Middle East में ‘लंबी जंग’ चाहता है Saudi Arabia! शांति से क्यों डर रहे Mohammad Bin Salman, क्या है असली मंशा?
Saudi Arabia चाहता है कि ईरान के खिलाफ जंग लंबी चले! इसके पीछे उसका खास मकसद है, जिसको लेकर प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अमेरिका पर लगातार दबाव बना रहे हैं.
Iran War: मिडिल ईस्ट में जंग जारी है और सभी देश चाहते हैं कि इस जंग को जल्द से जल्द खत्म किया जाए. पूरी दुनिया फ्यूल संकट की ओर बढ़ रही है. उधर, सऊदी अरब है जो लगातार अमेरिका पर ईरान पर हमले करने का दबाव बना रहा है.
माना जा रहा है कि सऊदी अरब का रुख सिर्फ मौजूदा युद्ध के खतरे से नहीं, बल्कि उसके बाद की स्थिति को लेकर तय हो रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान एक जटिल रणनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
सऊदी क्यों नहीं चाहता है कि ये जंग जल्दी खत्म हो?
विशेषज्ञों का मानना है कि सलमान चाहते हैं कि ईरान इस जंग में कमज़ोर हो जाए और सऊदी इस बात का फायदा उठा सके. द न्यूयॉर्क टाइम्स और द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी नेताओं ने निजी तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से तेहरान पर दबाव बनाए रखने की अपील की है. उनका मानना है कि अमेरिका-इजरायल का मौजूदा अभियान मिडिल ईस्ट में शक्ति संतुलन को बदलने का एक “ऐतिहासिक मौका” है.
क्या है सऊदी अरब की सबसे बड़ी फिक्र?
रियाद की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर जल्दबाजी में कोई कूटनीतिक समझौता हो जाता है, तो ईरान कमजोर तो होगा, लेकिन पूरी तरह नियंत्रित नहीं होगा. ऐसे में वह खाड़ी क्षेत्र के तेल ढांचे को निशाना बनाने, अहम समुद्री रास्तों को बाधित करने और अपने क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिए प्रभाव बनाए रखने में सक्षम रह सकता है.
क्या है मोहम्मद बिन सलमान के सामने बड़ी दुविधा?
मोहम्मद बिन सलमान के सामने यही रणनीतिक दुविधा है कि क्या ईरान की सैन्य क्षमताओं को गंभीर रूप से कमजोर करने के लिए सैन्य दबाव जारी रखा जाए या फिर जल्दी शांति होने का जोखिम उठाया जाए, जिससे एक घायल लेकिन खतरनाक प्रतिद्वंद्वी बना रह सकता है.
फाइनेंशियल टाइम्स को बर्नार्ड हायकल ने बताया कि मोहम्मद बिन सलमान “स्थिरता और व्यवस्था” चाहते हैं और नहीं चाहते कि चारों ओर मिसाइलें उड़ती रहें. सऊदी अरब की ‘विजन 2030’ योजना पर्यटन और निवेश पर काफी निर्भर है, और लंबा खिंचता युद्ध इसे नुकसान पहुंचा सकता है. लेकिन इसके साथ ही सऊदी अरब यह भी चाहता है कि युद्ध के बाद ईरान कमजोर स्थिति में हो.
मध्यस्थता डील से क्या है सऊदी अरब को समस्या?
वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, सऊदी अरब मध्यस्थता की उन कोशिशों को लेकर असहज है, जिनमें प्रतिबंधों में ढील के बदले ईरान से कुछ रियायतें ली जाएं, लेकिन उसे खाड़ी के ऊर्जा मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव बनाए रखने दिया जाए. उसे डर है कि आंशिक रूप से कमजोर हुआ ईरान आने वाले वर्षों में मिसाइल, ड्रोन और अपने सहयोगी समूहों के जरिए बदला लेने की कोशिश कर सकता है, साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट डाल सकता है.
क्या चाहता है सऊदी अरब?
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप की यास्मीन फारूक ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि “सऊदी अधिकारी निश्चित रूप से चाहते हैं कि युद्ध खत्म हो, लेकिन यह कैसे खत्म होता है, यह ज्यादा अहम है.” क्राउन प्रिंस ने ट्रंप से यह भी कहा है कि वह बहुत जल्दी पीछे न हटें, क्योंकि ईरान खाड़ी देशों के लिए एक दीर्घकालिक खतरा बना हुआ है. उन्होंने ईरान के ऊर्जा ढांचे पर हमलों की भी वकालत की है. हालांकि, सार्वजनिक तौर पर सऊदी अरब का रुख अब भी सावधानी भरा बना हुआ है.
सऊदी सरकार ने एक न्यूज पोर्टल से कहा कि सऊदी अरब हमेशा इस संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करता रहा है, यहां तक कि इसके शुरू होने से पहले भी. साथ ही उसने कहा, “आज हमारी प्राथमिक चिंता अपने लोगों और नागरिक ढांचे को रोजाना हो रहे हमलों से बचाना है.”