IRAN की वो नीति जिससे इजरायल के ​लिए खतरा बन गए खामनेई, नेतन्याहू और ट्रंप के लिए 'हत्या' कैसे बन गई अंतिम विकल्प?

Israel Iran War : खामनेई की नीतियों ने इजरायल के लिए सुरक्षा संकट को गहरा किया है. स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि उनकी हत्या तक को “अंतिम विकल्प” माना जा रहा है.

By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 1 March 2026 12:25 PM IST

Israel Iran War : मध्य-पूर्व में सुप्रीमेसी की जंग सिर्फ मिसाइलों और सेनाओं की नहीं, बल्कि विचारधाराओं की भी है. इसी टकराव के केंद्र में है 'जियोनिज्म' बनाम ईरान की इस्लामिक क्रांति की नीति. अयातुल्ला अली खामनेई लगातार जियोनिज्म को 'कब्जे की विचारधारा' बताते रहे हैं. जबकि बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में इजरायल इसे अपने अस्तित्व और सुरक्षा का आधार मानता है.

यही वैचारिक टकराव अब सैन्य और रणनीतिक संघर्ष में बदल चुका है. ईरान की “प्रॉक्सी वॉर” नीति?, जिसमें हिज्बुल्लाह, हमास जैसे समूहों को समर्थन शामिल माना जाता है. इजरायल के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है. इस वजह से खामनेई सिर्फ एक राष्ट्राध्यक्ष नहीं, बल्कि इजरायल विरोधी पूरे नेटवर्क के ‘स्ट्रैटेजिक आर्किटेक्ट’ माने जाते थे.

1. क्या खामनेई की हत्या ही ‘अंतिम विकल्प’ था?

ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू जैसे नेताओं के लिए सवाल सिर्फ कूटनीति का नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई का बन गया. जहां खामनेई का सत्ता से हटना या फिर हत्या ही अमेरिका और इजरायल के पास अंतिम विकल्प बच गया था. सत्ता परिवर्तन में लिए पश्चिमी ताकतों की सहारे ईरान में प्रोटेस्ट चला, जिसमें हजारों ईरानी नागरिक मारे गए थे. पश्चिमी ताकतों की जब वो नीति सफल नहीं हुई तो डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने खामनेई को हमेशा के लिए दूर करने का निर्णय लिया. यही वजह है कि दोनों के लिए खामनेई का अंत “अंतिम विकल्प” बन गया.

2. इजरायल के लिए सबसे बड़ा खतरा कैसे बने अयातुल्ला खामनेई?

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई पिछले तीन दशकों में मध्य-पूर्व की राजनीति के सबसे प्रभावशाली और विवादित चेहरों में शामिल रहे हैं. उनकी विचारधारा खुलकर इजरायल विरोधी रही है और वे बार-बार “इजरायल के अंत” की बात कर चुके हैं. खामनेई के नेतृत्व में ईरान ने सिर्फ बयानबाजी नहीं की, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर ऐसे नेटवर्क खड़े किए जो सीधे तौर पर इजरायल की सुरक्षा के लिए चुनौती बन गए. यही वजह है कि तेल अवीव उन्हें केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक खतरे के रूप में देखता है.

3. खामनेई की रणनीति क्या है, जिससे इजरायल घिर गया?

खामनेई की रणनीति “डायरेक्ट वॉर” से ज्यादा “प्रॉक्सी वॉर” पर आधारित रही है. ईरान ने लेबनान में हिज्बुल्लाह, गाजा में हमास और अन्य मिलिशिया समूहों को समर्थन देकर इजरायल के चारों ओर एक तरह की “रिंग ऑफ फायर” तैयार की है. इस रणनीति का मकसद यह है कि बिना सीधे युद्ध के भी इजरायल को लगातार दबाव में रखा जाए. खामनेई की यही अप्रत्यक्ष युद्ध नीति इजरायल के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुकी है.

4. ईरान ने कभी क्यों नहीं माना इजरायल को स्वतंत्र राष्ट्र?

1979 में हुई इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान और इजरायल के बीच पूर्ण शत्रुता स्थापित हो गई. क्रांति के बाद ईरानी शासन ने इज़रायल की वैधता (legitimacy) को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया और उसे “जायोनीस्ट शासन” (Zionist regime) कहकर संदर्भित करता है.

ईरान सरकार इजरायल को एक स्वतंत्र राज्य नहीं मानती, इसे कब्जे में लिया हुआ शासन कहती है जिसकी स्थापना पश्चिमी साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक योजनाओं के तहत हुई थी. इयकस नतीजा यह निकला कि ईरान–इजरायल के बीच कोई राजनयिक संबंध, वाणिज्यिक आदान‑प्रदान या औपचारिक मान्यता देने की सोच ही विकसित नहीं हुई.

5. ईरान के संविधान और कानून में क्या लिखा है?

