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बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ! देश की इज्जत को 'रोबोट' बनाने वाले गलगोटिया को AI समिट तक पहुंचाने वाली ‘गर्दन’ जल्दी नापो

AI India Impact Summit 2026 में गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा चीन में बने रोबोट को अपना बताने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की किरकिरी हुई. इस मामले में सरकार की कार्रवाई और सिफारिश करने वालों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं.

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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 19 Feb 2026 2:51 PM IST

दुनिया भर में अपनी खूबियों और खूबसूरत आयोजन इंतजामों के लिए सुर्खियों में आया हो या न आया हो. हां, इतना जरूर है कि पहले से ही देश में बदनाम रहे ग्रेटर नोएडा में स्थित गलगोटिया विश्वविद्यालय (Galgotias University Greater Noida) की बेजा कहूं या फिर काली-करतूत ने देश को अंतरराष्ट्रीय पटल पर मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा है.

देश में आयोजित एआई इंडिया इम्पैक्ट समिट जैसे बड़े और ऐतिहासिक आयोजन को दुनिया भर से सराहना नसीब हो पाती उससे पहले ही, गांव के किसी शैतान बच्चे की तरह पहले से देश की इज्जत मिट्टी में मिलवाने की कसम खाकर, मौके की ‘तलाश-ताड़-ताक’ में बैठे गलगोटिया विवि ने चीन में निर्मित करोड़ों रुपए के रोबोट को अपना बताकर हिंदुस्तान-हुकूमत और खुद की थू-थू जमाने में करवा डाली.

गलगोटिया को क्‍या सजा मिलेगी?

16 फरवरी 2026 से शुरू यह विशेष आयोजन 21 फरवरी 2026 तक यानी 7 दिन चलना है. 7 दिन पूरे होने का इंतजार कौन करता. देश और हुकूमत की अंतरराष्ट्रीय पटल पर खुलेआम बेइज्जती कराने की कसम खाए बैठे गलगोटिया विवि प्रबंधन ने तो तीसरे दिन ही ऐसा कांड कर डाला, जिसने देश को कहीं मुहं दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा. हालांकि इससे गलगोटिया ग्रुप का कुछ ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है. सिवाए उसके मुहं पर थूकने और इस बेजा और अछम्य अपराध के लिए उसे कठोरतम कानूनी दंड दिए जाने के. देश की दुनिया भर में थू-थू कराने के लिए गलगोटिया को क्या यादगार सजा मिलेगी, जो गलगोटिया की और गलगोटिया जैसी देश में शिक्षा के नाम पर खुली और चकाचौंध वाली बड़ी शिक्षा की दुकानों के लिए ‘सबक’ बन जाए. इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है.

“बदनाम” हुए तो क्या नाम न होगा?

पैनी नजर से अगर पहले से ही बदनाम गलगोटिया ग्रुप के इतिहास के काले पन्नों को सलीके से पलटकर पढ़ा जाए तो पता चलता है कि, गलगोटिया का इस शर्मनाक कांड में कुछ नहीं बिगड़ा है. क्योंकि गलगोटिया विवि ग्रुप तो पहले से ही बदनाम है. जब साल 2014 में गलगोटिया ग्रुप के चेयरमैन सुनील गलोगोटिया का बेटा ध्रुव गलगोटिया और पत्‍नी पद्मिनी गलगोटिया आगरा पुलिस ने गिरफ्तार किए थे. वह करोड़ों रुपए के लेनदेन से जुड़ा मामला था. पैसों के घपले के उस मामले में सुनील गलगोटिया के खिलाफ भी अदालत से गैर जमानती वारंट जारी हुए थे लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई थी. ऐसे में पहले से ही विकृत इतिहास रखने वाले गलगोटिया का भला इस चीनी रोबोट डॉग कांड ने क्या बिगड़ा. गलगोटिया ग्रुप तो पहले से ही बदनाम रहा है. हां, भारत की राजधानी दिल्ली में आयोजित जिस एआई इम्पैक्ट समिट पर दुनिया की नजरें टिकी थीं. जिसके आयोजन पर भारत सरकार ने न मालूम कितने करोड़ का मोटा बजट सरकारी खजाने से खर्चा किया होगा, ताकि देश की दुनिया में इज्जत बन सके. उस सब पर इसी गलगोटिया विवि प्रशासन-प्रबंधन ने जरूर मिट्टी डाल दी है.

