19 साल बाद लौटा पाकिस्तान में बसंत: लाहौर के आसमान में फिर उड़ी पतंगें, सेलिब्रिटीज ने भी खूब मनाया जश्न

19 साल के प्रतिबंध के बाद 2026 में लाहौर ने बसंत फेस्टिवल को फिर से अपनाया है।. सुरक्षा नियमों, आर्थिक लाभ और सेलिब्रिटी मौजूदगी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया.;

( Image Source:  X: @_rawnreal )
Edited By :  रूपाली राय
Updated On : 8 Feb 2026 8:10 PM IST

लाहौर, पाकिस्तान का एक ऐतिहासिक शहर, जो अपनी जीवंत संस्कृति और उत्सवों के लिए दुनिया भर में मशहूर है. इस साल 2026 में, शहर ने एक लंबे समय के बाद बसंत फेस्टिवल को फिर से जीवंत किया है. बसंत, जो वसंत ऋतु का स्वागत करने वाला त्योहार है, लाहौर के आसमान को हजारों रंग-बिरंगी पतंगों से भर देता है. यह त्यौहार न सिर्फ खुशी और उल्लास का प्रतीक है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है. लेकिन इस बार का बसंत खास है क्योंकि यह 19 साल के प्रतिबंध के बाद वापस आया है. हम बात करेंगे बसंत की जड़ों से, प्रतिबंध के कारणों से, इसके दोबारा शुरू होने से, आर्थिक फायदों से, सांस्कृतिक मतभेदों से और उन सेलिब्रिटीज से जो इस उत्सव में शामिल होकर इसे और शानदार बना रहे हैं.

बसंत एक प्राचीन त्योहार है जिसकी शुरुआत हिंदू धर्म की वसंत ऋतु से जुड़ी रस्मों से हुई थी. वसंत का मतलब है 'बसंत', जो सर्दी के बाद आने वाली गर्मी और फूलों की बहार का स्वागत करता है. लेकिन 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद, यह त्योहार एक धर्मनिरपेक्ष पंजाबी परंपरा बन गया. मतलब, यह अब किसी एक धर्म से जुड़ा नहीं रहा, बल्कि पूरे पंजाब क्षेत्र के लोग इसे मनाते हैं, चाहे वे किसी भी मजहब के हों.  लाहौर में बसंत का मतलब है छतों पर इकट्ठा होना, पतंग उड़ाना, पंजाबी लोक गीत सुनना, नाचना-गाना और स्वादिष्ट पकवानों का मजा लेना. लोग पीले रंग के कपड़े पहनते हैं, जो बसंत का प्रतीक है, और रात भर छतों पर रोशनी से सजावट करते हैं. आसमान में उड़ती पतंगें देखकर ऐसा लगता है जैसे रंगों की बारिश हो रही हो.

लाहौर में बसंत का रंग

लेकिन इतना सुंदर त्योहार क्यों बंद हो गया था? वजह थी सुरक्षा. बसंत में पतंग उड़ाने के लिए 'मांझा' नाम की डोर इस्तेमाल होती है, जो कांच से लेपित होती है. यह डोर बहुत तेज होती है और पतंगबाजी के दौरान दूसरी पतंगों की डोर काटने के काम आती है. लेकिन इसी तेजी की वजह से हर साल सैकड़ों लोग घायल हो जाते थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक, सालाना 500 से ज्यादा लोग चोटिल होते थे, और कई मौतें भी हो जाती थीं. बच्चे, बाइक सवार और पक्षी भी इसकी चपेट में आते थे. इसलिए, 2007 में पाकिस्तान सरकार ने बसंत पर प्रतिबंध लगा दिया. यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुआ था, ताकि लोगों की जान बचाई जा सके. प्रतिबंध के दौरान, लोग चुपके-चुपके बसंत मनाते थे, जैसे रावलपिंडी में गुप्त आयोजन होते थे, लेकिन लाहौर जैसे बड़े शहर में यह पूरी तरह बंद था. 

अब 2026 में बसंत फेस्टिवल फिर से कैसे शुरू हुआ?

यह मुख्यमंत्री मरियम नवाज शरीफ की पहल का नतीजा है. उन्होंने सुरक्षा उपायों के साथ उत्सव को फिर से शुरू करने का फैसला किया. अब मांझा की जगह सुरक्षित डोर इस्तेमाल की जा रही है, जैसे प्लास्टिक या नायलॉन की. पुलिस और प्रशासन ने छतों पर सुरक्षा रेलिंग लगाने और बच्चों को अकेले पतंग न उड़ाने के नियम बनाए हैं. उत्सव 6 से 8 फरवरी तक चला, जिसमें लाखों लोग शामिल हुए. लाहौर के पुराने इलाकों जैसे अनारकली, लिबर्टी मार्केट और वाल्ड सिटी में छतें रोशनी से जगमगा उठीं. शाम के समय पंजाबी लोक धुनें बजती रहीं, और लोग 'बो कटा' चिल्लाते हुए पतंगबाजी का मजा लेते रहे. यह न सिर्फ स्थानीय लोगों के लिए खुशी का मौका है, बल्कि पर्यटकों को भी आकर्षित कर रहा है. 

