गंदा है पर धंधा है! शराब क्यों है जरूरी, चाहकर भी बैन नहीं कर सकतीं सरकारें, कहां किसे मिलता है कितना रेवेन्यू
शराब को लेकर राजनीति और बहस अलग है, लेकिन राज्यों की कमाई का बड़ा हिस्सा इसी से आता है. जानिए कौन सा राज्य शराब से कितना रेवेन्यू कमाता है. यह धंधा और मजबूरी दोनों क्यों?
एनसी प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने शराबबंदी को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में चौंकाने वाल बयान दे दिया. तब से यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है. शराबबंदी हो ना हो, यह एक बार फिर बहस का विषय बन गया है. हकीकत यह है कि शराब से केंद्र और राज्य सरकार को होने वाली आया कुल आय का जीएसटी के बाद सबसे बड़ा हिस्सा है, जो सरकार चलाने के लिए जरूरी है. अब भारत में शराब सिर्फ नशे या सामाजिक बहस का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह राज्यों की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा बन चुकी है. जानें इस बहस का पूरा सच क्या है?
शराबबंदी पर क्या बोले फारूक अब्दुल्ला?
Farooq Abdullah ने कहा कि सिर्फ कानून बनाकर शराब या नशे को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है. उनके मुताबिक, “जो लोग शराब पीते हैं, वे पीते ही रहेंगे. अगर यहां नहीं मिलेगी तो कहीं और चले जाएंगे.” उन्होंने कहा कि सरकारें चाहकर भी शराबबंदी इसलिए लागू नहीं कर पातीं, क्योंकि इससे मिलने वाला राजस्व राज्यों की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम होता है.
मोरारजी देसाई और शेख अब्दुल्ला का क्या किस्सा बताया?
फारूक अब्दुल्ला ने अपने पिता Sheikh Abdullah और पूर्व प्रधानमंत्री Morarji Desai का एक पुराना किस्सा साझा किया. उन्होंने बताया कि मोरारजी देसाई शराबबंदी के पक्ष में थे और उन्होंने जम्मू-कश्मीर में शराब बिक्री रोकने का प्रस्ताव दिया था. इस पर शेख अब्दुल्ला ने कहा था कि अगर केंद्र सरकार शराब से होने वाले राजस्व की भरपाई कर दे, तो राज्य तुरंत शराबबंदी लागू कर देगा. हालांकि, उस समय यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया.
जम्मू-कश्मीर में नशा मुक्त अभियान कितना बड़ा?
जम्मू-कश्मीर में उपराज्यपाल Manoj Sinha के नेतृत्व में 100 दिनों का ‘नशा मुक्त जम्मू-कश्मीर’ अभियान चलाया जा रहा है, जो अब दूसरे महीने में पहुंच चुका है. पुलिस और प्रशासन ड्रग नेटवर्क को खत्म करने के लिए लगातार कार्रवाई कर रहे हैं. अभियान का लक्ष्य 100 दिनों के भीतर क्षेत्र को नशा मुक्त बनाना है.
मुफ्ती-ए-आजम ने फतवे में क्या कहा?
जम्मू-कश्मीर के मुफ्ती-ए-आजम Nasir-ul-Islam ने नशे के खिलाफ फतवा जारी किया है. उन्होंने कहा कि नशीले पदार्थों का बढ़ता इस्तेमाल सिर्फ सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक पतन की वजह भी है. मुफ्ती नासिर ने साफ कहा कि इस्लामी कानून के मुताबिक नशीले पदार्थों का व्यापार, खरीद-बिक्री और उससे होने वाली कमाई ‘हराम’ और ‘अपवित्र’ मानी जाएगी.
एक्साइज टैक्सेशन डिपार्टमेंट चंडीगढ़, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (NIPFP), कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनीज (CIABC) और राज्य आबकारी विभागों के आंकड़े बताते हैं कि शराब से मिलने वाला टैक्स अब कई राज्यों की वित्तीय रीढ़ बन चुका है. यही वजह है कि सार्वजनिक मंचों पर शराबबंदी की बात करने वाली सरकारें भी इसे पूरी तरह बंद करने का जोखिम नहीं उठा पातीं. जो राज्य ड्राइ स्टेट हैं, वहां पर वहां पर राजस्व की कमी हमेशा चर्चा का विषय बना रहता है.
साल 2025-26 के अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक, भारत का शराब कारोबार करीब ₹5.3 लाख करोड़ के बाजार में बदल चुका है. उद्योग विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सेक्टर हर साल 8% से 10% की दर से बढ़ रहा है. भारत में IMFL (इंडियन मेड फॉरेन लिकर) और बीयर की सालाना बिक्री 1,100 मिलियन केस से ज्यादा पहुंच चुकी है. इसमें व्हिस्की, रम, वोडका, जिन और बीयर जैसे उत्पाद शामिल हैं.