दुश्मन देश के मीडिया में जग-हंसाई

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में गलगोटिया विवि के काले कारनामे के चलते देश का सिर दुनिया में शर्म से किस तरह झुका है. पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन जैसे भारत के दुश्मन पड़ोसी मक्कार देश का मीडिया इस शर्मनाक मुद्दे को चटखारे लेकर मिर्च मसाला लगाकर छापकर दुनिया को पढ़वा रह है. इससे लेकिन पहले से ही बदनाम गलगोटिया ग्रुप की मोटी चमड़ी पर भला क्या फर्क पड़ने वाला है? नुकसान तो भारत और हिंदुस्तानी हुकूमत का हुआ है. गलगोटिया के जो मालिकान अब से कई साल पहले ही गिरफ्तार होकर पुलिस थाने-चौकी कोर्ट कचहरियों के धक्के खाए बैठे हों, उनकी खाल पर इस चोट की खुरेंचें भला कैसे पड़ सकती हैं. उनकी बेशर्मी की चमड़ी तो पहले से ही चूंकि मोटी है न.

सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे

यह तो बात रही उन लोगों की इस पूरे शर्मसार करने वाले कांड में जो इस नंगे तमाशे का ठीकरा सिर्फ और सिर्फ गलगोटिया विवि के मक्कार प्रबंधन के सिर फोड़ रहे हैं. ऐसे लोगों को जानना जरूरी है कि समुद्र में हर बड़ी मछली कभी भी किसी दूसरी बड़ी मछली को न खाकर खुद को जिंदा रखने के लिए हमेशा बड़ी मछली छोटी मछलियों को ही खाती है. गलगोटिया विवि द्वारा भारत मंडपम में आयोजित इस शर्मनाक चीनी-रोबोट डॉग कांड में जो बेईमानी से भरा घिनौना कृत्य अंजाम दिया गया. इस सबको समेटने के लिए अब गलगोटिया प्रशासन हो सकता है कि अपनी बड़बोली-अति उत्साही प्रोफेसर नेहा सिंह का नौकरी खाकर ‘बलि’ ले ले. यह मैं सोच रहा हूं कि गलगोटिया वाले अपनी खाल बचाने के लिए नेहा सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर देंगे. नेहा सिंह ने इस बात से ऑन कैमरा सोशल मीडिया पर वायरल वीडियोज में पूछे जाने पर उन्हें नौकरी से निकाले जाने से साफ इनकार किया. उन्होंने इस सवाल के जवाब में कहा कि, “मुझे यूनिवर्सिटी ने नौकरी ने निकाले जाने की बात शायद इसलिए कही होगी कि मीडिया थोड़ा शांत हो जाए.” मतलब, गलगोटिया में दाल में काला नहीं है. यहां पूरी दाल ही काली नजर आती है. सब मिल-बांटकर दूसरों का बेड़ा-गर्क करने का वीणा अपने अपने कंधों पर उठाकर धरती पर सिर्फ और सिर्फ ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों के अपनी यूनिवर्सिटी में एडमिशन कराने का एक-सूत्रीय अभियान का वजन लेकर भटक रहे हैं.

