Big Shift : नए दौर के युवा - “कास्ट-उम्र की दीवारें ढहीं? क्या पिछले दशक में युवाओं ने बदला सोच का नक्शा!”
साल 2016-2025 स्टडी में बड़ा खुलासा हुआ है.शादी की उम्र बढ़ी और जाति की अहमियत घट गई है. दूसरी शादी को भी स्वीकार्यता मिली है. जानिए युवाओं की सोच में आया बड़ा बदलाव.;
देश का जेन जैड जाति और शादी को लेकर अपनी सोच को फिर से लिख रहा है. भारत में शादी अब सिर्फ पारंपरिक नियमों और परिवार की पसंद तक सीमित नहीं है. नई पीढ़ी (Gen-Z) अपने फैसलों में ज्यादा सक्रिय, व्यावहारिक और भावनात्मक रूप से सजग नजर आ रही है. इस बात का खुलासा मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म Jeevansathi.com की नई डेटा-आधारित रिपोर्ट “The Big Shift: India Partner Search और Marriage के नियमों को कैसे फिर से लिख रहा है” से हुआ है. इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि यह स्टडी 2016 से 2025 तक के एक दशक के यूजर ट्रेंड्स का विश्लेषण करती है और 2026 में 30,000 से ज्यादा एक्टिव यूजर्स के सर्वे इनसाइट्स को भी शामिल करती है. रिपोर्ट बताती है कि भारतीय युवाओं की सोच में बिग शिफ्ट हुआ है.
क्या शादी की उम्र बदल रही है?
स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस वर्षों में पार्टनर खोजने वाले यूजर्स की मीडियन उम्र 27 से बढ़कर 29 वर्ष हो गई है. आज आधे यूजर्स 29 साल की उम्र में अपनी खोज शुरू करते हैं. यह बदलाव दिखाता है कि युवा (Gen-Z) अब शादी से पहले करियर ग्रोथ, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी और पर्सनल तैयारी को प्राथमिकता दे रहे हैं.
क्या अब शादी का फैसला खुद ले रहे हैं युवा?
डेटा के अनुसार 77% प्रोफाइल अब लोग खुद बनाते और मैनेज करते हैं, जबकि 2016 में यह आंकड़ा 67% था। दूसरी तरफ, फैमिली-मैनेज्ड प्रोफाइल 33% से घटकर 23% रह गए हैं. खासकर टियर-3 शहरों में माता-पिता की तुलना में भाई-बहनों की भागीदारी बढ़ी है. इसका मतलब यह है कि अरेंज मैरिज अब पूरी तरह पारंपरिक मॉडल नहीं रही, बल्कि एक “कोलैबोरेटिव प्रोसेस” बनती जा रही है, जहां फैसला व्यक्ति का और सहयोग परिवार का होता है.
क्या जाति की अहमियत कम हो रही है?
- सबसे बड़ा बदलाव जाति आधारित पसंद में दिखा है.
- 2016 में 91% यूजर्स ने जाति को जरूरी मानदंड बताया था.
- 2025 तक यह घटकर 54% रह गया.
- मेट्रो शहरों में यह आंकड़ा और कम होकर 49% है.
- स्टडी रिपोर्ट संकेत देता है कि युवाओं के लिए अब कम्पैटिबिलिटी, साझा मूल्य (shared values) और लाइफस्टाइल अलाइनमेंट पारंपरिक जातिगत सीमाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं.
क्या दूसरी शादी को लेकर नजरिया बदला है?
- रिपोर्ट के अनुसार 2016 में 11% यूजर्स दूसरी शादी करना चाहते थे, जो 2025 तक बढ़कर 16% हो गया. यानी एक दशक में 43% की बढ़ोतरी.
- दिलचस्प बात यह है कि तलाकशुदा प्रोफाइल्स में 15% दिलचस्पी उन लोगों की है जिन्होंने कभी शादी नहीं की. आज प्लेटफॉर्म पर हर छह में से एक सक्सेस स्टोरी में दूसरी शादी शामिल है. यह बताता है कि तलाक और रीमैरेज को लेकर समाज में धीरे-धीरे स्वीकार्यता बढ़ रही है.
क्या इमोशनल रेडीनेस अब उम्र और इनकम से ज्यादा अहम है?
दस में से नौ यूजर्स ने कहा कि किसी खास उम्र या इनकम लेवल तक पहुंचने से ज्यादा जरूरी “सही इंसान” ढूंढना है। जेंडर के आधार पर जवाब लगभग समान रहे. यह ट्रेंड दर्शाता है कि शादी की तैयारी का नया पैमाना इमोशनल रेडीनेस बन रहा है, न कि सिर्फ उम्र या आय.
क्या परिवार की भूमिका खत्म हो रही है?
- युवा ज्यादा स्वतंत्र हो रहे हैं, लेकिन परिवार की भूमिका अभी भी अहम है.
- 69% यूजर्स का मानना है कि माता-पिता की भागीदारी प्रक्रिया को आसान बनाती है.
- महिलाओं में यह आंकड़ा 75% है.
- इससे साफ है कि शादी में स्वतंत्रता और पारिवारिक सहयोग साथ-साथ चल रहे हैं.
क्या आर्थिक अपेक्षाएं भी बदल रही हैं?
- पारंपरिक 'सोल ब्रेडविनर' मॉडल भी कमजोर पड़ा है.
- सिर्फ 8% यूजर्स मानते हैं कि एक पार्टनर को ही घर का अकेला कमाने वाला होना चाहिए.
- 87% पुरुषों ने कहा कि वे ऐसी महिला से शादी करने में सहज हैं जो उनसे ज्यादा कमाती हो.
- 15% महिलाओं ने कहा कि वे कम कमाने वाले पुरुष से शादी करने को तैयार हैं.
- यह आंकड़े आर्थिक समानता की ओर बढ़ते नजरिए को दिखाते हैं.
क्या युवा जल्द शादी करना चाहते हैं?
रिपोर्ट बताती है कि 78% यूजर्स अगले छह महीनों में शादी करने का इरादा रखते हैं, जबकि लगभग आधे तीन महीनों के भीतर शादी की उम्मीद कर रहे हैं.
क्या सच में आ गया है ‘बिग शिफ्ट’?
स्टडी स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में शादी का मॉडल बदल रहा है. न केवल शादी की उम्र बढ़ रही है, बल्कि जातिगत फिल्टर भी ढीले हो रहे हैं. दूसरी शादी की स्वीकार्यता बढ़ रही है. आर्थिक बराबरी को महत्व मिल रहा है. सबसे अहम, इमोशनल रेडीनेस को प्राथमिकता दी जा रही है. यानी नया भारतीय युवा शादी को परंपरा नहीं, साझेदारी की तरह देख रहा है. जहां फैसला खुद का है, लेकिन परिवार का साथ भी जरूरी है.