IMDB पर छाईं ये 5 फ्लॉप फिल्में, बॉक्स ऑफिस पर हुईं फेल लेकिन आज कहलाती हैं Cult Classics
बॉक्स ऑफिस पर असफल होने के बावजूद कुछ बॉलीवुड फिल्मों ने समय के साथ ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि आज उन्हें कल्ट क्लासिक. माना जाता है। IMDb पर इन फिल्मों की रेटिंग कई सुपरहिट फिल्मों से भी बेहतर है
सिनेमा का एक बुनियादी नियम रहा है जो बॉक्स ऑफिस पर हिट, वो सुपरहिट. लेकिन क्या सिनेमा की सफलता को सिर्फ टिकट खिड़की पर बरसे पैसों से नापा जा सकता है? बिल्कुल नहीं. बॉलीवुड का इतिहास गवाह है कि कई बार कुछ फिल्में सिनेमाघरों में इस कदर औंधे मुंह गिरीं कि मेकर्स के करोड़ों रुपये डूब गए और एक्टर्स के करियर पर सवालिया निशान लग गए. लेकिन समय का पहिया घूमा, दौर बदला, और जब इन फिल्मों को टीवी, डीवीडी या आज के ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर देखा गया, तो दुनिया दंग रह गई. इंटरनेट मूवी डेटाबेस यानी IMDb पर जब इन फ्लॉप फिल्मों की रेटिंग देखी जाती है, तो ये आज की कई 500 करोड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों को भी पीछे छोड़ देती हैं. इन्हें आज सिनेमाई गलियारों में 'Cult Classics' कहा जाता है.
1. अंदाज अपना अपना (1994)
IMDb रेटिंग: 8.0/10
बॉक्स ऑफिस स्टेटस: फ्लॉप
आज शायद ही कोई ऐसा सिनेमाप्रेमी होगा जो आमिर खान और सलमान खान की इस फिल्म के डायलॉग्स पर न हंसा हो. 'क्राइम मास्टर गोगो', 'तेजा मैं हूं, मार्क इधर है' जैसे वन-लाइनर्स आज भी मीम्स की दुनिया पर राज करते हैं. साल 1994 में जब राजकुमार संतोषी ने इसे रिलीज किया, तो फिल्म को लेकर कोई खास बज नहीं बन पाया था. उस दौर में इस फिल्म का प्रमोशन बेहद खराब था और पोस्टर देखकर लोगों को लगा कि यह कोई रद्दी कॉमेडी फिल्म है. उसी साल 'हम आपके हैं कौन' जैसी पारिवारिक ब्लॉकबस्टर रिलीज हुई थी, जिसके सामने 'अंदाज अपना अपना' का क्रेजी और सटायरिकल ह्यूमर उस वक्त के दर्शकों के सिर के ऊपर से निकल गया. लेकिन आज यह फिल्म भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे बेहतरीन कॉमेडी फिल्मों में शुमार है.
2. जाने भी दो यारों (1983)
IMDb रेटिंग: 8.3/10
बॉक्स ऑफिस स्टेटस: फ्लॉप
कुंदन शाह के निर्देशन में बनी 'जाने भी दो यारों' को आज भारतीय सिनेमा का 'मास्टरपीस' माना जाता है. नसीरुद्दीन शाह, रवि वासवानी, पंकज कपूर, सतीश शाह और ओम पुरी जैसे दिग्गज कलाकारों से सजी यह फिल्म समाज, मीडिया और राजनीति के भ्रष्टाचार पर एक बेहद तीखा और मजेदार व्यंग्य थी. 80 के दशक में दर्शक थिएटर्स में नाच-गाना, मारधाड़ और मेलोड्रामा देखने के आदी थे. उस दौर में एक ऐसी डार्क कॉमेडी फिल्म आना, जिसमें हीरो की जीत भी नहीं होती और अंत थोड़ा कड़वा होता है, कमर्शियल मार्केट को रास नहीं आया. बजट कम होने के बावजूद फिल्म अपनी लागत तक नहीं निकाल पाई. वक्त बदला और आज इसके महाभारत वाले क्लाइमेक्स सीन को कॉमेडी की यूनिवर्सिटी कहा जाता है.
3. मेरा नाम जोकर (1970)
IMDb रेटिंग: 7.9/10
बॉक्स ऑफिस स्टेटस: बड़ी डिजास्टर
शो-मैन राज कपूर ने इस फिल्म को बनाने में अपने जीवन के 6 साल और अपनी पूरी जमापूंजी लगा दी थी. यह एक सर्कस के जोकर की बेहद दार्शनिक और भावुक कहानी थी, जो दुनिया को हंसाने के लिए अपने आंसुओं को छुपा लेता है. जब यह फिल्म रिलीज हुई, तो इसकी लंबाई लगभग 4 घंटे 15 मिनट थी और फिल्म में दो इंटरमिशन थे. दर्शकों को यह फिल्म बहुत ज्यादा लंबी, थकाऊ और जरूरत से ज्यादा उदास करने वाली लगी. बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म इतनी बुरी तरह पिटी कि आरके स्टूडियोज कर्ज के दलदल में धंस गया. हालांकि, रूस में इसे काफी पसंद किया गया था. आज राज कपूर के इस 'मिसअंडरस्टूड मास्टरपीस' को सिनेमा की कला का सर्वोच्च शिखर माना जाता है.
4. कागज के फूल (1959)
IMDb रेटिंग: 7.8/10
बॉक्स ऑफिस स्टेटस: डिजास्टर
सिनेमा के जादूगर गुरु दत्त और वहीदा रहमान अभिनीत 'कागज के फूल' भारत की पहली सिनेमास्कोप (Cinemascope) फिल्म थी. यह एक फिल्म डायरेक्टर के उतार-चढ़ाव और उसकी तन्हाई की बेहद खूबसूरत मगर दर्दनाक दास्तान थी. यह फिल्म तकनीकी और कहानी के लेवल पर अपने समय से कम से कम 20 साल आगे थी. उस जमाने के दर्शकों को फिल्म की डार्क थीम और उदासी बिल्कुल पसंद नहीं आई और फिल्म थिएटर्स से चंद दिनों में उतर गई. इस असफलता ने गुरु दत्त को अंदर से तोड़ दिया था और उन्होंने इसके बाद कभी किसी फिल्म का आधिकारिक निर्देशन नहीं किया. आज दुनिया भर के फिल्म स्कूलों में 'कागज के फूल' में सिनेमैटोग्राफी और लाइटिंग के इस्तेमाल को एक गाइड की तरह पढ़ाया जाता है.
5. तमाशा (2015)
IMDb रेटिंग: 7.3/10
बॉक्स ऑफिस स्टेटस: फ्लॉप
रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण स्टारर और इम्तियाज अली निर्देशित 'तमाशा' कॉरपोरेट लाइफ की घिसी-पिटी जिंदगी में फंसे एक युवक (वेद) की कहानी है, जो अंदर से एक कहानीकार है. फिल्म के ट्रेलर ने लोगों को यह उम्मीद दी थी कि यह 'ये जवानी है दीवानी' जैसी एक टिपिकल रॉम-कॉम (रोमैटिक कॉमेडी) होगी. लेकिन जब लोग थिएटर पहुंचे, तो उन्हें एक गहरी, साइकोलॉजिकल और सिंबॉलिक फिल्म देखने को मिली. जो लोग सिर्फ मनोरंजन के लिए गए थे, उन्हें निराशा हाथ लगी. लेकिन आज के समय में, खासकर युवाओं के बीच, 'तमाशा' एक कल्ट फिल्म बन चुकी है.




