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Bengal SIR: नाम में ही सबकुछ है! अंग्रेजों की गलती का खामियाजा भुगत रहे 'बाबू मोशाय', ब्राह्मणों को बुलावा भेज रहा चुनाव आयोग

ब्रिटिश दौर में बदले गए सरनेम आज बंगाल के वोटरों के लिए मुसीबत बन गए हैं. नाम वही, सरनेम मुखर्जी, बनर्जी और चटर्जी अलग होने पर ECकी सुनवाई ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. नोटिस मिलने पर सभी चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचकर सफाई देनी पड़ रही है.

Bengal SIR: नाम में ही सबकुछ है! अंग्रेजों की गलती का खामियाजा भुगत रहे बाबू मोशाय, ब्राह्मणों को बुलावा भेज रहा चुनाव आयोग
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( Image Source:  ani )

ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक सहूलियत के लिए किए गए सरनेम के सरलीकरण आज पश्चिम बंगाल में हजारों मतदाताओं के लिए परेशानी का कारण बन गए हैं. मुखर्जी, बनर्जी और चटर्जी जैसे आम सरनेम रखने वाले लोग अब चुनाव आयोग की सुनवाई में लाइन लगाकर यह साबित करने को मजबूर हैं कि उनके नाम अलग नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से बदले हुए हैं. गांव की चौपाल से लेकर कोलकाता की गलियों तक एक ही सवाल गूंज रहा है. नाम वही है, बस सरनेम का रूप बदला है, फिर इसे 'लॉजिकल विसंगति' क्यों माना जा रहा है?

चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर द्वारा पकड़ी गई इस कथित गड़बड़ी ने, न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को लेकर भी बहस छेड़ दी है.

मुखर्जी, बनर्जी और चटर्जी परिवार पूरे बंगाल में सुनवाई केंद्रों पर 'लॉजिकल विसंगति' वाली लाइनों में लग रहे हैं, क्योंकि चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर जानना चाहता है कि एक या दो पीढ़ी पहले उनके परिवारों के अलग-अलग सरनेम क्यों थे - मुखर्जी के लिए मुखोपाध्याय, बनर्जी के लिए बंद्योपाध्याय और चटर्जी के लिए चट्टोपाध्याय.

क्यों चर्चा में हैं मुखर्जी, बनर्जी और चटर्जी सरनेम

ब्रिटिश प्रशासन को बंगाली ब्राह्मणों के पारंपरिक लंबे सरनेम जैसे मुखोपाध्याय, बंद्योपाध्याय, चट्टोपाध्याय और भट्टाचार्य, का उच्चारण और दस्तावेजीकरण कठिन लगता था. इसी वजह से उसे सरल कर मुखर्जी, बनर्जी, चटर्जी और भट्टाचार्जी जैसे छोटे रूप दिए गए. आजादी के बाद यही छोटे सरनेम आम चलन में आ गए.

वोटर लिस्ट में ‘लॉजिकल विसंगति’ कैसे बनी?

चुनाव आयोग की SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया के दौरान जब पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा दस्तावेजों का मिलान हुआ, तो सॉफ्टवेयर ने सरनेम के लंबे और छोटे रूप को अलग-अलग मान लिया. इसके चलते हजारों मतदाताओं को 'लॉजिकल विसंगति' की कैटेगरी में डालकर सुनवाई के नोटिस जारी कर दिए गए.

आम मतदाता क्यों हो रहे हैं परेशान

हाजरा, फूलबागान, श्याम बाजार जैसे इलाकों में लोग अपने ही नाम को सही साबित करने के लिए दस्तावेज लेकर पहुंच रहे हैं. किसी के शैक्षणिक प्रमाणपत्र में चट्टोपाध्याय लिखा है तो वोटर आईडी में चटर्जी, तो कहीं पिता और बेटे के सरनेम के रूप अलग-अलग दर्ज हैं. मतदाताओं का कहना है कि यह समस्या उनकी गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की समझ की कमी है.

EC नोटिस में फंसी आम वोटर की अजीब कहानी

उदाहरण के लिए, हाजरा निवासी स्पंदन भट्टाचार्जी 29 जनवरी को सुनवाई में शामिल होंगे क्योंकि 2002 की SIR सूची में उनके पिता का नाम अशोक भट्टाचार्य है। प्रोफेसर बिदित मुखर्जी को यह साबित करने के लिए बुलाया गया है कि वह पूर्व बारासात नगर पालिका अध्यक्ष अशानी मुखोपाध्याय के बेटे हैं.

फूलबागान निवासी समीरन चटर्जी बुधवार को लाइन में लगे क्योंकि उनके कुछ दस्तावेजों में चट्टोपाध्याय लिख था. उन्होंने कहा, "मैं ज्यादातर 'चटर्जी' इस्तेमाल करता हूं, लेकिन मेरे एकेडमिक और कुछ दूसरे डॉक्यूमेंट्स में चट्टोपाध्याय लिखा है. इस वजह से मैं लॉजिकल गड़बड़ी वाली कैटेगरी में आ गया हूं."

श्याम बाजार की वोटर अरुणिता बनर्जी का मामला शायद सबसे ज्यादा अजीब है. उन्हें सुनवाई के लिए बुलाया गया क्योंकि 2002 की वोटर लिस्ट में उनके पिता का सरनेम 'बंद्योपाध्याय' लिखा है, जबकि उनके सभी डॉक्यूमेंट्स में 'बनर्जी' लिखा है. उन्होंने कहा, "हमें नहीं पता कि EC ने उनका सरनेम क्यों बदला. मैंने आज सभी डॉक्यूमेंट्स जमा कर दिए हैं."

BLO और अधिकारी भी मान रहे हैं तकनीकी खामी

कई BLO और AERO अधिकारियों ने अनौपचारिक रूप से माना है कि ये असली सरनेम बेमेल नहीं हैं। लेकिन चूंकि चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर इन्हें विसंगति के रूप में फ्लैग कर रहा है, इसलिए अधिकारियों को निर्देशों के तहत मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाना पड़ रहा है।

ममता बनर्जी का सवाल: बंगाल की संस्कृति को समझता कौन है?

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मुद्दे पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह बंगाल की संस्कृति की बुनियादी समझ की कमी को दर्शाता है। उन्होंने सवाल किया कि अगर कोई व्यक्ति अंग्रेजी में एक और बंगाली में दूसरा सरनेम लिखता है, तो इसमें आपत्ति क्यों?

क्या भविष्य में बदलेगा चुनाव आयोग का रुख?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चुनाव आयोग ने अपने सॉफ्टवेयर और सत्यापन प्रक्रिया में स्थानीय इतिहास और नामों की परंपरा को शामिल नहीं किया, तो आगे भी ऐसे विवाद बढ़ सकते हैं। यह मामला सिर्फ वोटर लिस्ट का नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार का बनता जा रहा है.

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