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Electronics Mission 2.0: ₹62,500 करोड़ का बड़ा दांव! China को टक्कर के बाद Electronics में भारत का अगला मिशन क्या?

India ने ₹62,500 करोड़ की Mobile Manufacturing Scheme शुरू की है. लक्ष्य China को चुनौती देते हुए Electronics में Components, Semiconductor, Design, R&D और Indian Brands की क्षमता बढ़ाना है.

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भारत ने ऑटोमोबाइल, ​मिसाइल और स्पेस साइंस के बाद मोबाइल फोन असेंबली में अपनी पकड़ मजबूत करने के मकसद से अब अगला निशाना सिर्फ ज्यादा फोन बनाना नहीं, बल्कि इन उत्पादों के क्षेत्र में भारत की पकड़ मजबूत और ब्रांडिंग बेहतर करने का रखा है. 21 अगस्त 2026 को सरकार ने ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना को लेकर नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. यह पांच साल यानी वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक चलेगी. सरकार का दावा है कि इससे करीब ₹39 लाख करोड़ का संचयी मोबाइल उत्पादन और करीब 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं.

असली सवाल यह है कि क्या यह योजना भारत को चीन के असेंबली केंद्र का विकल्प बनाने से आगे ले जाकर कलपुर्जों, डिजाइन, बौद्धिक संपदा और भारतीय ब्रांडों की ताकत देगी?

₹62,500 करोड़ आखिर किस काम आएंगे?

इस योजना का पहला लक्ष्य मोबाइल विनिर्माण का स्तर बढ़ाना है. कंपनियों को पात्र बिक्री पर 2.25 प्रतिशत से 5 प्रतिशत तक प्रोत्साहन मिलेगा. इसके अलावा, प्रमुख कलपुर्जों और उप-संयोजनों की घरेलू खरीद पर 1.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाएगा. यानी सरकार केवल यह नहीं चाहती कि फोन भारत में जोड़े जाएं, बल्कि फोन के ज्यादा से ज्यादा हिस्से भी भारत में बनें. यही इस योजना का सबसे अहम बदलाव है.

अगर कलपुर्जों की घरेलू खरीद बढ़ती है तो भारत में आपूर्तिकर्ताओं, सहायक इकाइयों और विनिर्माण रोजगार का पूरा तंत्र विकसित होगा और आयातित सामान पर निर्भरता कम हो सकती है.

भारत ने मोबाइल में पहले ही क्या हासिल किया?

मोबाइल विनिर्माण में भारत की कहानी पिछले एक दशक में काफी बदली है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 के करीब ₹1.9 लाख करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में ₹13.11 लाख करोड़ हो गया. मोबाइल उत्पादन इसी अवधि में करीब ₹18,000 करोड़ से बढ़कर ₹6.27 लाख करोड़ पहुंचा. भारत अब उत्पादन की मात्रा के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है और देश में इस्तेमाल होने वाले 99.2 प्रतिशत मोबाइल भारत में बन रहे हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में स्मार्टफोन भारत का सबसे बड़ा निर्यात उत्पाद भी बना.

इसी के साथ यहीं से अगली चुनौती शुरू होती है. ज्यादा असेंबली का मतलब अपने आप ज्यादा घरेलू मूल्यवर्धन नहीं होता. असली आर्थिक फायदा कलपुर्जों, तकनीक, डिजाइन, पेटेंट और ब्रांड में ज्यादा हिस्सेदारी लेने से आता है. इसी कमी को नई योजना भरने की कोशिश कर रही है.

क्या चीन से मुकाबला अब असेंबलिंग से आगे बढ़ेगा?

चीन की ताकत सिर्फ बड़े पैमाने पर मोबाइल बनाना नहीं, बल्कि उसके आसपास मौजूद विशाल कलपुर्जा और आपूर्तिकर्ता तंत्र भी है. भारत ने स्मार्टफोन असेंबली और निर्यात में तेजी दिखाई है, लेकिन अगली छलांग के लिए पूरी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना जरूरी है. सरकार भी इसी वजह से घरेलू खरीद को प्रोत्साहन से जोड़ रही है.

