यूपी में बाटी-चोखा Politics! डिनर के सहारे अखिलेश यादव ने साधे एक तीर से 2 निशाने, बीजेपी के लिए था गजब का मैसेज

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘बाटी-चोखा’ अब सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि सियासी संदेश बन गया है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने नए साल पर बाटी-चोखा भोज के जरिए BJP की कथित जातिगत राजनीति पर हमला बोला और सामाजिक समरसता का नैरेटिव खड़ा किया. यह आयोजन BJP के ब्राह्मण विधायकों की बैठक और डिनर विवाद के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है. अखिलेश ने इसी मंच से वोट चोरी, महंगाई, बेरोजगारी और ‘मिशन 2027’ का ऐलान कर साफ कर दिया कि सपा अब चुनावी मोड में आ चुकी है.;

( Image Source:  X/yadavakhilesh )
Edited By :  नवनीत कुमार
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर नारों, रैलियों और जातीय समीकरणों की बात होती है. लेकिन ये नया साल कुछ अलग लेकर आया. इस बार नए साल पर अखिलेश यादव ने सियासत को थाली तक उतार दिया. सपा अध्यक्ष ने ‘बाटी-चोखा’ भोज का आयोजन किया. ये कोई सामान्य आयोजन नहीं था, बल्कि यह एक सोचा-समझा राजनीतिक संदेश था जिसमें परंपरा, पहचान और सत्ता के विरोध को एक साथ पिरोया गया. ये भोज बीजेपी पर निशाना साधने के लिए भी था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी ने ब्राह्मण विधायकों की बैठक और भोज के बाद उन्हें हिदायत दी थी. इसी चेतावनी के एक हफ्ते बाद समाजवादी पार्टी ने सार्वजनिक रूप से पूर्वी UP और बिहार की मशहूर डिश ‘बाटी-चोखा’ सहभोज आयोजित कर दिया. जो सीधे तौर पर बीजेपी की आंतरिक राजनीति और जाति-संवेदनशीलता पर कटाक्ष था. उन्होंने यह तक कह दिया कि आपसी झगड़ों में बाटी-चोखा को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए, सभी को बिना किसी रोक-टोक के एक साथ बैठकर खाना चाहिए. क्या ये ब्राह्मण यानी पंडित वोटरों को एकजुट करने की रणनीति तो नहीं?

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एक तीर, दो निशाने

अखिलेश यादव ने इस आयोजन के जरिए एक साथ दो राजनीतिक लक्ष्य साधे. पहला, बीजेपी पर यह आरोप कि वह खान-पान और संस्कृति तक को जाति के चश्मे से देखती है. और दूसरा, खुद को समावेशी, सामाजिक समानता वाली राजनीति के प्रतीक के रूप में पेश करना. ‘सब साथ बैठकर बिना रोक-टोक खाना’ का संदेश, सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल की कथित “कास्ट पॉलिटिक्स” पर प्रहार था.

लिट्टी VS बाटी: भाषा से पहचान तक

अखिलेश यादव का यह कहना कि ‘लिट्टी-चोखा और बाटी-चोखा मूल रूप से एक ही हैं’. सिर्फ भोजन पर टिप्पणी नहीं थी. यह उस राजनीति पर व्यंग्य था, जो क्षेत्रीय शब्दों और सांस्कृतिक प्रतीकों के जरिए पहचान तय करती है. उन्होंने इशारों में कहा कि बीजेपी को डर इस बात का है कि कहीं उसके विधायक ‘खाने के बहाने’ सरकार के खिलाफ एकजुट न हो जाएं.

SIR और वोट चोरी का नैरेटिव

भोज के मंच से ही अखिलेश यादव ने SIR के बहाने वोट चोरी का मुद्दा उठाया. यह दिखाता है कि ‘बाटी-चोखा पॉलिटिक्स’ सिर्फ सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि 2027 की चुनावी जमीन तैयार करने का जरिया भी है. उन्होंने मुख्यमंत्री के उस बयान को दोहराया जिसमें चार करोड़ वोट कटने की बात कही गई थी और इसे प्रशासनिक बेईमानी से जोड़ा.

मिशन 2027 का सॉफ्ट लॉन्च

प्रदेशभर से जुटे सांसदों, विधायकों और कार्यकर्ताओं के बीच अखिलेश ने नए साल की शुभकामनाओं के साथ ‘मिशन 2027’ का संकेत दे दिया. यह आयोजन बताता है कि समाजवादी पार्टी अब सिर्फ सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि वैकल्पिक सत्ता मॉडल गढ़ने की कोशिश में है. जहां सांस्कृतिक जुड़ाव एक राजनीतिक हथियार बनता है.

लोहिया–अंबेडकर–नेताजी का नैरेटिव

अखिलेश यादव ने बाबा साहब अंबेडकर, डॉ. राम मनोहर लोहिया और मुलायम सिंह यादव का ज़िक्र कर यह साफ किया कि उनकी राजनीति का दावा ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक न्याय’ है. बाटी-चोखा को उन्होंने समानता और प्रेम का प्रतीक बताकर PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) वर्ग को एकजुट करने की कोशिश की.

थाली से सत्ता तक की लड़ाई

बीजेपी पर महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा को लेकर किए गए हमले इस आयोजन को पूर्ण राजनीतिक रंग देते हैं. महिलाओं को सालाना 40 हजार रुपये देने का वादा बताता है कि समाजवादी पार्टी सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ-साथ ठोस चुनावी घोषणाओं की ओर भी बढ़ रही है. कुल मिलाकर, ‘बाटी-चोखा’ सिर्फ भोजन नहीं रहा, यह यूपी की राजनीति में एक सियासी बयान बन चुका है.

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