Exclusive: अंगद का पैर, UCC और 30 साल सत्ता का दावा! क्या अमित शाह ने यूपी में हिंदुत्व के एजेंडे को फिर दी धार?
यूपी में 2027 चुनाव से पहले अमित शाह ने UCC और हिंदुत्व का एजेंडा तेज किया. अंगद का पैर और 30 साल सत्ता का दावा, क्या बीजेपी का नया चुनावी दांव है?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछने लगी है. समाजवादी पार्टी एमएलसी चुनाव के नतीजों को अपनी सियासी बढ़त के तौर पर पेश कर रही है, तो बीजेपी ने भी अपने राजनीतिक एजेंडे को नए सिरे से धार देना शुरू कर दिया है. 30 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में बीजेपी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आक्रामक तेवर और समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर दिया गया संदेश इसी चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत अस्थाना और वरिष्ठ पत्रकार एवं सियासी पंचायत के संपादक डॉ. रविंद्र राणा के विश्लेषण से साफ है कि बीजेपी के सामने अब विपक्ष के नए नैरेटिव की काट तलाशने की चुनौती है. एमएलसी चुनाव में पांच सीटों का झटका पार्टी के लिए मनोवैज्ञानिक दबाव बन गया है. ऐसे में शाह ने UCC, हिंदुत्व और संगठन की एकजुटता के जरिए 2027 की सियासी जमीन मजबूत करने का प्रयास किया है.
11 सीटों पर जीत का दावा, 5 पर हार से कितना बदला सियासी समीकरण?
वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत अस्थाना के मुताबिक, एमएलसी चुनाव के परिणाम बीजेपी के लिए अप्रत्याशित और राजनीतिक रूप से असहज करने वाले रहे. पार्टी सभी 11 सीटों पर जीत का दावा कर रही थी, लेकिन उसे छह सीटों से ही संतोष करना पड़ा, जबकि समाजवादी पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की. सपा की इस सफलता का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि उसने वाराणसी, प्रयागराज, आगरा और गोरखपुर जैसे बीजेपी के मजबूत प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. अस्थाना का मानना है कि भले ही सीटों की संख्या के लिहाज से बीजेपी को बड़ा नुकसान नहीं हुआ हो, लेकिन चुनावी परिणाम पार्टी के लिए प्रो-इनकंबेंसी का संकेत नहीं हैं. चुनाव से पहले इस तरह के नतीजे संगठन के मनोबल और राजनीतिक दावों पर असर डाल सकते हैं.
UCC के जरिए बीजेपी ने किस सियासी समीकरण को साधा?
श्रीकांत अस्थाना के विश्लेषण के मुताबिक, अमित शाह ने समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठाकर बीजेपी के पुराने वैचारिक एजेंडे को फिर से राजनीतिक विमर्श में ला दिया है. उनका मानना है कि यह कोई नया मुद्दा नहीं है, बल्कि कार्यकर्ताओं के भीतर भरोसा कायम रखने और पार्टी के नैरेटिव को मजबूती देने की कोशिश है.
श्रीकांत अस्थाना के मुताबिक, शाह की यह शैली कार्यकर्ताओं में जीत का भरोसा पैदा करने और संगठन को चुनावी मोड में लाने की रणनीति है. अगले 30 साल तक सत्ता से बीजेपी को कोई नहीं हिला पाएगा जैसे दावे भी इसी राजनीतिक संदेश का हिस्सा हैं. अस्थाना का मानना है कि एसआईआर और वोट चोरी को लेकर विपक्ष जिस तरह सवाल उठा रहा है, उसके बीच बीजेपी अपना पक्ष मजबूत करने और विपक्ष के नैरेटिव को कमजोर करने की कोशिश कर रही है.
क्या PDA और युवा असंतोष की काट बनेगा हिंदुत्व का एजेंडा?
वरिष्ठ पत्रकार और सिसासी पंचायत के संपादक डॉ. रविंद्र राणा इसे 2027 के विधानसभा चुनाव के लिहाज से अहम राजनीतिक दांव मानते हैं. उनके मुताबिक, हिंदुत्व, राम मंदिर और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर बीजेपी को पहले जैसी राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है. दूसरी तरफ अखिलेश यादव PDA के साथ युवा असंतोष और बेरोजगारी को भी चुनावी मुद्दा बनाने में जुटे हैं. ऐसे में UCC के जरिए बीजेपी अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग को फिर लामबंद करने और विपक्ष के एजेंडे की काट तलाशने की कोशिश कर सकती है. बीजेपी के सामने चुनौती है कि वह युवाओं और दूसरे सामाजिक वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ कैसे मजबूत रखे.
राणा का मानना है कि UCC को चर्चा के केंद्र में लाने से हिंदू-मुस्लिम विमर्श दोबारा तेज हो सकता है. इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना भी चुनावी बहस को प्रभावित कर सकती है. उनके विश्लेषण में बीजेपी इस मुद्दे के जरिए अपने परंपरागत हिंदुत्व आधारित राजनीतिक आधार को सक्रिय करने की रणनीति पर काम कर रही है.
लखनऊ और दिल्ली के बीच खींचतान का नैरेटिव क्यों अहम?
डॉ. रविंद्र राणा के मुताबिक, अमित शाह के दौरे का एक महत्वपूर्ण पहलू बीजेपी के भीतर एकजुटता का संदेश देना भी है. अखिलेश यादव लगातार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय नेतृत्व के बीच कथित राजनीतिक मतभेदों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं. विपक्ष इस धारणा के जरिए बीजेपी की अंदरूनी एकजुटता पर निशाना साधने की कोशिश करता है. ऐसे में अमित शाह का प्रदेश कार्यसमिति की बैठक का नेतृत्व करना संगठनात्मक तालमेल और नेतृत्व के बीच सामंजस्य का संदेश देने की कवायद के तौर पर देखा जा सकता है. पार्टी यह संकेत देना चाहती है कि 2027 की चुनावी चुनौती के लिए केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन एक साथ हैं.
2027 की लड़ाई में किसका नैरेटिव भारी?
राजनीतिक विश्लेषकों की राय में उत्तर प्रदेश की आगामी चुनावी लड़ाई केवल सरकार के कामकाज या सीटों के गणित तक सीमित नहीं रहने वाली है. समाजवादी पार्टी PDA, युवा असंतोष और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के जरिए बीजेपी को घेरने की तैयारी में है, जबकि बीजेपी UCC, हिंदुत्व और संगठनात्मक मजबूती के जरिए अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करना चाहती है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान इसी व्यापक चुनावी रणनीति की तरफ इशारा करते हैं. अब देखना होगा कि एमएलसी चुनाव के नतीजों से मिले सियासी संकेतों के बाद बीजेपी अपनी रणनीति में कितना बदलाव करती है और अखिलेश यादव का नया राजनीतिक नैरेटिव 2027 के चुनाव में कितना असर दिखा पाता है.
अंगद का पैर और 30 साल सत्ता का दावा, कार्यकर्ताओं को क्या संदेश?
अमित शाह ने कार्यसमिति की बैठक में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की स्थिति को अंगद के पैर जैसा मजबूत बताते हुए लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का भरोसा जताया. उन्होंने कार्यकर्ताओं को 2027 के चुनाव के लिए बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने का संदेश भी दिया.