लाहौर की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा फायदा

आर्थिक रूप से देखें तो बसंत का वापस आना लाहौर की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा फायदा है. अनुमान है कि इससे 4 से 6 अरब पाकिस्तानी रुपये का लाभ होगा. कैसे? पतंगें, डोर, रंग, कपड़े, खाने-पीने की दुकानें और होटल सब कुछ बूम पर हैं. पर्यटक देश-विदेश से आ रहे हैं, जो होटलों और रेस्टोरेंट्स को भर रहे हैं. छोटे व्यापारी, जैसे पतंग बनाने वाले कारीगर, महीनों से तैयारी कर रहे थे. यह उत्सव न सिर्फ पैसा लाता है, बल्कि रोजगार भी बढ़ाता है. जैसे- पतंग उद्योग में हजारों लोग काम करते हैं, और प्रतिबंध के दौरान उनका काम ठप हो गया था। अब फिर से बाजार गुलजार हैं. 

क्यों हो रहा है विरोध? 

लेकिन हर चीज की तरह, बसंत पर भी मतभेद हैं. कुछ लोग इसे गैर-इस्लामिक बताकर विरोध करते हैं. उनका कहना है कि यह हिंदू रस्म से आया है, और इसमें जुआ, संगीत और बेकार की फिजूलखर्ची होती है. सोशल मीडिया पर कई पोस्ट्स में लोग इसे पाप कहते हैं और बंद करने की मांग करते हैं. वहीं, दूसरी तरफ लोग इसे सांस्कृतिक विरासत मानते हैं. वे कहते हैं कि बसंत पंजाब की साझा परंपरा है, जो हिंदू, मुस्लिम, सिख सबको जोड़ती है. विभाजन के बाद भी यह दक्षिण एशिया की साझी संस्कृति का हिस्सा है. लाहौर जैसे शहर में, जहां धार्मिक तनाव रहते हैं, बसंत जैसे उत्सव लोगों को एकजुट करते हैं. रावलपिंडी में चुपके आयोजन इसका सबूत हैं कि लोग इसे भूल नहीं पाए. 

सेलेब्रिटीज-क्रिकेटर्स से लेकर सिंगर्स तक मना रहे है 

अब बात करते हैं सेलिब्रिटीज की, जो इस बसंत को और चमकदार बना रहे हैं. 2026 का बसंत स्टार्स से भरा हुआ है. पाकिस्तानी शोबिज इंडस्ट्री के कई बड़े नाम लाहौर पहुंचे हैं और पतंग उड़ा रहे हैं. सजल अली, जो कराची से हैं, अपनी बहन सबूर अली के साथ उत्सव मना रही हैं. वे छत पर दोस्तों के साथ नाच-गाना कर रही हैं.

यासिर हुसैन, मिकाल जुल्फिकार, मोहिब मिर्जा, इमरान अशरफ और उसामा खान जैसे एक्टर्स पतंगबाजी में माहिर दिख रहे हैं. वे रंगीन कपड़ों में छतों पर काइट उड़ा रहे हैं और सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर रहे हैं. एक्ट्रेसेस में सबा कमर, आयेजा खान, हानिया आमिर, जगन काजिम, फरयाल खान, गोहर और अमना शामिल हैं. आयेजा खान ने पीले रंग की ड्रेस में फोटोज पोस्ट कीं, जो बसंत की थीम से मैच करती हैं.

क्रिकेटर्स भी पीछे नहीं हैं. हरिस रऊफ और हसन अली परिवार के साथ पतंग उड़ा रहे हैं. हसन अली तो दोस्तों के साथ 'बो कटा' चिल्लाते हुए वीडियो में दिखे. सिंगर्स और म्यूजिशियंस में अबरार-उल-हक, जवाद अहमद, जीशान रोकरी, बिलाल मार्थ, मीराब जीशान और उकाशा गुल जैसे नाम हैं. अबरार-उल-हक तो पॉलिटिशियन भी हैं, लेकिन वे काइट उड़ाते हुए लोक गीत गा रहे हैं.

पुराने सिंगर्स जैसे मलका फुकराज और ताहिरा सईद के गाने भी बज रहे हैं. डिजिटल स्टार्स जैसे राजब बट, मिस्टर पटलू और तरन जीत सिंह भी शामिल हैं। तरन जीत सिंह दुबई से आए हैं और होटल में डांस करते हुए काइट उड़ा रहे हैं। पॉलिटिशियंस में नवाज शरीफ और मरियम औरंगजेब का नाम भी आ रहा है, जो उत्सव में हिस्सा ले रहे हैं. ये सेलिब्रिटीज न सिर्फ उत्सव का मजा ले रहे हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर शेयर करके इसे प्रमोट भी कर रहे हैं. उनके वीडियो और फोटोज से दुनिया भर में लाहौर का बसंत ट्रेंड कर रहा है. 

Similar News