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Bangladesh में सत्ता की जंग; भारत के लिए कौन बेहतर- बीएनपी या जमात-ए-इस्लामी?

बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव होने वाले हैं और सत्ता में कौन आएगा, इसका सीधा असर भारत पर पड़ने वाला है. गद्दी के लिए बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी में तकरार देखने को मिलेगी.

Bangladesh में सत्ता की जंग; भारत के लिए कौन बेहतर- बीएनपी या जमात-ए-इस्लामी?
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( Image Source:  AI GENERATED IMAGE-SORA )
समी सिद्दीकी
Edited By: समी सिद्दीकी

Published on: 11 Feb 2026 1:43 PM

Bangladesh Election: 12 फरवरी को होने वाले बांग्लादेश के आम चुनाव पर भारत की करीबी नजर रहने वाली है. पड़ोसी देश इस समय आर्थिक और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता से विदाई के बाद यह सवाल उठ रहा है कि नई सरकार की विदेश नीति भारत के प्रति कैसी रहेगी और किस पार्टी की सरकार बनना भारत के लिए लाभकारी हो सकता है.

चुनाव से पहले आए कुछ सर्वे और ओपिनियन पोल में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को जमात-ए-इस्लामी पर बढ़त मिलती दिख रही है. यही दो प्रमुख दल इस चुनाव में आमने-सामने हैं. दोनों ने अलग-अलग गठबंधन बनाए हैं. 2024 में शेख हसीना के खिलाफ छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाली नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) ने जमात-ए-इस्लामी के साथ हाथ मिलाया है.

भारत के लिए क्यों अहम हैं बांग्लादेश के चुनाव

भारत और बांग्लादेश अहम व्यापारिक साझेदार हैं. दोनों देशों के बीच 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा और 54 नदियां साझा हैं. ऐसे में चुनाव नतीजो का असर द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ सकता है.

बीएनपी का भारत को लेकर क्या रुख?

बीएनपी की अगुवाई पहले पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया ने की थी. सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज का कहना है कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते पहले काफी तनावपूर्ण रहे हैं. खालिदा जिया तीन बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं- 1991 से 1996 तक, 1996 में कुछ समय के लिए, और फिर 2001 से 2006 तक.

आईएसएएस के मुताबिक, जिया ने हसीना की तुलना में भारत को अधिक संदेह की नजर से देखा. रिपोर्ट में कहा गया कि बीएनपी की बयानबाजी में अक्सर भारत की पहलों को 'एकतरफा और प्रभुत्ववादी' बताया गया. ट्रांजिट व्यवस्था का विरोध और जल व व्यापार विवादों को प्रमुखता से उठाया गया.

भारत के लिए घातक है यह पार्टी?

ऐसा माना जाता है कि जिया के शासनकाल में ढाका ने यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) और एनएससीएन (आईएम) जैसे उग्रवादी संगठनों को पनाह, प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक समर्थन दिया था. इन संगठनों ने बांग्लादेशी जमीन का इस्तेमाल भारत में हमलों के लिए किया. एक रिपोर्ट के मुताबिक, खालिदा जिया ने पूर्वोत्तर के अलगाववादी समूहों को 'फ्रीडम फाइटर्स' भी कहा था.

बीएनपी की विदेश नीति क्या है?

ताजा सर्वे संकेत दे रहे हैं कि बीएनपी फिर से सत्ता में लौट सकती है. खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान, जो स्वयं-निर्वासन से लौटे हैं, प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हो चुके हैं. चुनाव से पहले बीएनपी ने अपना ‘विजन 2030’ दस्तावेज जारी किया है. इसमें कहा गया है कि पार्टी बांग्लादेश की स्वतंत्रता, संप्रभुता और गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी. दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि बीएनपी किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी और न ही किसी देश की सुरक्षा के लिए खतरा बनेगी.

हालांकि, पार्टी ने चेतावनी दी है कि यदि कोई देश बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल देगा या उसकी सुरक्षा को खतरा पहुंचाएगा, तो उसका 'कड़ा प्रतिरोध' किया जाएगा. दस्तावेज में कहा गया है कि सीमा के उस पार 'बांग्लादेश के दोस्त हैं, कोई मालिक नहीं. विदेश संबंधों में राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेगा और मुस्लिम उम्मा और पड़ोसी देशों के साथ खास रिश्ते बनाए जाएंगे.

खालिद ज़िया के इंतेकाल में शामिल हुए थे एस जयशंकर

गौरतलब है कि इस वर्ष खालिदा जिया के निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक पत्र भेजा था. विदेश मंत्री एस जयशंकर उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए और तारिक रहमान से मुलाकात की थी.

जमात-ए-इस्लामी का भारत को लेकर रुख क्या है?

जमात-ए-इस्लामी, जिसे एक इस्लामवादी दल माना जाता है, का भारत के साथ अतीत में तीखा मतभेद रहा है. चुनाव से पहले 8 फरवरी को जमात के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान ने ढाका ट्रिब्यून के हवाले से कहा था कि 12 फरवरी को लोग प्रभुत्व के गुलामों को रेड कार्ड दिखाएंगे. कई जानकारों ने इसे भारत के लिए इंडायरेक्ट मैसेज माना था.

जमात-ए-इस्लामी की क्या था सेवन सिस्टर्स वाली धमकी?

जमात की सहयोगी नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) ने भी 2024 के आंदोलन के दौरान भारत-विरोधी रुख दिखाया था. इसके नेता हसनत अब्दुल्ला ने कथित तौर पर कहा था कि अगर बांग्लादेश को अस्थिर किया गया, तो प्रतिरोध की आग सीमाओं के पार तक जाएगी. उन्होंने यह भी कहा था कि अगर भारत अस्थिर करने वालों को पनाह देता है, तो वे 'सेवन सिस्टर्स' के अलगाववादियों को शरण देंगे.

जमात-ए-इस्लामी की क्या है विदेश नीति

9 फरवरी को डॉ. शफीकुर रहमान ने कहा था कि जमात-ए-इस्लमी सभी देशों के साथ समान और सम्मानजनक संबंध बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है. ढाका ट्रिब्यून के मुताबिक, उन्होंने राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और विकास को प्राथमिकता देने और जलवायु परिवर्तन जैसे ग्लोबल मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी की बात दोहराई थी.

जानकारों का मानना है कि सत्ता में आने के बाद ढाका बीजिंग और नई दिल्ली के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेगा और संभव है कि इस्लामाबाद से भी संपर्क बढ़ाए. उनका कहना है कि प्रभाव की इस दौड़ में भारत और चीन एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करेंगे और बांग्लादेश इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने की कोशिश करेगा. ज्ञात हो कि 12 फरवरी का यह चुनाव अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद पहली बार हो रहा है, जिसने शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था.

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