Bengal Election 2026: क्या बंगाल में चुनावी हिंसा का इतिहास इस बार फिर होगा रिपीट, पिछले 2 दशक में कब कितने लोग मारे गए?
पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का 20 साल का रिकॉर्ड डराने वाला है. सैकड़ों मौतों के बीच सवाल है- क्या 2026 चुनाव में फिर दोहराएगा खून-खराबे का इतिहास?
पश्चिम बंगाल में चुनाव लोकतंत्र का पर्व नहीं, खौफ, खून और सिस्टम पर कब्जे की जंग में बदल जाता है. यहां वोटिंग का मतलब सिर्फ बटन दबाना नहीं, बल्कि कई बार जान जोखिम में डालना भी होता है. बीते दशकों में हर चुनाव के साथ हिंसा की ऐसी कहानियां जुड़ी हैं, जहां राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई सड़कों पर उतर आई, बम, गोलियां, आगजनी और हत्याएं इस “चुनावी संस्कृति” का हिस्सा बन गईं. 2006 के बाद के आंकड़े बताते हैं कि सैकड़ों लोग इस संघर्ष की कीमत अपनी जान देकर चुका चुके हैं. सत्ता चाहे किसी की भी रही हो, एक पैटर्न हमेशा दिखा - चुनाव आते हैं, तनाव बढ़ता है और फिर हिंसा फूट पड़ती है.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण की 152 सीटों में आज शाम प्रचार समाप्त हो जाएगा, लेकिन सवाल वही पुराना है - क्या इस बार भी बंगाल में लोकतंत्र खून से रंगेगा या इतिहास की यह खतरनाक परंपरा आखिर टूटेगी?
दरअससल, 1950 के दशक से लेकर आज तक, हर चुनावी दौर में खून-खराबे की खबरें सामने आती रही हैं. 2006 के बाद के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ होता है कि चुनावी हिंसा यहां एक “सिस्टम” का हिस्सा बन चुकी है. द टेलीग्राफ की रिपोर्ट्स और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो दशकों में सैकड़ों लोगों की जान चुनाव से जुड़ी हिंसा में गई है. ऐसे में 2026 के चुनाव नजदीक हैं और सवाल वही है. क्या इस बार भी इतिहास खुद को दोहराएगा?
बंगाल में हिंसा, सोशल सेटअप का हिस्सा है?
बंगाल के सियासी जानकारों का कहना है कि चुनावी हिंसा केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का नतीजा नहीं है, बल्कि यह राज्य के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने में गहराई से जुड़ी है. द टेलीग्राफ ने कोलकाता के प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जाद महमूद के हवाले से बताया है कि, “बंगाल की श्क्रांतिकारी संस्कृति” भी इसका एक कारण है, जहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सूर्य सेन जैसे विद्रोही नेताओं की विरासत लोगों को प्रभावित करती है. उनका कहना है कि “अगर हिंसा किसी उद्देश्य के लिए हो, तो उसे सही ठहराने की प्रवृत्ति यहां देखी जाती है.”
CPM शासन संस्थागत हिंसा का दौर क्यों?
लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन में राजनीतिक हिंसा को “संस्थागत” रूप मिलने के आरोप लगे. 2006 विधानसभा चुनाव अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहे, लेकिन फिर भी 5-6 मौतें दर्ज की गईं. 2008 पंचायत चुनाव और नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन ने हिंसा को नई ऊंचाई दी. 2007 में पुलिस फायरिंग में 14 मौतें और 2008 चुनावों के बाद करीब 45 मौतों की खबरें आईं. 2009 लोकसभा चुनाव में जंगलमहल क्षेत्र में त्रिकोणीय संघर्ष हुआ, जिसमें 15 से अधिक लोग मारे गए. चुनाव के बाद हिंसा इतनी बढ़ी कि 150 से ज्यादा राजनीतिक हत्याएं दर्ज की गईं.
सत्ता परिवर्तन और हिंसा 2011-2016
2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई, लेकिन हिंसा का सिलसिला नहीं रुका. इस चुनाव में 17-25 मौतें हुईं. 2013 पंचायत चुनाव में 20-30 मौतें और सैकड़ों हमले दर्ज हुए. 2014 लोकसभा चुनाव में बंगाल देश में सबसे ज्यादा हिंसक रहा. 7 से 16 मौतें और 1,298 राजनीतिक कार्यकर्ता घायल हुए. 2016 विधानसभा चुनाव में मतदान के दौरान हिंसा सीमित रही, लेकिन चुनाव के बाद हालात बिगड़ गए, जहां 8 से 12 मौतों के साथ बड़े पैमाने पर आगजनी और विस्थापन हुआ.
2018-2019 का पंचायत चुनाव सबसे ज्यादा हिंसक कैसे?
2018 पंचायत चुनाव को बंगाल के इतिहास का सबसे हिंसक चुनाव माना जाता है. करीब 75 लोगों की मौत हुई, जिनमें 13 मौतें सिर्फ मतदान के दिन हुईं. 34% सीटों पर बिना मुकाबले चुनाव होना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है. 2019 लोकसभा चुनाव में BJP और TMC के बीच सीधी टक्कर ने हिंसा को और बढ़ाया—12-15 मौतें और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए.
2021 से 2024 तक का चुनाव ट्रेंड क्या?
2021 विधानसभा चुनाव में TMC की जीत के साथ हिंसा का दौर फिर देखने को मिला -17 मौतें, 1,300 हिंसक घटनाएं और हजारों उत्पीड़न के मामले सामने आए. 2023 पंचायत चुनाव में 45-55 मौतों के साथ हिंसा चरम पर रही. हालांकि, 2024 लोकसभा चुनाव में केंद्रीय बलों की भारी तैनाती से स्थिति कुछ हद तक नियंत्रित रही, फिर भी 6-10 मौतें और 100 से ज्यादा हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं. यह दिखाता है कि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने पर हिंसा कम हो सकती है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होती.
2026 चुनाव: क्या बदलेगा या दोहराएगा इतिहास?
विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल में चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है, “विजेता सब कुछ ले जाता है” वाली मानसिकता हिंसा को बढ़ावा देती है. पहले जहाँ राजनीतिक हिंसा प्रमुख थी, अब सांप्रदायिक और क्षेत्रीय संघर्ष भी इसमें जुड़ गए हैं. यही कारण है कि चाहे सत्ता में CPM हो, TMC या भविष्य में कोई और पार्टी - हिंसा का पैटर्न बना रहता है. 2026 के चुनाव में भी अगर प्रशासनिक सख्ती और राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत नहीं रही, तो पिछले 20 सालों का यह खूनी इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा सकता है.




