ऑफिस 'क्रश' से ऑब्सेशन तक: शादीशुदा हैं और दिल भटके तो 'लिमरेंस' से कैसे बचें? क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक
क्या ऑफिस क्रश धीरे-धीरे ऑब्सेशन में बदल सकता है? शादीशुदा लोगों में बढ़ती ‘लिमरेंस’ की भावना क्या है, इसके संकेत क्या हैं और मनोवैज्ञानिक इससे बचने के लिए क्या सलाह देते हैं? जानिए पूरी जानकारी.;
ऑफिस में रोज-रोज मिलना, छोटी-छोटी बातें, एक मुस्कान और अचानक आपको महसूस होता है कि यह सिर्फ 'क्रश नहीं रहा. आप शादीशुदा हैं, अपने पार्टनर से प्यार भी करते हैं, फिर भी दिमाग बार-बार उसी शख्स के इर्द-गिर्द घूमता है. मनोविज्ञान में इस तीव्र और अक्सर अनियंत्रित चाहत को 'लिमरेंस' कहा जाता है.
शुरुआत में यह एक नेचुरल हाई जैसा लगता है. ज्यादा ऊर्जा, ज्यादा उत्साह, ज्यादा उम्मीद, लेकिन धीरे-धीरे यही अनिश्चितता दिमाग को जकड़ लेती है. सबसे बड़ी चुनौती तब होती है जब यह भावनाएं शादीशुदा जीवन के बीच उभरती हैं. अपराधबोध, डर और उलझनए सब एक साथ. ऐसे में सवाल उठता है: क्या यह सिर्फ एक फेज है, या रिश्ते के लिए खतरे की घंटी?
ऑफिस क्रश से ऑब्सेशन तक: शादीशुदा हों तो ‘लिमरेंस’ को कैसे समझें और संभालें?
कभी-कभी ऑफिस में किसी के लिए अचानक उठी हल्की-सी फीलिंग धीरे-धीरे दिमाग पर छा जाती है. आप अपने पार्टनर से प्यार करते हैं, रिश्ता तोड़ना नहीं चाहते, फिर भी मन बार-बार उसी शख्स के इर्द-गिर्द घूमता है. मनोविज्ञान में इस अनुभव को लिमरेंस कहा जाता है. यह एक ऐसी तीव्र, अनैच्छिक और अक्सर 'ऑब्सेसिव' चाहत है, जो सामान्य क्रश या इनफैचुएशन से अलग होती है.
इस शब्द को पहली बार 1979 में मनोवैज्ञानिक डोरोथी टेनोव (Dorothy Tenov) ने अपनी किताब Love and Limerence में परिभाषित किया था. उनका कहना था कि यह 'बिना मर्जी की, दखल देने वाली और बेहद तीव्र रोमांटिक चाहत' है, जो व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन पर हावी हो सकती है.
लिमरेंस क्या है और यह क्रश से अलग कैसे है?
एक सामान्य क्रश में उत्साह होता है, लेकिन लिमरेंस में अनिश्चितता और उम्मीद की ‘चमक’ लगातार बनी रहती है. जबकि लिमरेंस में व्यक्ति अनिश्चितता के उसी चरण में फंसा रहता है. क्या सामने वाला भी वैसा ही महसूस करता है? क्या कोई संकेत था? यही असमंजस इसे लत जैसा बना देता है.
बीबीसी ने न्यूरोसाइंटिस्ट टॉम बेलामी के हवाले से बताया कि उन्होंने अपनी शादी के दौरान यह अनुभव किया और बाद में इस पर लिखा कि, 'मन की बदली हुई हालत' होते हैं. शुरुआत में यह नेचुरल हाई जैसा लगता है. ऐसा मानव शरीर में ऊर्जा, को-वर्कर के साथ लगाव और डोपामिन में उछाल की वजह से होता है. फर्क यह है कि सामान्य इनफैचुएशन समय के साथ संतुलित हो जाता है.
क्या शादीशुदा लोगों में भी लिमरेंस हो सकता है?
हां, और यही इसे और उलझा देता है. कई लोग अपने जीवनसाथी से प्यार करते हुए भी किसी तीसरे व्यक्ति के प्रति गहरी, दोहराव वाली भावनाएं महसूस कर सकते हैं. इसमें जरूरी नहीं कि वे अफेयर चाहते हों. अक्सर वे सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया - “क्या वह भी मुझे नोटिस करता/करती है?” की तलाश में रहते हैं. समस्या तब बढ़ती है जब यह सोच काम, नींद, परिवार और मानसिक संतुलन पर असर डालने लगे.
‘चमक’ या अनिश्चितता इसे इतना नशे जैसा क्यों बना देती है?
