Bangladesh Election Result : तारीक रहमान के राज में कितने सेफ रहेंगे हिंदू? 1971 से अब तक घटी आबादी, अब बड़ी चुनौती

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की आबादी 1971 के बाद लगातार घटती गई है. अब चुनाव बाद तारीक रहमान सरकार के सामने कानून-व्यवस्था और अल्पसंख्यक सुरक्षा सबसे बड़ी कसौटी होगी.;

बांग्लादेश की कुल आबादी में हिंदू करीब सात से आठ प्रशित हैं. कई रिपोर्टों में हिंदुओं के खिलाफ चुनावी हिंसा, जमीन विवाद और सांप्रदायिक हमलों की घटनाएं सामने आती रही हैं. हालांकि, बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस की नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार आधिकारिक रूप से खुद को धर्मनिरपेक्ष बताती रही है. यानी समस्या पूरी तरह राजनीतिक सत्ता पर निर्भर नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन, कट्टरपंथी समूहों और कानून व्यवस्था से भी जुड़ी है.

तारीक रहमान की BNP का क्या रहेगा रुख?

बांग्लादेश में चुनाव संपन्न हो चुके हैं. बीएनपी नेता तारीक रहमान के नेतृत्व में सरकार गठन लगभग तय है. तारीक रहमान बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की पहचान आधारित राजनीति की ओर माना जाता है. इतिहास गवाह है BNP ने Jamaat-e-Islami Bangladesh के साथ गठबंधन किया था. यही वजह है कि अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ वर्गों में आशंका बनी रहती है.


बावजूद इसके? इस बार चुनाव प्रचार के दौरान तरीक रहमान ने आपसी सम्मान और संतुलित विदेश नीति की बात की है. उन्होंने भारत के साथ रिश्ते सुधारने की इच्छा जताई है. भारत के साथ बेहतर संबंधों का मतलब अप्रत्यक्ष रूप से वहां के हिंदुओं की सुरक्षा पर भी सकारात्मक दबाव हो सकता है.

क्या अतीत कोई संकेत देता है?

साल 2001 से 2006 के दौरान बांग्लादेश में BNP शासनकाल में कुछ मानवाधिकार संगठनों ने अल्पसंख्यकों पर हमलों की रिपोर्ट दर्ज की थी. हालांकि, BNP का आधिकारिक रुख हमेशा यह रहा कि वे सभी नागरिकों की सुरक्षा के पक्षधर हैं.सवाल यह है कि क्या नया नेतृत्व पुराने समीकरण दोहराएगा या नई रणनीति अपनाएगा?

भारत-बांग्लादेश संबंध क्यों अहम होंगे?

भारत की सरकार बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की स्थिति पर लगातार नजर रखती रही है. अगर नई सरकार भारत से रिश्ते सुधारना चाहती है, तो अल्पसंख्यक सुरक्षा उसके लिए कूटनीतिक प्राथमिकता बन सकती है. ऐसे में बीएनपी के लिए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक हिंदुओं के बीच में संतुलन बहुत अहम होगा. कट्टरपंथी दबाव बनाम अंतरराष्ट्रीय छवि का ध्यान रखना होगा.


असली परीक्षा क्या होगी?

बांग्लादेश में नई सरकार कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण बनाए रखना होगा. चुनाव के बाद हिंसा को हर हाल में रोकना होगा. प्रशासनिक जवाबदेही तय करनी होगी. अगर अब भी सांप्रदायिक हमले हिंदुओं के खिलाफ हुई तो सख्त कार्रवाई का उदाहरण पेश करना होगा. अगर, ये चीजें मजबूत रहीं, तो हिंदू समुदाय अपेक्षाकृत सुरक्षित रहेगा. चाहे सत्ता में कोई भी हो.

डर और उम्मीद  दोनों 

तारीक रहमान के राज में हिंदू कितने सुरक्षित रहेंगे, यह सिर्फ उनके बयान से तय नहीं होगा, बल्कि उनके पहले 100 दिनों की कार्रवाई से तय होगा. राजनीति में बयान आसान होते हैं, सुरक्षा की गारंटी प्रशासनिक अधिकारी देते हैं.

Bangladesh में 1971 में हिंदुओं की आबादी कितनी थी?

1971 में जब बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) स्वतंत्र हुआ, उस समय हिंदुओं की आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 13.5% से 14% के बीच मानी जाती है. 1961 की जनगणना (पूर्वी पाकिस्तान) में हिंदू आबादी लगभग 18.5% थी. 1971 के मुक्ति संग्राम और उससे पहले के वर्षों में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ. स्वतंत्रता के समय (1971) अनुमानित हिंदू आबादी घटकर करीब १३-14% रह गई.

1971 में बांग्लादेश की कुल आबादी लगभग 7.5 करोड़ के आसपास थी. उस हिसाब से हिंदू आबादी लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) के आसपास आंकी जाती है. 1991 में यह प्रतिशत घटकर लगभग 10% हुआ. 2011 की जनगणना के अनुसार हिंदू आबादी करीब 8.5% रही. हालिया अनुमान (2022 के आसपास) में यह करीब 7–8% के बीच मानी जाती है.

भू-राजनीति ने बदली रहमान की रणनीति, अब हिंदू हितों की करेंगे रक्षा - अलूने

आने वाले समय में बांग्लादेश में हिंदू कितनी सुरक्षित के सवाल पर विदेश मामलों के जानकार ब्रह्मदीप अलूने कहा, "बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी का इतिहास जटिल रहा है. अवाली लीग धर्मनिरपेक्षता की बात करती थी, बीएनपी इस्लामिक राष्ट्रवाद की बात करती है. इस बीच माहौल बदला है. अब बांग्लादेश की सियासी परिस्थितियां भी बदली हैं. चुनाव प्रचार के दौरान तारीक रहमान ने अपने बयान और बीएनपी के घोषणा पत्र में कहा गया है कि पार्टी सत्ता में आने पर बांग्लदेश में रहने वाले हिंदुओं सहित सभी अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करेगी. इससे हिंदुओं व वहां के लोगों यह संदेश गया कि बीएनपी पूरे राष्ट्र में रहने वाले लोगों को प्रतिनिधित्व करेगी."

उन्होंने आगे कहा, "इसका लाभ बीएनपी को चुनाव में मिला है. आवामी लीग का वोटर ने इस बार बीएनपी को वोट किया. अब लंबी पारी तक बीएनपी को सत्ता में बने रहना है तो उन्हें लीग के समर्थकों को अपना वोटर बनाए रखना होगा. हिंदुओं की रक्षा करना पड़ेगी. यह उनकी सियासी मजबूरी भी है. ये बात अलग है कि वो पाकिस्तान समर्थक पार्टी है, लेकिन वैश्विक भू राजनीतिक माहौल को देखते हुए उन्हें ऐसा करना होगा. ऐसा इसलिए कि बीएनपी की नी​तियों में बदलाव किए बगैर वो सर्वाइव नहीं कर सकते. फिर, 17 साल तक लंदन में लगातार रहने के बाद उनकी सियासी सोच भी बदली है."

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