कितना बड़ा है भारत का शराब बाजार?
भारत का IMFL बाजार दुनिया के सबसे बड़े स्पिरिट बाजारों में शामिल हो चुका है. उद्योग अनुमानों के मुताबिक, देश में सालाना 40 करोड़ से ज्यादा केस IMFL की खपत होती है. नौ लीटर के एक केस की औसत खुदरा कीमत ₹4,500 से ₹5,500 के बीच मानी जाती है. इसी आधार पर भारत के शराब बाजार का आकार ₹5 लाख करोड़ से ज्यादा आंका जाता है. कुल मिलाकर तस्वीर साफ है - शराब सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय जरूर है, लेकिन आर्थिक तौर पर यह राज्यों के लिए ऐसा कारोबार बन चुका है, जिसे सरकारें चाहकर भी आसानी से बंद नहीं कर सकतीं.
किस राज्य का बजट शराब पर कितना ज्यादा निर्भर?
वित्त वर्ष 2024-25 के राज्य बजट और एक्साइज रिपोर्ट के मुताबिक, शराब से होने वाली कमाई कई राज्यों की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बन चुकी है. कई राज्यों में स्टेट एक्साइज ड्यूटी उनकी कुल टैक्स आय का 15% से 30% तक हिस्सा देती है. प्रतिशत के हिसाब से पुडुचेरी इस मामले में सबसे आगे माना जा रहा है, जहां कुल टैक्स कमाई का लगभग 34% हिस्सा शराब से आता है. इसकी सबसे बड़ी वजह कम स्थानीय टैक्स, भारी पर्यटन और ज्यादा बिक्री है.
इसके बाद झारखंड का नंबर आता है, जहां शराब से होने वाली कमाई राज्य की कुल टैक्स आय का लगभग 25% से 27% हिस्सा मानी जाती है. केरल में यह आंकड़ा करीब 24.8% है. ऊंचे टैक्स के बावजूद वहां शराब की खपत काफी ज्यादा बनी हुई है. उत्तराखंड और सिक्किम में भी शराब से होने वाली कमाई लगभग 23% तक पहुंचती है. पर्यटन और प्रति व्यक्ति ज्यादा खपत इसकी बड़ी वजह मानी जाती है.
अगर कुल रकम की बात करें तो उत्तर प्रदेश देश में सबसे ज्यादा शराब राजस्व जुटाने वाला राज्य है. FY25 में राज्य ने करीब ₹48,800 करोड़ का एक्साइज रेवेन्यू हासिल किया. यह उसकी कुल टैक्स आय का लगभग 21.8% हिस्सा माना जाता है. कर्नाटक में शराब से होने वाली कमाई कुल टैक्स आय का लगभग 20.6% है. राज्य IMFL खपत के मामले में देश में पहले स्थान पर है, जहां सालाना करीब 6.88 करोड़ केस की बिक्री होती है.
छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल भी तेजी से बढ़ते शराब बाजारों में शामिल हैं. दूसरी ओर बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के कारण शराब से आधिकारिक राजस्व लगभग शून्य है. कुल मिलाकर, शराब अब कई राज्यों के लिए GST के बाद सबसे बड़ा टैक्स स्रोत बन चुकी है.
शराब की बिक्री में कौन सबसे आगे?
IMFL खपत के मामले में कर्नाटक देश का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है. यहां सालाना लगभग 6.88 करोड़ केस शराब की बिक्री होती है. इसके बाद तमिलनाडु का नंबर आता है, जहां करीब 6.47 करोड़ केस की खपत दर्ज की गई है. तेलंगाना (3.71 करोड़ केस), आंध्र प्रदेश (3.55 करोड़ केस), महाराष्ट्र (2.71 करोड़ केस) और उत्तर प्रदेश (2.50 करोड़ केस) भी देश के सबसे बड़े शराब बाजारों में शामिल हैं.
केरल (2.29 करोड़ केस), पश्चिम बंगाल (1.49 करोड़ केस), राजस्थान (1.37 करोड़ केस) और दिल्ली (1.18 करोड़ केस) भी बड़े उपभोक्ता राज्यों में गिने जाते हैं. कुल मिलाकर, दक्षिण भारत देश की संगठित IMFL बिक्री के आधे से ज्यादा हिस्से पर कब्जा बनाए हुए है.
दक्षिण भारत का दबदबा क्यों?
