Bengal Elections 2026: रात में बाइक पर रोक, मार्क्समैन की तैनाती, वोटिंग से पहले पश्चिम बंगाल में क्या-क्या चल रहा?
पश्चिम बंगाल में मतदान से पहले सुरक्षा कड़ी, रात में बाइक बैन, संवेदनशील इलाकों में मार्क्समैन तैनात, केंद्रीय बलों की निगरानी में चुनाव प्रक्रिया तेज.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए आज प्रचार समाप्त हो गया. 23 अप्रैल को 294 में से 152 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. इस बीच बंगाल में शांतिपूर्ण और निर्भय होकर मतदान कराने के लिए चुनाव आयोग ने सुरक्षा को लेकर अभूतपूर्व सख्ती दिखाई है. इस तरह की सख्ती बिहार विधानसभा चुनाव 2005 में दिखी थी, जब टीएन शेषण और केजे राव ने निष्पक्ष मतदान के लिए 'परिंदा भी पर न मार सके' के लिए सख्त सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम किया था. चुनाव आयोग ने बंगाल में भी रात में बाइक मूवमेंट पर रोक, पिलियन राइडिंग (पीछे बैठकर सवारी) पर सीमाएं, संवेदनशील इलाकों में भारी तैनाती और “मार्क्समैन” की मौजूदगी ने चुनावी माहौल को असाधारण बना दिया है.
सत्ताधारी TMC की सांसद महुआ मोइत्रा, इसे “मिलिट्री-स्टाइल टेकओवर” बता रही हैं. जबकि चुनाव आयोग और सुरक्षा एजेंसियां इसे निष्पक्ष व शांतिपूर्ण मतदान के लिए जरूरी कदम कह रही हैं. सात प्वाइंट में समझिए क्या है पूरा मामला?
1. मार्क्समैन क्या होता है और चुनाव में क्यों तैनात किया जाता है?
“मार्क्समैन” ऐसे विशेष रूप से प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मी होते हैं, जो लंबी दूरी से सटीक निशाना लगाने में माहिर होते हैं. इन्हें हाई-रिस्क परिस्थितियों, जैसे संभावित फायरिंग, बूथ कैप्चरिंग या भीड़ के उग्र होने, को नियंत्रित करने के लिए तैनात किया जाता है. चुनाव में इनकी भूमिका आक्रामक कार्रवाई से ज्यादा “डिटरेंस” की होती है. यानी उनकी मौजूदगी ही हिंसा रोकने का काम करती है. संवेदनशील बूथ, स्ट्रॉन्ग रूम और काउंटिंग सेंटर के आसपास इनकी तैनाती अतिरिक्त सुरक्षा परत जोड़ती है, जिससे असामाजिक तत्वों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनता है.
2. TMC “मिलिट्री-स्टाइल टेकओवर” क्यों कह रही है?
ममता बनर्जी की पार्टी TMC का आरोप है कि केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और उनके संचालन का तरीका सामान्य चुनावी प्रक्रिया से अलग है. पार्टी के मुताबिक, राज्य में सुरक्षा का स्तर “मिलिट्री जोन” जैसा बना दिया गया है. TMC का यह भी कहना है कि स्थानीय पुलिस की भूमिका सीमित कर दी गई है और केंद्रीय बलों को ज्यादा नियंत्रण दिया गया है, जो संघीय ढांचे के खिलाफ है. विपक्षी दल इस आरोप को खारिज करते हुए कहते हैं कि बंगाल में चुनावी हिंसा के इतिहास को देखते हुए सख्ती जरूरी है.
3. CAPF की “अभूतपूर्व” बैठक में क्या हुआ?
कोलकाता के साइंस सिटी में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की सभी यूनिट्स की एक बड़ी बैठक हुई, जिसे अधिकारियों ने “अभूतपूर्व” बताया. इसमें CRPF, BSF, CISF, ITBP और SSB के शीर्ष अधिकारी शामिल हुए. रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव वाले राज्य में इस स्तर की संयुक्त बैठक पहले नहीं हुई थी. इसी वजह से TMC ने इसे “मिलिट्री-स्टाइल कब्जे” की तैयारी बताया. जबकि सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि यह सिर्फ सुरक्षा समीक्षा बैठक थी ताकि चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से कराए जा सकें.
4. बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती कितनी है?
इस बार पश्चिम बंगाल में करीब 2.4 लाख CAPF जवान (लगभग 2400 कंपनियां) तैनात किए गए हैं, जो किसी एक राज्य में चुनाव के दौरान अब तक की सबसे बड़ी तैनाती मानी जा रही है. एक कंपनी में औसतन 80 से 100 जवान होते हैं, यानी हर 140 मतदाताओं पर लगभग एक जवान की तैनाती का अनुपात बनता है. यहां पर इस बात का भी जिक्र कर दें कि पहले चरण में 152 सीटों पर 3.4 करोड़ मतदाताओं वोट डालेंगे. इससे पहले मणिपुर में हिंसा के दौरान 290 कंपनियां तैनात की गईं थीं.
इससे पहले 2024 जम्मू-कश्मीर चुनाव में 900 कंपनियां तैनात की गईं थी. इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर से बुलेटप्रूफ एंटी-रायट वाहन भी बंगाल लाए गए हैं, जो हिंसाग्रस्त इलाकों में ऑपरेशन को आसान बनाते हैं.
