सुप्रीम कोर्ट में खुद अपना केस लड़कर जीतने वाले 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी कौन?

सुप्रीम कोर्ट में डॉक्टर बनने के लिए खुद बहस करने वाले 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी इन दिनों काफी सुर्खियों में हैं. वह मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले हैं.;

( Image Source:  X- @eshaniverma809 )
Edited By :  समी सिद्दीकी
Updated On : 14 Feb 2026 1:00 PM IST

Who is Atharva Chaturvedi: मध्य प्रदेश के जबलपुर का अथर्व चतुर्वेदी चर्चा का विषय बना हुआ है. इसकी वजह उसका सुप्रीम कोर्ट में बहस करना है. बहस के दौरान अथर्व का वह पल काफी साहसी था जब जब सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्य कांत की बेंच उठने लगी और एक युवा ने दस मिनट की और गुज़ारिश की. यह युवा कोई वकील नहीं था. यह 19 साल का अथर्व था, जिसने कुछ महीनों पहले ही 12वीं पास की थी और वह डॉक्टर बनना चाहता था.

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 की असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए नेशनल मेडिकल कमीशन और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि NEET क्वालिफाइड उम्मीदवारों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) से संबंधित छात्रों के लिए अस्थायी MBBS एडमिशन दिया जाए. अथर्व के लिए यह केवल कानूनी जीत नहीं थी, बल्कि उनके सपनों की तरह ऑक्सीजन की तरह था.

कौन हैं अथर्व चतुर्वेदी?

अथर्व मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले हैं. उन्होंने 12वीं पास की है और वह डॉक्टर बनने का सपना देख रहे थे. उन्होंने इंजीनियरिंग और मेडिकल दोनों एंट्रेंस परीक्षाओं में सफलता हासिल की थी, लेकिन EWS कोटे के तहत निजी कॉलेजों में उन्हें प्रवेश नहीं मिल पा रहा था. वजह यह थी कि राज्य सरकार ने इसके लिए कोई नीति लागू नहीं की थी. अथर्व एक मिडिल क्लास फैमिली से आते हैं.

अथर्व ने अपने अधिकारों के लिए खुद कदम बढ़ाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सिर्फ दस मिनट की दलीलों में उन्होंने न्यायालय को यह साबित कर दिया कि उनकी मेरिट और अधिकारों को अनदेखा नहीं किया जा सकता.

उन्होंने NEET केवल एक बार नहीं, बल्कि दो बार पास किया, और 530 मार्क्स हासिल किए. फिर भी वह EWS कोटे के तहत प्राइवेट कॉलेजों में MBBS सीट नहीं पा सके, क्योंकि राज्य ने वहां रिज़र्वेशन लागू नहीं किया था.

हाई कोर्ट में जज ने क्या किया था कमेंट?

जब जबलपुर कोर्ट में उन्होंने केस पेश किया, तो जज ने कहा कि तुम्हें वकील बनना चाहिए, डॉक्टर नहीं. तुम गलत फील्ड में हो. इसे तारीफ समझा जाए या फिर मज़ाक वह समझ नहीं पाए. लेकिन, अथर्व को पता था कि उनके लिए स्टडी फील्ड कौनसा बेहतर है.

बेटे ने पिता को क्या सिखाया?

उनके पिता, मनोज चतुर्वेदी, वकील हैं, लेकिन उन्होंने कभी सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस नहीं की. कोविड लॉकडाउन के दौरान, जब अदालतें वर्चुअल हो गईं, तकनीक परिवार की शिक्षक बन गई. उनके पिता कहते हैं,"मेरा बेटा कभी कानून की पढ़ाई नहीं करता था, लेकिन उसने सब देखा. कब बोलना है, कब चुप रहना है. वास्तव में, उसने मुझे पिटीशन स्कैन और अपलोड करना भी सिखाया.

अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट में कैसे फाइल की पिटीशन?

जब दुनिया ब्रेड बनाने और ज़ूम मीटिंग में व्यस्त थी, अथर्व ऑनलाइन क्रॉस-एक्ज़ामिनेशन और कोर्टरूम की अनुशासन देख रहे थे. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) का फॉर्मेट डाउनलोड किया. पहले के फैसले पढ़े, खुद SLP ड्राफ्ट किया और 6 जनवरी को रजिस्ट्री की आपत्तियों को ठीक करने के बाद ऑनलाइन फाइल किया.

यह काम अक्सर अनुभवी वकील भी हिचकते हुए करते हैं, लेकिन अथर्व ने इसे किया ताकि दिल्ली के यात्रा और लॉजिंग के खर्च बच सकें. उनके पिता दो शिक्षकों, मित्रा मैडम और भारती मैडम, को श्रेय देते हैं, जिन्होंने उनके बेटे की भाषा और आत्मविश्वास को निखारा.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने नोट किया कि याचिकाकर्ता, आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि का युवा, NEET दो बार क्वालिफ़ाई कर चुका है, लेकिन नीति में कमी के कारण प्रवेश नहीं पा सका. कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए प्रवेश अस्वीकृत नहीं किया जा सकता कि राज्य ने प्राइवेट कॉलेजों में EWS रिज़र्वेशन लागू नहीं किया. इसके बाद कोर्ट ने एडमिशन देने के आदेश दे दिए.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अथर्व को एडमिशन का मार्ग खोल दिया है, लेकिन निजी कॉलेजों में EWS कोटे के तहत फीस कितनी होगी, यह अभी तय नहीं हो पाया है. यह सवाल मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है. अथर्व के पिता, जिन्होंने उन्हें गणित पढ़ाया, अब इसी फीस को लेकर तनाव में हैं.

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