ईरान के संविधान में सीधे “इज़रायल” के बारे में नाम से कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन विदेश नीति और संघर्ष के मूल सिद्धांत तय हैं. ईरान के संविधान में विदेशी नीति के मूल सिद्धांत (Article 152–154) के तहत किसी भी प्रकार के प्रभुत्व (domination) का विरोध शामिल है.

देश की विदेश नीति सभी मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा और गैर‑आक्रामक राज्यों के साथ शांतिपूर्ण संबंध पर आधारित है. ईरान “दुनिया भर में सभी लोगों के लिए स्वतंत्रता, न्याय, और आजादी का समर्थन” करने का दावा करता है.

यही वजह है कि ईरान ने इजरायल जैसी कब्जे वाली सत्ता को मान्यता देने का कभी समर्थन नहीं किया. वह ‘मुस्लिमों के अधिकारों’ और ‘अत्याचार के खिलाफ संघर्ष’ को प्राथमिकता देता है.

6. ईरान  का कानून Countering Hostile Actions क्या है?

ईरानी संसद (Majlis) ने 2020 में एक कानून पारित किया था, जिसका उद्देश्य जायोनी यानी इजरायली रणनीति के विरुद्ध कानूनी रूप से कार्रवाई करना है. यह कानून इजरायल के साथ किसी भी नागरिक या व्यावसायिक संपर्क को रोकता है.

7. ईरान का सिद्धांत - 'एक राज्य या एक जनादेश?'

ईरानी नीतिगत बयानबाजी में अक्सर कहा जाता है कि समाधान दो‑राज्य समाधान (two‑state solution) को स्वीकार करने जैसा नहीं हो सकता क्योंकि यह इजरायल की वैधता को टैग करता है, जिसे ईरान मानने के लिए तैयार नहीं है. कुछ ईरानी अधिकारियों कहते रहे हैं कि यदि भविष्य में एक ऐसी व्यवस्था हो जिसमें फिलिस्तीनी, मुस्लिम, ईसाई और यहूदी वहां मिलकर शांति से चुनाव करें, तो वह स्थिति नया राजनीतिक स्वरूप हो सकता है. परन्तु यह इजरायल जैसा आज मौजूद राष्ट्र स्वीकार करने जैसा नहीं होगा.

8. क्या परमाणु कार्यक्रम ने खतरे को और बढ़ा दिया?

ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम लंबे समय से इजरायल की सबसे बड़ी चिंता रहा है. इजरायल को डर है कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाने में सफल हो गया, तो क्षेत्रीय संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा. खामनेई के नेतृत्व में ईरान लगातार अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाता रहा है, भले ही वह इसे “शांतिपूर्ण” बताता हो. लेकिन इजरायल इसे अपनी सुरक्षा के लिए अस्तित्व का खतरा मानता है, जिससे तनाव और बढ़ गया है.

9. बेंजामिन नेतन्याहू खामनेई को ‘टॉप टारगेट’ क्यों मानते हैं?

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से खामनेई को ईरान की आक्रामक नीतियों का मास्टरमाइंड बताते रहे हैं. उनका मानना है कि जब तक खामनेई सत्ता में हैं, तब तक ईरान की एंटी-इजरायल नीति नहीं बदलेगी. इसलिए नेतन्याहू के लिए यह केवल सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि नेतृत्व को निष्क्रिय करने की रणनीति का सवाल भी बन जाता है.

10. डोनाल्ड ट्रंप का रुख क्या रहा है खामनेई को लेकर?

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने ईरान के खिलाफ “मैक्सिमम प्रेशर” की नीति अपनाई थी. ट्रंप प्रशासन ने कई बार संकेत दिए कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व पर सीधा दबाव बनाया जा सकता है. हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर खामनेई को निशाना बनाने का फैसला नहीं लिया, लेकिन उनकी रणनीति में यह विकल्प पूरी तरह खारिज भी नहीं था. ट्रंप के करीबी सर्कल में खामनेई को “रीजनल अस्थिरता की जड़” माना जाता रहा है.

11. क्या खामनेई की हत्या वास्तव में एक ‘अंतिम विकल्प’ हो सकती है?

खामनेई जैसे सर्वोच्च नेता को निशाना बनाना किसी भी देश के लिए बेहद बड़ा और जोखिम भरा फैसला होगा. यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि पूरे ईरानी सिस्टम पर सीधा वार माना जाएगा. विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा कदम तभी उठाया जा सकता है जब सभी कूटनीतिक और सैन्य विकल्प खत्म हो जाएं. यही वजह है कि इसे “लास्ट रिजॉर्ट” यानी अंतिम विकल्प माना जाता है.

दरअसल, अयातुल्ला अली खामनेई ने ईरान को एक ऐसी रणनीतिक दिशा दी है, जिसने इजरायल के लिए लगातार बहुस्तरीय खतरा खड़ा किया. चाहे वह प्रॉक्सी नेटवर्क हो, मिसाइल प्रोग्राम या परमाणु महत्वाकांक्षा. यही कारण है कि वे केवल एक देश के नेता नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरण को प्रभावित करने वाले “गेम चेंजर” बन चुके हैं.

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