EXCLUSIVE: RSS को सुरक्षित कर चुनाव आयोग को 'BJP मुख्यालय' बना चुके PM मोदी ट्रंप के सामने ‘खामोश’ क्यों हैं!
पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने इंटरव्यू में पीएम मोदी की विदेश नीति, खामोशी और वैश्विक मुद्दों पर रुख को लेकर तीखी आलोचना की, साथ ही चुनाव आयोग, मीडिया और सत्ता के केंद्रीकरण पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
Yashwant Sinha Exclusive Interview: ‘भारत की विदेश नीति, कूटनीति, सामरिक और सैन्य रक्षा नीति हो या फिर जियोपॉलिटिक्स. इन सबका खुद ही खुद को विश्वगुरु कहला कर स्वत: शांति सुखाय फील कर रहे देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेड़ा गर्क कर दिया है. मोदी जी सिर्फ इन सवालों का जवाब ईमानदारी से दे दें कि उन्होंने देश के चुनाव आयोग को भारतीय जनता पार्टी का मुख्यालय क्यों बना डाला है? अपने दोस्त और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मोदी से बीते लंबे समय से हर मौके पर कन्नी क्यों काट रहे हैं ?
जहां जहां बीते दो ढाई साल से ट्रंप दुनिया में पहुंच रहे हैं वहां वहां से हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी खुद की उपस्थिति की बजाए अनुपस्थिति पहले ही दर्ज क्यों करवा रहे हैं? क्या मोदी जी ट्रंप से डरते हैं? अगर मोदी जी ट्रंप से डरते हैं तो उनकी ऐसी कौन सी कमजोरी या चाबी ट्रंप के पास है? जिसके चलते 40 दिन लगातार खूनी जंग में जूझ रहे भारत के दोस्त देश इजराइल और ईरान के बीच शांति करवाने का विश्वगुरु मोदी जी ने एक भी शब्द अपने श्रीमुख से नहीं निकाला? यह कहां की और कैसी भारत की विदेश नीति, कूटनीति, सामरिक और सैन्य रक्षा नीति या फिर जियोपॉलिटिक्स मोदी जी अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में जन्म दे रहे हैं, जो हिंदुस्तान की आने वाली पीढ़ियों को भी कहीं मुंह दिखाने के काबिल न छोड़ रही हैं?’
कौन हैं यशवंत सिन्हा?
यह तमाम बेबाक बातें बेखौफ होकर बयान की हैं कालांतर में भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता, भारत के पूर्व विदेश व वित्त मंत्री, रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट और 1990 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी के ‘राइटहैंड’ रहे यशवंत सिन्हा ने. इस वक्त हजारी बाग में मौजूद पूर्व विदेश मंत्री नई दिल्ली में मौजूद स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान से ईरान, इजराइल-अमेरिकी के बीच छिड़ी जंग और उस कथित सीजफायर पर बात कर रहे थे, जिसमें पाकिस्तान-चीन भारत को खुलेआम अपने अपने घरों में बैठकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर चिढ़ा रहे हैं.
पीएम मोदी ट्रंप के सामने खामोश क्यों
स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में पूर्व विदेश मंत्री ने कहा, “खुद को जबरदस्ती विश्वगुरु कहलवा कर खुद ही खुश होने वाले हमारे प्रधानमंत्री अगर देश और भारत की जनता व प्रजातंत्र के प्रति दिल से ईमानदार हैं तो वे बताएं कि मोदी जी अपने ‘सो-कॉल्ड’ जिगरी दोस्त और अपने ही देश में अपनों से आजकल दिन रात अपनी थू-थू करवा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सामना करने से क्यों कतराते हैं? जहां जहां भी ट्रंप की विजिट दुनिया में होती है वहां वहां मोदी जी अपनी राजकीय यात्रा बीते लंबे समय से क्यों रद्द कर दे रहे हैं? यह तो मोदी जी को ही बताना होगा न कि आखिर जो ट्रंप अपने देशवासियों के निशाने पर हों, उन ट्रंप की जेब में मोदी जी के ताले की वह कौन सी चाबी है जिसके चलते हमारे प्रधानमंत्री ट्रंप के सामने खामोश हो जाते हैं.”
