अमेरिका के करीब, जनता से दूर? ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होकर फंसे शरीफ, पाक में मचा जमकर बवाल; विपक्ष ने सरकार को घेरा

दावोस में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई वाले ‘Board of Peace for Gaza’ के चार्टर पर दस्तखत करना पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ को घरेलू राजनीति में भारी पड़ता नजर आ रहा है. सरकार इसे एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बता रही है, लेकिन पाकिस्तान के भीतर विपक्षी दलों ने इसे ग़ैर-पारदर्शी, नैतिक रूप से गलत और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करने वाला कदम करार दिया है.;

शहबाज शरीफ और डोनाल्ड ट्रंप  

(Image Source:  फाइल फोटो )
Edited By :  अच्‍युत कुमार द्विवेदी
Updated On : 22 Jan 2026 10:44 PM IST

Pakistan PM  Shehbaz Sharif Gaza Board Controversy: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ के एक अंतरराष्ट्रीय कदम ने देश के भीतर जबरदस्त सियासी तूफान खड़ा कर दिया है. स्विट्ज़रलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान शहबाज़ शरीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर बने ‘गाजा के लिए बोर्ड ऑफ पीस’ के चार्टर पर हस्ताक्षर किए. शहबाज़ शरीफ ने इसे पाकिस्तान के लिए एक अहम कूटनीतिक उपलब्धि बताया, लेकिन इस फैसले पर इस्लामाबाद में तीखी आलोचना शुरू हो गई है.

दरअसल, ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस को गाजा संघर्ष खत्म करने की अपनी 20-सूत्रीय योजना के दूसरे चरण के रूप में पेश किया है. यह बोर्ड न सिर्फ गाजा बल्कि भविष्य में अन्य वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए भी काम करेगा. इसके दायरे में प्रशासनिक ढांचा तैयार करना, पुनर्निर्माण, निवेश आकर्षित करना और बड़े पैमाने पर फंड जुटाना शामिल बताया जा रहा है. कई देशों को आशंका है कि यह पहल संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका को कमजोर करने की कोशिश हो सकती है.

पाकिस्तान में विरोध क्यों?

शहबाज़ शरीफ के इस कदम पर सबसे तीखा हमला इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने किया है। पार्टी ने साफ कहा कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय फैसले बिना पारदर्शिता और राजनीतिक सहमति के नहीं लिए जा सकते. PTI ने सरकार से मांग की है कि इस फैसले को संसद के सामने लाया जाए और सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से सलाह ली जाए.

PTI नेताओं का कहना है कि पाकिस्तान को किसी भी शांति पहल में शामिल होना चाहिए, लेकिन वह पहल संयुक्त राष्ट्र की बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने वाली हो, न कि उसके समानांतर कोई नया ढांचा खड़ा करने वाली. पार्टी ने यहां तक कह दिया कि जब तक पूरी परामर्श प्रक्रिया नहीं होती और इमरान खान को इसमें शामिल नहीं किया जाता, तब तक पाकिस्तान को इस बोर्ड से दूरी बना लेनी चाहिए. PTI ने इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) कराने की मांग भी रखी है.

‘नैतिक रूप से गलत फैसला’

विरोध यहीं नहीं रुका। सीनेट में विपक्ष के नेता और मजलिस वहदत-ए-मुस्लिमीन (MWM) के प्रमुख अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने शहबाज़ सरकार के फैसले को 'नैतिक रूप से गलत और अस्वीकार्य' करार दिया. उन्होंने कहा कि गाजा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अमेरिका के नेतृत्व वाली पहल में शामिल होना पाकिस्तान के सिद्धांतों के खिलाफ है. इसी दौरान ट्रंप ने मंच से कड़ा बयान देते हुए कहा कि अगर हमास ने हथियार नहीं डाले तो उसे 'खत्म' कर दिया जाएगा. इस बयान ने भी पाकिस्तान में नाराज़गी को और बढ़ा दिया.

‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर सवाल

खुद ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं. अमेरिका ने इस पहल के लिए 60 से ज्यादा देशों को न्योता दिया था, जिनमें भारत और चीन जैसे बड़े देश भी शामिल थे, लेकिन दावोस में इसके लॉन्च के समय 20 से भी कम देशों ने इसमें भाग लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए करीब 1 अरब डॉलर की फीस भी तय की गई है.

अक्टूबर में इजरायल और हमास के बीच ट्रंप की शांति योजना पर सहमति बनने का दावा किया गया था, लेकिन जमीनी हालात अब भी तनावपूर्ण हैं. ऐसे में इस नए बोर्ड की भूमिका और मंशा पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस जारी है.

‘बोर्ड ऑफ पीस’ की बैठक में कौन-कौन देश हुए शामिल?

ट्रंप के इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की बैठक में  पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्किये, यूएई, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, अर्जेंटीना, वियतनाम, मोरक्को, कजाकिस्तान समेत कुल 20 से ज्यादा देश शामिल हैं. फिलहाल पाकिस्तान में यह मुद्दा तेज़ी से राजनीतिक रंग ले चुका है. शहबाज़ शरीफ सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है. आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि पाकिस्तान इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में अपनी भूमिका को लेकर पीछे हटता है या विपक्षी विरोध के बावजूद इस फैसले पर कायम रहता है.

क्या यह पाकिस्तान की विदेश नीति में बड़ा मोड़ है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला पाकिस्तान को अमेरिका के और करीब लेकिन घरेलू स्तर पर कमजोर और इस्लामिक देशों में असहज स्थिति में ला सकता है खासतौर पर तब, जब ट्रंप मंच से हमास को खत्म करने की धमकी दे रहे हों.

Board of Peace सिर्फ गाजा की शांति योजना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने की अमेरिकी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. पाकिस्तान का इसमें शामिल होना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहसिक लेकिन घरेलू राजनीति में विस्फोटक कदम साबित हो रहा है.

आखिर क्या है ट्रंप का ‘Board of Peace’?

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लॉन्च किया गया Board of Peace औपचारिक तौर पर गाजा युद्ध के समाधान के लिए पेश किया गया है, लेकिन इसका दायरा सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं बताया जा रहा. इस बोर्ड का मकसद, युद्धग्रस्त इलाकों में शासन व्यवस्था तैयार करना, पुनर्निर्माण (Reconstruction), बड़े पैमाने पर निवेश और फंडिंग जुटाना और अंतरराष्ट्रीय विवादों में सीधी दखलअंदाजी करना है. यानी यह सिर्फ शांति पहल नहीं, बल्कि एक पैरलल ग्लोबल पावर स्ट्रक्चर की शक्ल ले सकता है.

UN से टकराव क्यों माना जा रहा है यह मॉडल?

संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका अब तक युद्धविराम, शांति मिशन, मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय सहमति से फैसले पर आधारित रही है. वहीं Board of Peace अमेरिकी नेतृत्व में सीमित देशों की भागीदारी, कथित तौर पर $1 बिलियन की स्थायी सदस्यता फीस और बिना व्यापक वैश्विक सहमति पर आधारित है. आलोचकों का कहना है कि यह UN को दरकिनार कर अमेरिका-केंद्रित व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश है.

भारत और चीन क्यों दूर रहे?

भारत और चीन जैसे बड़े देशों का इससे दूरी बनाना अहम संकेत माना जा रहा है. इसका कारण है- किसी एक देश के नेतृत्व वाली संस्था पर भरोसे की कमी, UN के कमजोर होने की आशंका, और भविष्य में इस बोर्ड का राजनीतिक दबाव उपकरण बन जाना. यही वजह है कि 60 से ज्यादा आमंत्रित देशों में से 20 से भी कम दावोस में शामिल हुए.  

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