स्किन पर इंक, आंखों पर अटैक, टैटू हमेशा के लिए छीन सकते हैं रोशनी! ऑस्ट्रेलिया के मामलों ने सबको किया हैरान

ऑस्ट्रेलिया में आए टैटू से जुड़े मामलों ने सबको हैरान कर दिया है. यहां टैटू बनवाने वाले लोगों में आंखों की बीमारी होने के केस रिपोर्ट किए गए हैं. डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी से हमेशा के लिए आंखों की रोशनी जा सकती है.;

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Edited By :  समी सिद्दीकी
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Tattoo ink causing eye diseases: ऑस्ट्रेलिया में टैटू से जुड़ी एक दुर्लभ लेकिन आंखों की रोशनी के लिए खतरनाक बीमारी के मामले सामने आए हैं. ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (ABC) की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 40 नए मामलों की पहचान हुई है. इस कंडीशन को टैटू-एसोसिएटेड यूवाइटिस कहा जाता है.

डॉक्टर्स का कहना है कि टैटू से होने वाली इस बीमारी से लोगों की आंखों की रोशनी जाने का भी खतरा है. रिसर्चर्स का कहना है कि अगर किसी टैटू कराए शख्स को  टैटू-एसोसिएटेड यूवाइटिस मिलता है तो उसे गहनता से लिया जाए.

टैटू-एसोसिएटेड यूवाइटिस क्या है?

यूवाइटिस आंख की बीच की परत यूविया में सूजन को कहते हैं. इसमें आईरिस और आसपास के टिश्यू शामिल होते हैं. सूजन होने पर धुंधला दिखना, रोशनी से परेशानी, आंखों में दर्द और आंखों का लाल होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. समय पर इलाज न होने पर यह ग्लूकोमा और परमानेंटनी आंखों की रोशनी जा सकती है.

कैसे होती है यह समस्या?

टैटू-एसोसिएटेड यूवाइटिस तब होता है जब शरीर का डिफेंस सिस्टम स्किन में मौजूद टैटू के रंगों पर रिएक्ट करता है और उसी प्रक्रिया में आंखों के टिश्यू पर भी हमला कर देता है. विशेषज्ञ इसे इम्यून 'क्रॉसफायर' जैसी कंडीशन बताते हैं, हालांकि इसकी सटीक वजह अभी सामने नहीं आई है.

हाल के मामलों का पता कैसे चला?

ABC की रिपोर्ट में नेलिज़ प्रिटोरियस नाम की एक महिला का मामला सामने आया, जिन्हें शुरुआत में धुंधला दिखना शुरू हुआ. पहले इसे कंजक्टिवाइटिस समझा गया, लेकिन जांच में यह कारण नहीं निकला. बाद में डॉक्टर जोसेफीन रिचर्ड्स ने पाया कि आंखों की सूजन उनकी पीठ पर कई साल पहले बने टैटू से जुड़ी हो सकती है.

प्रिटोरियस अब स्टेरॉयड आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल कर रही हैं और इलाज पर काफी खर्च कर चुकी हैं. इस बीमारी में लंबे समय तक इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं की जरूरत पड़ सकती है और कुछ मरीज दवाएं बंद नहीं कर पाते.

डॉक्टर क्यों हैं फिक्रमंद?

यूवाइटिस कोई नई बीमारी नहीं है और यह ऑटोइम्यून बीमारियों जैसे इंफ्लेमेटरी आर्थराइटिस में भी देखी जाती है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया में डॉक्टरों ने देखा कि टैटू वाले युवा मरीजों में ऐसे मामलों की तादाद बढ़ रही है. एक सम्मेलन के दौरान अलग-अलग क्लीनिकों के विशेषज्ञों ने पाया कि वे समान पैटर्न देख रहे हैं.

बाद में हुई स्टडी में 40 नए ऑस्ट्रेलियाई मामलों की पुष्टि हुई. ज्यादातर मरीजों को लंबे समय तक इम्यूनोसप्रेसिव इलाज की जरूरत पड़ी और केवल तीन मरीज इलाज के दौरान दृष्टि हानि से बचे रहे.

कौन से टैटू इंक पर शक है?

रिसर्च के मुताबिक काला इंक सबसे ज्यादा मामलों से जुड़ा पाया गया, हालांकि लाल और गुलाबी रंग भी कुछ मामलों में शामिल थे. आमतौर पर लक्षण टैटू बनवाने के एक से दो साल बाद दिखाई दिए, लेकिन एक मामले में 35 साल बाद भी लक्षण सामने आए. कुछ टैटू विदेश में बने थे, जैसे बाली में, जिससे खास इंक की पहचान करना मुश्किल हो गया.

क्या इसका रिलेशन दूसरी बीमारियों से है?

डॉक्टरों ने पाया कि सूजे हुए टैटू कुछ हद तक सारकॉइडोसिस नामक बीमारी जैसे दिखते हैं, जिसमें इम्यून सेल्स शरीर के अंगों में जमा हो जाती हैं. बायोप्सी में भी इसी तरह के इम्यून पैटर्न दिखे. शोधकर्ताओं का मानना है कि कुछ लोगों में जेनेटिकल वजहों से डिफेंस सिस्टम ज्यादा प्रतिक्रिया कर सकता है. माइक्रोबायोम यानी शरीर में मौजूद सूक्ष्म जीवों की भूमिका भी हो सकती है, लेकिन यह अभी एक हाइपोथेसिस है.

इससे कितना जोखिम है?

विशेषज्ञों का कहना है कि टैटू बनवाने वालों की बड़ी संख्या की तुलना में यह बीमारी अभी भी दुर्लभ है. ऑस्ट्रेलिया में लगभग 20 से 30 फीसद लोगों के पास कम से कम एक टैटू है और उनमें से अधिकांश को कोई समस्या नहीं होती. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता जरूरी है, क्योंकि समय पर इलाज से स्थायी नुकसान रोका जा सकता है.

टैटू बनवाने वालों को क्या जानना चाहिए?

शोधकर्ता टैटू पर रोक लगाने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि डॉक्टरों से अपील कर रहे हैं कि अगर टैटू वाले मरीज में बिना स्पष्ट कारण के यूवाइटिस दिखे तो इस संभावना पर विचार किया जाए. साथ ही टैटू इंक की संरचना और नियमों पर और रिसर्च की जरूरत बताई गई है, ताकि उन रंगों की पहचान की जा सके.

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