तटस्थता का यह कैसा नमूना या तमाशा है
अपनी बात जारी रखते हुए पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा आगे कहते हैं, “फिर चाहे वह इजराइल-ईरान-अमेरिका के बीच हाल ही में 40 दिन बाद अल्पविराम पर आकर ठहरी जंग हो या पाकिस्तान के खिलाफ 6-7 मई 2025 को आधी रात भारतीय फौजो द्वारा अंजाम दिये गए ऑपरेशन सिंदूर में जबरिया ही सीजफायर करवाने का श्रेय अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लेने का मुद्दा. मोदी जी हर जगह खामोश ही रहे. मैं मोदी से पुराना और मजबूत राजनीतिज्ञ, देश का विदेश मंत्री रहा हूं. इसलिए मुझे अपने लंबे राजनीतिक-डिप्लोमेटिक अनुभव से और भारत का एक नागरिक होने के नाते पूछने का अधिकार है कि, जनता देश की भोली हो सकती है. सत्ता-स्वार्थ-सिंहासन की मैली-कुचैली चाहत में अंधे-गूंगे बहरे हुए पड़े पीएम मोदी और उनका मंत्रीमंडल मूकदर्शक हो सकता है. मैं मूर्ख कैसे बन सकता हूं खुद को ऐसे मौके पर भी खामोश रखकर जब देश और देश में प्रजातंत्र ही दांव पर लगा हो. खुद ही खुद को विश्वगुरु कहने वाले देश के प्रधानमंत्री मोदी क्यों नहीं जवाब देते हैं कि, वे अपनी चुप्पी कब तोड़ेंगे? जब दो दोस्त देशों के बीच खूनी जंग में भी उनकी जुबान खुलना तो दूर ‘हिल’ तक न रही हो. उनकी यह खामोशी ‘तटस्थता’ है या फिर तमाशा?
जनता सड़कों पर क्यों नहीं उतरेगी?
भारत के पूर्व विदेश मंत्री और अब भारतीय जनता पार्टी व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखों की किरकिरी बने बैठे यशवंत सिन्हा के मुताबिक, “आज पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए देश का जितना अंतरराष्ट्रीय पटल पर बेड़ा गर्क कर डाला है, उतना आजाद भारत के किसी भी पूर्व प्रधानमंत्री ने नहीं किया है. भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) में सत्ता-सिंहासन की ऐसी और इतनी भी मैली-कुचैली चाहत का क्या मतलब जो, देश और प्रजातंत्र को ही बेचने पर उतर आए. अगर मौजूदा हुकूमत का सरकार चलाने का ढर्रा या रवैया यही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब प्रजातंत्र की रक्षा के लिए देश की सड़कों पर जनांदोलन नजर आने लगेगा. जनता जब जमीन पर उतरती है तो फिर साहूकारों की गद्दियां और राजनेताओं के सिंहासन भी नहीं बचते हैं.”
देश दांव पर लगने पर मोदी कैसे बचेंगे
स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में भारत के पूर्व विदेश मंत्री ने कहा, “मुझे ही क्यों पूरे देश के बच्चे-बच्चे को दिखाई दे रहा है कि आज बात देश की नहीं. सिर्फ सत्ता पाने की हो रही है. जब दुनिया में भारत के दो दोस्त (इजराइल-ईरान) खूनी जंग में जूझ रहे हैं तब हमारे प्रधानमंत्री विधानसभा चुनावों में विजय-पताका फहराने के लिए भागदौड़ में जुटे हैं कि, कैसे पश्चिम बंगाल, कैसे असम हाथ में आए. इसी से अंदाजा लगा लीजिए कि मोदी जी की भूख देश और विदेश नीति व कूटनीति से कहीं ज्यादा सूबा-सूबा सल्तनत पर कब्जा करने की है. बाकी देश और प्रजातंत्र अगर आग में स्वाहा हो रहा है तो होने दीजिए. यह मैं कोई विशेष बात नहीं बता रहा हूं. मैं वही कह रहा हूं जो देश की जनता कानों से सुनकर और आंखों से सुनकर भी नहीं कह पा रही है. जिस देश में हुकूमत के खौफ से प्रेस की आजादी पर झपट्टा मारा जा चुका हो. वहां कैसा लोकतंत्र या किसका प्रजातंत्र और किसकी कैसी विदेश व कूटनीति. हालांकि मोदी जी यह सब करते धरते वक्त भूल चुके हैं कि देश ही अगर दांव पर लग जाएगा तो उनकी सत्ता का सिंहासन फिर भला कौन सी ताकत बचा पाएगी?”