एक गलती छिपाने को 100 झूठ

छोड़िए यहां गलगोटिया को जिसने शर्मनाक कांड करके देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम कराना था करवा डाला. अब दुनिया में ऐसी कोई रबर नहीं बनी है जो गलगोटिया विवि प्रबंधन की इस काली-करतूत या कारस्तानी को इतिहास के पन्नों से कभी मिटा सकेगी. देश की इज्जत का जो पलीता लगना था लग चुका. पूरे तमाशे की जड़ मानी समझी जा रही गलगोटिया यूनिवर्सिटी की बड़बोली प्रोफेसर नेहा सिंह ने जिस चीनी रोबोट को पहले अपनी यूनिवर्सिटी द्वारा निर्मित बताया. जब उनके उस दावे को पंचर करते हुए चीन ने हवा निकाली तो वे ही नेहा सिंह अगले दिन कहने लगीं कि, उन्होंने चीनी रोबोट डॉग को कभी गलगोटिया द्वारा निर्मित नहीं बताया. दावेदारी के अगले दिन यह मक्कारी करते वक्त प्रो. नेहा सिंह मीडिया को बयान देने के वक्त तैश कहिए या आवेश में यह भूल गईं वे एक दिन पहले ही जो बयान “चीनी रोबोट डॉग गलगोटिया ने बनाया है” मीडिया को दे चुकी हैं, उसका जिन्न मीडिया बोतल से बाहर ले आयेगा. तो वे जमाने में कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं बचेंगी. हुआ भी वही कि, जैसे ही जरूरत से ज्यादा चतुर बन रही प्रो. नेहा सिंह अपने बयान से पलटीं, मीडिया ने उनके एक दिन पहले वाला वह बयान वायरल कर दिया, जिसमें वह फर्राटेदार अंग्रेजी में भारत मंडपम परिसर में ऑन-कैमरा जोर-जोर से मुस्कराते हुए फरमा रही थीं कि, रोबोट मोटी रकम खर्च करके उनकी यूनिवर्सिटी गलगोटिया ने बनाया है. छोड़िए, प्रोफेसर नेहा सिंह या फिर गलगोटिया इस छीछालेदर में अब इतने अहम या इज्जतदार किरदार नहीं बचे हैं जिन पर माथापच्ची करके वक्त जाया किया जाए.

क्‍या गलगोटिया का कुछ नहीं बिगड़ेगा?

गलगोटिया और प्रो. नेहा सिंह ने क्या शर्मनाक काली करतूत अंजाम दी या कारनामा अंजाम देकर देश को दुनिया भर में बदनाम करवा डाला, जमाने को पता चल चुका है. ऊंची पहुंच वाले गलगोटिया प्रबंधन का न तो पहले कोई कुछ बाल-बांका कर सका है. न ही अब इस बेइज्जती वाले कांड में कुछ होगा. क्योंकि इस शर्मनाक कांड के बाद गलगोटिया प्रबंधन को पालने-पोसने वाले उसे झूला- झुलाकर अपना अपना निजी स्वार्थ सिद्ध करने वाले भी इस वक्त अपने खैर-ख्वाह गलगोटिया की खाल बचाने के लिए ‘अलर्ट-मोड’ पर आ चुके होंगे.

AI समिट के लिए किसने की थी गलगोटिया की सिफारिश?

यहां सवाल यह है कि अगर गलगोटिया की इस बेशर्मी वाले कांड में भी उसे बचाने वाले साफ निकाल ले जाने में जुटे हैं. तब फिर ऐसे में देश की दुनिया भर में हुई बेइज्जती का हिसाब गलगोटिया से कौन कैसे और कब चुकता करेगा? इस सवाल के जवाब में देश के बुद्धिजीवी और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि, “चीनी रोबोट को अपना बताकर सुर्खियों में आते ही बदनामी के वजन से ढह कर नंगे हो चुके गलगोटिया को सबक मिल सकता है. तब सबक मिलेगा जब गलगोटिया को इस समिट में आमंत्रित करने की सिफारिश करने वाले सिरफिरे इंसान की गर्दन दबोची जाए. जब उसे लगेगा कि उसकी गर्दन फंस रही है सरकारी पंजों में तब वह अपनी गर्दन बचाने के लिए अपने आप ही गलगोटिया प्रबंधन की गर्दन सरकार के हवाले कर देगा.

चोर चोर मौसेरे भाई

हालांकि इसकी उम्मीद करना बेईमानी है कि जो हाई-प्रोफाइल शख्स हिंदुस्तानी हुकूमत में अपने ऊंच कद और वजन के बलबूते पहले से ही बदनाम गलगोटिया प्रबंधन की यूनिवर्सिटी को भारत मंडपम में आयोजित इतने बड़े विशाल आयोजन में इंट्री दिलवा सकता है. वह फिर अब गलगोटिया और अपनी गर्दन बचाने में कैसे नाकाम हो सकता है. क्योंकि चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत ऐसे ही बदनामी वाले कांडों में तो एक दूसरे को बचाने में काम आती है. जो इंसान या जिस इंसान के कंधों पर बैठकर गलगोटिया यूनिवर्सिटी एआई इम्पैक्ट समिट में भारत मंडपम के अंदर अपना अड्डा जमा सकती है. तो अब देश की इज्जत में खुजली बन चुकी ऐसी बेजा हरकत के लिए वही बड़ी हस्ती गलगोटिया और अपनी गर्दन बचाने में कैसे नाकाम रहेगा.