5. राज्य पुलिस की भूमिका क्या है?
इसके बावजूद, इस बात का भी जानना आवश्यक है कि वेस्ट बंगाल पुलिस चुनाव में अहम भूमिका निभाती है, भले ही केंद्रीय बल ज्यादा दिखाई दें. राज्य पुलिस के जवाबन चुनाव के दौरान स्थानीय इंटेलिजेंस जुटाते हैं. संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करते हैं. लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाते हैं. इतना ही नहीं, गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया भी संभालते हैं.वहीं, CAPF को एरिया डॉमिनेशन, बूथ सुरक्षा और फ्लैग मार्च के लिए लगाया जाता है. दोनों के बीच तालमेल चुनाव की सफलता के लिए बेहद जरूरी होता है.
6. बाइक पर रोक और अन्य पाबंदियां क्या हैं?
चुनाव आयोग ने चार पहिया वाहनों के अलावा दोपहिया वाहन के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं. इनमें शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक बाइक/स्कूटर चलाने पर रोक, बाइक रैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध, दिन में पिलियन राइडिंग को पीछे बैठने पर रोक. मतदान के दिन परिवार के सदस्य ही पीछे बैठ सकते हैं.
कुछ जरूरी स्थितियों जैसे मेडिकल इमरजेंसी, पारिवारिक कार्यक्रम या स्कूल में छूट दी गई है, लेकिन इसके लिए पहले से पुलिस की अनुमति जरूरी है. इन पाबंदियों का उद्देश्य कैश, शराब या हथियारों की आवाजाही रोकना और मतदाताओं को डराने की कोशिशों को खत्म करना है.
7. इतनी बड़ी सुरक्षा तैनाती की वजह क्या है?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पिछले छह वर्षों में पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा की घटनाएं अन्य राज्यों से ज्यादा रही हैं. 2021 चुनाव में 300 हिंसक घटनाएं हुईं थी और 58 लोगों की मौत हुई थी. ACLED डेटा के अनुसार, 2020 के बाद कई घटनाओं में राजनीतिक दलों की भूमिका सामने आई. इसी पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग ने इस बार “जीरो टॉलरेंस” नीति अपनाई है, ताकि किसी भी तरह की हिंसा को पहले ही रोका जा सके.
महुआ मोइत्रा ने क्या कहा?
चुनाव आयोग की इस तैयारी पर टीएमसी सांसद Mahua Moitra ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग मिलकर “मिलिट्री-स्टाइल कब्जे” की योजना बना रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि कश्मीर और मणिपुर जैसे संवेदनशील इलाकों से CAPF हटाकर बंगाल लाया जा रहा है. इतनी भारी तैनाती मतदाताओं को डराने के लिए की जा रही है. यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि यह “राष्ट्रीय सुरक्षा का मजाक” है और बंगाल को “बाहरी ताकतों के बूटों तले दबाने” की कोशिश की जा रही है.
सुरक्षा या सियासत?
पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले का माहौल यह दिखाता है कि सुरक्षा और राजनीति का संतुलन कितना जटिल हो सकता है. एक तरफ चुनाव आयोग और सुरक्षा एजेंसियां इसे निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी कदम बता रही हैं, तो दूसरी तरफ TMC इसे राजनीतिक दबाव और “ओवर-सेक्योरिटी” कह रही है.
चप्पे-चप्पे पर फोर्स, हाई अलर्ट पर बंगाल
बंगाल का चुनाव ग्राउंड जीरो से कवर कर रहे स्टेट मिरर के डिप्टी एडिटर जीतेंद्र चौहान का कहना है कि चुनाव आयोग ने शांति पूर्ण मतदान कराने के लिए पूरी तरह से कमर कस ली है. चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों की तैनाती है. सीएएफ, सीआरपीएफ, बीएसएफ व अन्य एजेंसियों के अधिकारी व जवान तैनात है. ईसी ने बिना डर के मतदान का माहौल बनाने की की कोशिश है. उन्होंने कहा मुर्शिदाबाद के जिस इलाके में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद निर्माण कराने की घोषणा की थी, उस इलाके में मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुरक्षा बलों के जवान तैनात नहीं किए गए है. इस इलाके में माहौल शांत है.
जीतेंद्र चौहान ने यह पूछे जाने पर कि ईसी ने जो सुरक्षा बलों की तैनाती की है, उस पर टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने तल्ख टिप्पणी की है. उन्होंने ईसी के इस एक्शन को मिलिट्री टेक ओवर करार दिया है. इस पर उन्होंने कहा कि वो कुछ भी कहें, वो उनका सियासी मामला है. लेकिन सच यह है कि ईसी ने चुनाव की तैयारी है और मतदाताओं को हर संभव सुरक्षा मुहैया कराने का काम किया है. उन्होंने कहा, अगर टीएमसी की गुंडागर्दी वाली बात सही है, तो इस बार सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम को देखकर तो यही लगता है, वो वैसा नहीं कर पाएंगे, जैसा अभी तक करते आएं हैं.