अपनी बात आगे बढ़ाते हुए पूर्व विदेश मंत्री सिन्हा ने कहा, “आज हमारी कमजोर नीतियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सिर्फ सिंहासन पाने भर की चाहत का ही नतीजा है कि हमारे पड़ोसी दुश्मन देश चीन और पाकिस्तान हम पर हंस रहे होंगे. जब ईरान-अमेरिका-इजराइल के बीच जंग में सीजफायर कराने की बैठक विश्वगुरु मोदी की दिल्ली (भारत) में न होकर इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हो रही है. मोदी सोच रहे हैं कि उनकी यह देश-विरोधी संदिग्ध गतिविधियां किसी को नहीं दिखाई दे रही हैं. सच ऐसा नहीं है.. भारत की जनता और दुनिया मोदी के इस भारत विरोधी चेहरे को देख रहे हैं. मोदी जी मगर इस सब दुर्गति दुर्दशा को जान-बूझकर देखना नहीं चाहते हैं. क्योंकि उनके लिए देश बाद में दांव-पेंच करके सत्ता हथियाना पहले हैं. हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री भूल गए हैं कि जब देश ही दांव पर लग जाएगा तो फिर उनकी सत्ता के सिंहासन की हिफाजत कौन करेगा?”
चुनाव आयोग-मीडिया का भगवान मालिक
चुनाव आयोग आजकल सवाल पूछने वाले पत्रकारों और आईएस अधिकारियों तक को नहीं बख्श रहा है? लखनऊ के एक आईएएस को हाल ही में चुनाव आयोग ने बे-वजह ही मामूली बात पर टारगेट करके उन्हें तत्काल प्रभाव से पर्यवेक्षक पद से हटा दिया है. स्टेट मिरर हिंदी के सवाल के जवाब में भारत के विदेश मंत्री बोले, “भारत का चुनाव आयोग आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी का हेडक्वार्टर बना हुआ है. तब ऐसे में चुनाव आयोग से भला और क्या अपेक्षा की जा सकती है. अंधा बांटै रेबड़ी बार-बार अपने को दे. जहां तक सवाल मीडिया को निशाने पर ले आने की बात है तो दुनिया में हम बदनाम हो चुके है कि मोदी राज में मीडिया प्रेस न रहकर गोदी-मीडिया के नाम से बदनाम हो चुका है. जो मीडिया मोदी की चाकरी नहीं करेगा वही निशाने पर लाकर खामोश करवा दिया जाएगा.”
RSS सेफ फिर देश की कौन सोचे?
हमेशा यही कहा जाता है कि जब जब भारतीय जनता पार्टी की सत्ता या सत्ता के सिंहासन पर जमा हुआ राजा (प्रधानमंत्री) बेकाबू होता है तब तब, बीजेपी का बाप माना जाने वाला “राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ”, बिटिया बीजेपी को डांट-डपटकर शांत या काबू करके पटरी पर ले आता है. क्या जो कुछ मोदी राज में हो रहा है वह सब आरएसएस को दिखाई नहीं दे रहा है? स्टेट मिरर हिंदी के इस सवाल के जवाब में यशवंत सिन्हा ने कहा, “मैं बीजेपी और आरएसएस को बेहद करीब से जानता-समझता हूं. आरएसएस को क्या चाहिए. सुख-सुविधा और सुरक्षा. मोदी जी यह सब देने-करने में माहिर हैं. वह जानते हैं कि आरएसएस के चाबुक से कैसे खुद की खाल बचाई जा सकती है.
जनता सड़कों पर क्यों उतरेगी
इसी कूटनीति का नतीजा है कि मोदी जी ने संघ को खामोश रखने के लिए सबसे पहले देश में (दिल्ली) उसका अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय की इमारत को मजबूत और आलीशान बनवा दिया. दूसरा सवाल था आरएसएस को सुरक्षा देना. वह भी मोदी जी ने सरकारी घोड़ा-गाड़ी-सुरक्षा देकर पूरा कर दिया है. अब देश अगर दांव पर लग रहा है तो फिर इससे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भी क्यों और क्या ज्यादा फर्क पड़ेगा? सबका अपना अपना काम चल रहा है. फिर चाहे प्रजातंत्र और देश की जनता क्यों न सड़कों पर दर-दर भटकती फिरे. बीजेपी, मोदी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लगता है कि हम तीन खुश तो दुनिया-जहां खुश है. बस यही इन तीनों की गलतफहमी-गफलत एक दिन देश को गर्त में धकेल चुकी होगी. इसीलिए आने वाले वक्त में देखते रहिए बहुत ही जल्दी देश की जनता सड़कों पर उतरेगी सिर्फ और सिर्फ प्रजातंत्र को बचाने की खातिर. क्योंकि जनता सत्ता-सिंहासन पाने खोने की लड़ाई से परे होती है.”