अभी इंतजार करिए...

हालांकि अभी इस पर खुलकर कुछ कह देना जल्दबाजी भी होगा. क्योंकि यह मुद्दा सिर्फ गलगोटिया प्रबंधन तक सीमित नहीं बचा है. इस कांड ने देश की इज्जत को ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी का दंश दे डाला है. इसलिए संभव है कि समिट के बाद गलगोटिया से आगे-पीछे का सब हिसाब बराबर करने के लिए मोदी की हुकूमत, इस आयोजन में शामिल गलगोटिया और गलगोटिया को आयोजन तक पहुंचाने वाले दोनों को ही यादगार अमिट रगड़ा लगा दे. क्योंकि इस कांड में कोई व्यक्ति-विशेष प्रभावित नहीं हुआ है. इस बार हिंदुस्तान की हुकूमत और हुक्मरानों की इज्जत को हदों से पार जाकर बट्टा लगा है. जिसकी जलन को आसानी से शांत कर पाना शायद ही हुकूमत के वश की बात बची हो.

क्‍या सरकार लेगी सख्‍त एक्‍शन?

दूसरे जिस तरह से 18 फरवरी 2026 को ग्रेटर नोएडा स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी की जगहंसाई कराती मक्कारी जमाने के सामने नंगी हुई, उसके बाद आयोजन स्थल यानी भारत मंडपम परिसर से जिस तूफानी गति से गलगोटिया की दुकान को समेटवाया गया, उससे उम्मीद की जा सकती है कि हो न हो समिट की समाप्ति के बाद हुकूमत की टेढ़ी नजरें गलगोटिया प्रशासन की ही ओर मुड़ेंगी. तब क्या होगा यह भविष्य के गर्भ में है. गलगोटिया विवि द्वारा देश की इस कदर की बेइज्जती कराए जाने के वक्त ही मोदी हुकूमत किस कदर चोट खाए काले नाग की सी फनफना उठी थी, इसकी मिसाल तब देखने को मिली जब सरकार ने 18 फरवरी 2026 को दोपहर के वक्त गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्रशासन को भारत मंडपम से अपनी दुकान सिर पर पांव रखकर समेटकर भाग जाने को कहा. इस पर ‘रस्सी जल गई मगर ऐंठ नहीं गई’, वाली कहावत पर अड़ा अड़ियल गलगोटिया विवि प्रशासन जब टस से मस होने को राजी नहीं हुआ तब, सरकारी मशीनरी हरकत में आई और गलगोटिया की दुकान (भारत मंडपम में) की बिजली काटकर अंधेरा कर दिया.

हद से पार की ‘बेहआई-बेशर्मी’

इसके बाद वास्तव में गलगोटिया एंड कंपनी भारत मंडपम से सिर पर पांव रखकर भागते ही कैमरों में रिकॉर्ड हुई. अपनी दुकान की बिजली काटे जाने के बाद भागते वक्त जब मीडिया ने पूछा गलगोटिया की बेहया बदनाम टीम से पूछा कि, कहां जा रहो हो? तो सच स्वीकारने के बजाए बेशर्मी वाला जवाब मिला- “लंच करने जा रहे हैं” जमाने ने सोशल मीडिया पर वायरल इससे जुड़े सैकड़ों वीडियोज में अपनी आंखों से देखा और कानों से सुना.” इस बारे में स्टेट मिरर हिंदी ने 19 फरवरी 2026 को गलगोटिया विवि के ध्रुव गलगोटिया (जोकि साल 2014 में बड़ी रकम की हेरफेर के आरोप में आगरा पुलिस द्वारा मां के साथ गिरफ्तार किए गए थे) से व्हाट्सएप मैसेज के जरिए उनका पक्ष लेने की कोशिश की गई. खबर लिखे जाने तक मगर उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया है.

स्टेट मिरर स्पेशल
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