- यूके के कॉग्निटिव-बिहेवियरल साइकोलॉजिस्ट इयान टिंडाल के मुताबिक, 'अनिश्चितता ही इसकी जड़ है. जब सामने वाले की प्रतिक्रिया स्पष्ट नहीं होती, तो दिमाग बार-बार छोटे-छोटे संकेतों को एनालाइज करता है. एक मुस्कान, एक मैसेज, एक नजर.
- यह डोपामिन आधारित रिवॉर्ड सिस्टम को ट्रिगर करता है. डरहम यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक कैथलीन कार्सवेल बताती हैं कि रोमांटिक पैशन भी दिमाग के रिवॉर्ड सर्किट पर काम करता है, लेकिन लिमरेंस में ऑब्सेसिव सोच का स्तर बहुत अधिक होता है.
क्या यह मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा हो सकता है?
- लिमरेंस को अभी औपचारिक मानसिक बीमारी नहीं माना गया है, लेकिन कुछ शोध इसे एंग्जायटी-अटैचमेंट स्टाइल से जरूर जोड़ते हैं. OCD, ADHD या ट्रॉमा से संभावित संबंधों पर चर्चा हुई है, हालांकि ठोस निष्कर्ष अभी नहीं हैं.
- समस्या यह है कि लिमरेंस व्यक्ति को खुद से दूर कर सकता है. नींद कम होना, भूख न लगना, काम पर फोकस न कर पाना, परिवार से दूरी बनाना. यही वह बिंदु है जहां यह “सिर्फ एक क्रश” नहीं रहता.
अगर आप शादीशुदा हैं और यह अनुभव कर रहे हैं तो क्या करें?
पहचानें, दबाएं नहीं – खुद को दोषी ठहराने से पहले समझें कि यह एक मनोवैज्ञानिक अवस्था हो सकती है.
अनिश्चितता को तोड़ें – जितना हो सके सीमाएं तय करें. अनावश्यक बातचीत या कल्पनाओं को हवा देना ‘चमक’ को बढ़ाता है.
रियलिटी चेक लिखें – सामने वाले की आदर्श छवि और वास्तविकता के बीच फर्क समझें.
अपने रिश्ते को समय दें – अक्सर यह संकेत होता है कि शादी में कहीं भावनात्मक खालीपन है.
थेरेपी पर विचार करें – अगर सोच नियंत्रण से बाहर हो, तो प्रोफेशनल मदद फायदेमंद हो सकती है.
क्या लिमरेंस हमेशा नुकसानदायक होता है?
कुछ लोग इसे अस्थायी, आत्म-जागरूकता बढ़ाने वाला अनुभव मानते हैं, लेकिन अगर यह महीनों या सालों तक चलता रहे तो यह मानसिक शांति को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है.
लिमरेंस बीमारी नहीं, इसमें भावनाओं को काबू में रखना होता है - डॉ. सीमा शर्मा
मनोवैज्ञानिक डॉ. सीमा शर्मा के मुताबिक, "लिमरेंस' एक विचित्र स्थिति है. इससे बचने का सवाल नहीं होता. यह एक मानवीय स्वभाव है. जहां तक शादीशुदा होने की बात है, तो मैरिज सामाजिक मान्यता पर आधारित है. इसके कुछ अनुशासन होते हैं. 'लिमरेंस' किसी भी शख्स (महिला या पुरुष) के प्रति उसके कुछ खास कारणों से होता है. जो भी व्यक्ति इससे प्रभावित हैं, उन्हें समझदारी से फैसला लेना होता है."
मनोवैज्ञानिक सीमा शर्मा के अनुसार, "एक शख्स शादीशुदा होने के बाद भी अपने दफ्तर के किसी भी को—वर्कर के प्रति झुकाव रख सकता है. यह कोई जरूरी नहीं है कि अपोजिट जेंडर वाला ही लगाव हो. ऐसे लोगों को खुद पर काबू रखना होता है. ऐसा करने की स्थिति में व्यक्ति होता है, ऐसा करना इसलिए जरूरी है, ताकि वो पारिवारिक व सामाजिक जिम्मेदारियों को सहज तरीके से पूरा कर सके."
वह आगे कहती हैं, "अगर ऐसा नहीं करते, तो उसके परिणाम भी उन्हें खुद भुगतना पड़ेगा. लिमरेंस से प्रभावित शख्स को ऐसी स्थिति में कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ सकता है." इस बारे में आम लोगों को एक चीज समझने की जरूरत है. वो, यह है कि लिमरेंस सेम जेंडर के प्रति भी हो सकता है. ऐसे लोग नॉर्मल होते हैं. उन्हें आप एबनॉर्मल नहीं कर कसते हैं.