यह रणनीति वैश्विक कंपनियों की चीन से इतर दूसरे देशों में उत्पादन बढ़ाने की नीति से भी जुड़ी है. एप्पल जैसी कंपनियों का भारत में उत्पादन बढ़ना और गूगल का भारत में विनिर्माण विस्तार इसी बदलाव के संकेत हैं. लेकिन भारत को केवल विदेशी कंपनियों का उत्पादन केंद्र बनने के बजाय स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं और तकनीकी क्षमताओं का विकास करना होगा.

क्या भारत अब अपना मोबाइल ब्रांड खड़ा करना चाहता है?

केंद्र सरकार की नई योजना का मकसद यही है. यही वजह है कि केंद्र सरकार ने ₹62,500 करोड़ की योजना तैयार किया है. भारतीय ब्रांडों के लिए अलग लक्ष्य वर्ग रखा गया है. भारतीय ब्रांड को 5 प्रतिशत प्रोत्साहन मिलेगा और भारतीय डिजाइन तथा अनुसंधान एवं विकास के लिए अतिरिक्त 3 प्रतिशत प्रोत्साहन का प्रावधान है. इसके साथ अन्य गैर-वित्तीय सहायता भी दी जाएगी. सरकार ने साफ किया है कि ब्रांड, बौद्धिक संपदा और डिजाइन का वास्तविक स्वामित्व भारत में होना चाहिए.

केंद्र सरकार की मंशा साफ है. अगर भारत केवल दूसरे देशों के ब्रांडों के लिए विनिर्माण करता रहा तो मूल्य श्रृंखला का बड़ा हिस्सा ब्रांड मालिक के पास रहेगा. अपना प्रतिस्पर्धी ब्रांड बनने पर डिजाइन, सॉफ्टवेयर, पेटेंट, विपणन और वैश्विक बिक्री से मिलने वाला मूल्य भी भारत में रह सकता है. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 2027 के मध्य तक एक मजबूत स्वदेशी मोबाइल ब्रांड आने की उम्मीद जताई है.

फिर सेमीकंडक्टर और कलपुर्जों का क्या होगा?

मोबाइल योजना अकेली नहीं है. इसके साथ सरकार ने सेमीकंडक्टर 2.0 को ₹1.275 लाख करोड़ के कुल प्रावधान के साथ मंजूरी दी है. इसका उद्देश्य सेमीकंडक्टर डिजाइन, निर्माण, अनुसंधान एवं विकास और पूरे चिप तंत्र को मजबूत करना है. वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स कलपुर्जा विनिर्माण योजना का प्रावधान वित्त वर्ष 2026-27 में बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ किया गया है.

यानी भारत की रणनीति अब तीन स्तरों पर दिखाई देती है. फोन बनाना, उसके कलपुर्जे बनाना और चिप, डिजाइन तथा बौद्धिक संपदा में क्षमता विकसित करना. यही वजह है कि ₹62,500 करोड़ को सिर्फ मोबाइल योजना समझना अधूरा होगा. यह इलेक्ट्रॉनिक्स की पूरी मूल्य श्रृंखला में अगले चरण की कड़ी है.

इलेक्ट्रॉनिक्स में भारत का अगला मिशन क्या?

भारत का अगला मिशन सिर्फ ‘भारत में बना’ मोबाइल तैयार करना नहीं, बल्कि ‘भारत में डिजाइन, तकनीक और निर्माण’ वाला पूरा इलेक्ट्रॉनिक्स ईकोसिस्टम बनाना है. ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना में घरेलू कलपुर्जों, भारतीय ब्रांडों, डिजाइन और अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहन देकर इसी दिशा में कदम बढ़ाया गया है.

इसके साथ ₹1.275 लाख करोड़ का सेमीकंडक्टर 2.0 और इलेक्ट्रॉनिक्स कलपुर्जा विनिर्माण योजना भी सप्लाई चेन को गहरा करने पर केंद्रित हैं. लक्ष्य यह है कि भारत असेंबली से आगे बढ़कर कलपुर्जों, चिप, बौद्धिक संपदा और वैश्विक भारतीय ब्रांडों में ज्यादा मूल्य हासिल करे. अगर यह सफल हुआ तो चीन से मुकाबला सिर्फ उत्पादन में नहीं, बल्कि तकनीक और मूल्यवर्धन में भी होगा.

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