट कर रहे हैं. सिक्योरिटी एक बड़ा फोकस है, लेकिन आपस में जुड़ी मेडिकल टेक्नोलॉजी में कमजोरियां चिंता का विषय बनी हुई हैं.

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