अंटार्कटिका में ‘खून’ की नदी? जानिए Blood Falls का वैज्ञानिक रहस्य जिसने दुनिया को चौंकाया- देखिए VIDEO

अंटार्कटिका का ब्लड फॉल्स देखने में खून जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे लाखों साल पुरानी आयरन-युक्त झील का वैज्ञानिक सच छिपा है. यह खोज अंतरिक्ष में जीवन की संभावनाओं को भी नई दिशा देती है.;

( Image Source:  @yogesa- X )
Edited By :  सागर द्विवेदी
Updated On : 10 Feb 2026 12:11 AM IST

Red Water Falls: अंटार्कटिका की बर्फीली दुनिया में एक ऐसा रहस्य छिपा है, जिसे पहली नजर में देखकर किसी को भी लगे कि मानो ग्लेशियर से खून बह रहा हो. चमकती सफेद बर्फ के बीच गहरे लाल रंग का झरना. यह नजारा जितना रोमांचक है, उतना ही रहस्यमय भी. इसी अनोखी प्राकृतिक घटना को दुनिया 'ब्लड वाटर फॉल्स Blood Falls) के नाम से जानती है.

लेकिन क्या सचमुच अंटार्कटिका की बर्फ 'खून' बहाती है? या इसके पीछे विज्ञान की कोई और कहानी छिपी है? वर्षों की रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने इस लाल झरने का ऐसा सच उजागर किया, जिसने न केवल पृथ्वी बल्कि अंतरिक्ष में जीवन की संभावनाओं को लेकर भी नई बहस छेड़ दी.

क्या सच में अंटार्कटिका की बर्फ से खून बहता है?

जो लाल रंग दूर से खून जैसा दिखता है, वह असल में आयरन (लौह तत्व) से भरपूर प्राचीन, अत्यधिक खारे पानी की देन है. यह पानी टेलर ग्लेशियर (Taylor Glacier) के नीचे लगभग 20 लाख वर्षों से बंद एक सबग्लेशियल झील में कैद था. जब यह नमकीन पानी बर्फ की दरारों से बाहर निकलकर ऑक्सीजन के संपर्क में आता है, तो उसमें मौजूद आयरन ऑक्सीडाइज़ हो जाता है. ठीक उसी तरह जैसे लोहे पर जंग लगती है. यही रासायनिक प्रतिक्रिया पानी को गहरा लाल रंग दे देती है. यानि, ग्लेशियर से 'खून' नहीं, बल्कि 'जंग लगा पानी' बहता है.

इतनी ठंड में पानी जमता क्यों नहीं?

अंटार्कटिका में तापमान अधिकांश समय शून्य से काफी नीचे रहता है. ऐसे में तरल पानी का मौजूद होना हैरान करता है. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस पानी में नमक की मात्रा समुद्री पानी से भी कई गुना ज्यादा है. नमक पानी का हिमांक (freezing point) कम कर देता है. यही कारण है कि यह अत्यधिक ठंड में भी तरल बना रहता है. यह वही सिद्धांत है, जिसके तहत सर्दियों में बर्फीली सड़कों पर नमक डाला जाता है ताकि बर्फ जल्दी न जमे.

क्या इस लाल पानी में जीवन मौजूद है?

सबसे चौंकाने वाली खोज यही है. रिसर्च में पाया गया कि इस प्राचीन झील के भीतर सूक्ष्मजीव (microbes) आज भी जीवित हैं . वह भी बिना धूप और ऑक्सीजन के. ये जीव सूर्य की रोशनी पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि आयरन और सल्फेट जैसी रासायनिक प्रक्रियाओं से ऊर्जा प्राप्त करते हैं. इस प्रक्रिया को केमोसिंथेसिस (Chemosynthesis) कहा जाता है. यह खोज बताती है कि जीवन के लिए हमेशा धूप, गर्मी या ताजी हवा जरूरी नहीं सही रासायनिक वातावरण ही काफी है.

ब्लड फॉल्स अंतरिक्ष विज्ञान के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

ब्लड फॉल्स केवल एक प्राकृतिक अजूबा नहीं है, बल्कि यह अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भी बेहद अहम साबित हो रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा (Europa) और शनि के चंद्रमा एन्सेलाडस (Enceladus) की बर्फीली सतहों के नीचे भी इसी तरह के खारे और आयरन-युक्त जल स्रोत हो सकते हैं. अगर अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे लाखों वर्षों तक जीवन पनप सकता है, तो अंतरिक्ष में जीवन की संभावना को नकारा नहीं जा सकता. इस तरह, ब्लड फॉल्स पृथ्वी पर बैठकर अंतरिक्ष की संभावनाओं को समझने की प्रयोगशाला बन गया है.


शुरुआत में वैज्ञानिक क्यों हुए थे भ्रमित?

1900 के दशक की शुरुआत में जब खोजकर्ताओं ने पहली बार इस लाल झरने को देखा, तो उन्होंने अनुमान लगाया कि इसका रंग शैवाल (algae) के कारण है. हालांकि, आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक उपकरणों ने यह साबित किया कि असली वजह आयरन-युक्त पानी और ऑक्सीकरण की प्रक्रिया है.

ब्लड फॉल्स हमें क्या सिखाता है?

यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के सबसे रहस्यमय दृश्य भी विज्ञान की शांत और धीमी प्रक्रियाओं का परिणाम हो सकते हैं. जो नजारा पहली नजर में डरावना लगता है, वह दरअसल लाखों वर्षों से चल रही रासायनिक क्रियाओं और सूक्ष्म जीवन की कहानी है. अंटार्कटिका का यह लाल झरना हमें सिखाता है कि असाधारण खोजें शोर नहीं करतीं. वे बर्फ के भीतर चुपचाप अपना इतिहास लिखती रहती हैं, और फिर एक दिन जंग-लाल बूंदों के रूप में दुनिया के सामने आ जाती हैं.

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