बांग्लादेश चुनाव: 12 फरवरी को वोटिंग के बीच दिल्ली की धड़कन तेज क्यों, भारत को उम्मीद में क्या?

ढाका में वोटिंग से दिल्ली की चिंता बढ़ी. बांग्लादेश चुनाव के नतीजे भारत के लिए सीमा सुरक्षा, चीन के बढ़ते प्रभाव और व्यापारिक हितों पर कितना असर डालेंगे?;

( Image Source:  @DrSJaishankar )
By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 11 Feb 2026 6:59 PM IST

बाग्लादेश में नई सरकार के गठन के लिए 12 फरवरी को वोट डाले जाएंगे, लेकिन उसकी गूंज नई दिल्ली तक सुनाई दे रही है. ऐसा होना भी स्वभाविक हे. शेख हसीना सरकार का निर्वासन के बाद से बांग्लादेश का भारत के साथ संबंध तनावपूर्ण चल रहा है. ऐसे में वहां पर आम चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का अहम पड़ाव भी माने जा रहे हैं. यही वजह है कि भारत के लिए यह चुनाव सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ, व्यापारिक हितों और चीन के बढ़ते प्रभाव जैसे कई संवेदनशील मुद्दों से सीधे जुड़ा हुआ है. ऐसे में सवाल उठता है कि ढाका के नतीजों में भारत का क्या दांव लगा है?

भारत-बांग्लादेश रिश्तों का इतिहास

भारत और बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक रूप से गहरे रहे हैं. 1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर आज तक दोनों देशों के रिश्ते कई उतार-चढ़ाव से गुजरे हैं. हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सहयोग और सुरक्षा समन्वय में तेजी बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन शेख हसीना का सत्ता से निर्वासन और मोहम्मद यूनुस का सरकार का मुखिया बनने के बाद रिश्तों में खिंचाव आ गया है. या यूं कहें कि तनाव चरम पर पहुंच गया है. इसमें सुधार तभी संभव है जब ढाका में स्थिर सरकार बने. यह चुनाव परिणाम पर निर्भर करता है.

सीमा सुरक्षा और अवैध गतिविधियों का मुद्दा

भारत-बांग्लादेश सीमा करीब 4,000 किलोमीटर लंबी है, जो भारत की सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में से एक है. भारत के लिए अवैध घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार आपराधिक गतिविधियां, लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं. ऐसे में ढाका में किस तरह की सरकार बनती है, यह सीधे तौर पर चुनाव दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और सीमा प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है.

व्यापार और कनेक्टिविटी सबसे बड़ा दांव

बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है. पिछले दो साल को छोडऋ दें तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ रहा था. रेल, सड़क और जलमार्ग कनेक्टिविटी परियोजनाओं ने पूर्वोत्तर भारत को नई संभावनाएं दी हैं. अगर नई सरकार की प्राथमिकताएं बदलती हैं, तो इन परियोजनाओं की रफ्तार पर असर पड़ सकता है.

चीन फैक्टर: भारत के लिए रणनीतिक चुनौती

दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है. यूनुस के कार्यकाल में बांग्लादेश में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और निवेश के जरिए बीजिंग ने अपनी मौजूदगी मजबूत की है. भारत के लिए यह सिर्फ आर्थिक प्रतिस्पर्धा का मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन का सवाल भी है. अगर नई सरकार चीन के और करीब जाती है, तो भारत के लिए क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं.

चुनाव परिणाम से क्या बदलने की उम्मीद है?

बांग्लादेश के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति का असर सीधे भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पड़ सकता है. क्या सुरक्षा सहयोग पहले जैसा रहेगा?क्या चीन के साथ बांग्लादेश के संबंध मजबूत होंगे. क्या भारत की पूर्वोत्तर नीति प्रभावित होगी? इन सवालों के जवाब काफी हद तक चुनाव परिणाम तय करेंगे.

क्या है सियासी समीकरण?

बांग्लादेश में पूरा चुनाव प्रचार दो सियासी दलों पर केंद्रित रहा है. पहला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और दूसरा जमाते इस्लामी. बीएनपी के नेता तारिक रहमान है. वह पूर्व पीएम खालिदा जिया के बेटे हैं. अवामी लीग के चुनाव में न होने से बीएनपी विकल्प के रूप में उभरी है. दूसरी तरफ चुनावी सर्वेक्षणों में जमात को पहले से बेहतर स्थिति में बताया गया है. ऐसे में गुरुवार को मतदान के बाद ऐसे नतीजे आ सकते हैं, जिनसे भारत को पिछले करीब बीस सालों में जूझना नहीं पड़ा है.

भारत बांग्लादेश में अवामी लीग की सरकारों के साथ काम करने का आदी हो चुका था, लेकिन अब उसे बिल्कुल नई राजनीतिक हकीकत का सामना करना होगा. इन बातों को देखते हुए भारत बारीकी से वहां के चुनाव को देख रहा है कि क्या तारिक रहमान की अगुवाई वाली बीएनपी अपने दम पर सरकार बना पाएगी या उसे जमात-ए-इस्लामी को गठबंधन में शामिल करना पड़ेगा.

क्या परिणाम से तय होगा भारत रुख?

अभी तक भारत आधिकारिक तौर पर बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल से बचता रहा है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर नई सरकार के साथ संवाद बनाए रखना उसकी प्राथमिकता होगी. मोदी सरकार की कोशिश होगी कि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे और दक्षिण एशिया में संतुलन कायम रहे. ढाका में वोटिंग सिर्फ एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत के लिए रणनीतिक परीक्षा भी है.

फिलहाल, बांग्लादेश चुनाव को लेकर दिल्ली की धड़कन इसलिए तेज है क्योंकि बांग्लादेश में जो भी फैसला होगा, उसका असर सीमा, सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा. यही वजह है कि भारत की पैनी नजर वहां के चुनाव पर है.

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