विशेषज्ञों के मुताबिक, दक्षिण भारत में तेजी से शहरीकरण, बेहतर क्रय शक्ति और संगठित रिटेल नेटवर्क ने शराब बाजार को तेजी से बढ़ाया है. बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और मुंबई जैसे शहर प्रीमियम शराब बाजार के बड़े केंद्र बन चुके हैं. तमिलनाडु में TASMAC मॉडल यानी सरकार द्वारा संचालित शराब बिक्री व्यवस्था ने वितरण को पूरी तरह संगठित कर दिया है. वहीं कर्नाटक में निजी और लाइसेंस आधारित मजबूत रिटेल नेटवर्क बिक्री को लगातार बढ़ाता है. CIABC के मुताबिक, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल की संयुक्त खपत करीब 23 करोड़ केस सालाना है, जो राष्ट्रीय बाजार का लगभग तीन-पांचवां हिस्सा है.
शराब से सबसे ज्यादा कमाई कौन कर रहा है?
अगर टैक्स कमाई की बात करें तो उत्तर प्रदेश देश में सबसे आगे है. FY26 के अनुमान के मुताबिक, UP ने शराब से जुड़े एक्साइज टैक्स और ड्यूटी के जरिए करीब ₹57,722 करोड़ का राजस्व जुटाया. इसके बाद कर्नाटक (₹36,400 करोड़), महाराष्ट्र (₹30,000–35,000 करोड़), तेलंगाना (₹25,600–35,900 करोड़) और तमिलनाडु (₹22,000–44,000 करोड़) का स्थान आता है.
आंध्र प्रदेश (₹15,000–21,300 करोड़), पश्चिम बंगाल (₹18,000–20,400 करोड़), राजस्थान (₹15,000–17,000 करोड़), हरियाणा (₹12,000 करोड़) और पंजाब (₹10,400–11,782 करोड़) भी शराब से भारी टैक्स कमाते हैं. मध्य प्रदेश, केरल, ओडिशा, दिल्ली और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी हजारों करोड़ रुपये की एक्साइज कमाई करते हैं. कई राज्यों में शराब उनकी कुल टैक्स आय का 15% से 30% तक हिस्सा देती है.
सरकारें शराबबंदी से क्यों डरती हैं?
शराब GST के दायरे से बाहर है, इसलिए इसका पूरा टैक्स सीधे राज्यों को मिलता है. यही वजह है कि एक्साइज ड्यूटी राज्यों के लिए सबसे भरोसेमंद और स्वतंत्र टैक्स स्रोतों में शामिल है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में शराब से होने वाली कमाई उनके GSDP का लगभग 2.3% तक पहुंच चुकी है. छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी यह हिस्सा काफी बड़ा है.
यही कारण है कि सरकारें नैतिक और राजनीतिक बहस के बावजूद शराबबंदी लागू करने से बचती हैं. बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में पूर्ण शराबबंदी लागू जरूर है, लेकिन वहां अवैध शराब कारोबार लगातार चुनौती बना हुआ है.
छोटे राज्य प्रतिशत में आगे क्यों?
अगर आबादी के अनुपात में देखें तो अरुणाचल प्रदेश (38.4%), सिक्किम (28.1%) और गोवा (20.9%) में शराब उपभोक्ताओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा है. विशेषज्ञों के मुताबिक, पर्यटन, सांस्कृतिक स्वीकार्यता और स्थानीय खानपान की परंपराएं इसकी बड़ी वजह हैं.
शराब का धंधा गंदा पर मजबूरी क्यों?
शराब का कारोबार सामाजिक नजरिए से भले “गंदा धंधा” माना जाता हो, लेकिन राज्यों की अर्थव्यवस्था के लिए यह बड़ी मजबूरी बन चुका है. इसकी सबसे बड़ी वजह है एक्साइज टैक्स से होने वाली भारी कमाई. भारत में शराब GST के दायरे से बाहर है, इसलिए शराब पर लगने वाला पूरा टैक्स सीधे राज्य सरकारों को मिलता है. कई राज्यों में शराब से होने वाली कमाई उनकी कुल टैक्स आय का 15% से 30% तक हिस्सा देती है.
उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्य शराब से हर साल हजारों करोड़ रुपये कमाते हैं. यही पैसा सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी योजनाओं में खर्च होता है. अगर सरकारें अचानक शराबबंदी लागू कर दें तो राजस्व पर बड़ा असर पड़ सकता है.
बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में शराबबंदी लागू होने के बावजूद अवैध शराब कारोबार की चुनौती बनी रहती है. यही कारण है कि नैतिक बहस और राजनीतिक बयानबाजी के बावजूद ज्यादातर राज्य शराब कारोबार बंद करने से बचते हैं.




