7 साल तक ‘विदेशी’ का ठप्पा, 2 साल डिटेंशन कैंप..अब उसी केस ने दिलाई भारतीय नागरिकता! कैसे बदली 60 साल की देपाली की किस्मत?

असम में सात साल पहले विदेशी घोषित की गई देपाली दास को अब भारतीय नागरिकता मिल गई है.उन्हें 2019 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने विदेशी बताया था और दो साल तक डिटेंशन कैंप में रहना पड़ा था. खास बात यह है कि उन्हें उसी रिपोर्ट से नारगिकता मिली है जिसकी वजह से उन्हें जेल में रहना पड़ा था.

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Edited By :  समी सिद्दीकी
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Assam News: करीब सात साल पहले असम के एक फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने देपाली दास को विदेशी घोषित कर दिया था.इसके बाद उन्हें दो साल तक एक डिटेंशन कैंप में रहना पड़ा. अब शुक्रवार को उन्हें नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत आवेदन करने के बाद नागरिकता का प्राकृतिककरण प्रमाणपत्र मिल गया है.

दिलचस्प बात यह है कि 60 साल की देपाली दास के वकील धर्मानंद देब ने बताया कि बांग्लादेश की नागरिक होने का सबूत देने के लिए जिस दस्तावेज का इस्तेमाल किया गया, वह असम पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर की रिपोर्ट थी. इसी रिपोर्ट के आधार पर उनके खिलाफ विदेशी होने का मामला शुरू किया गया था. सीएए के नियमों के अनुसार नागरिकता के लिए यह साबित करना जरूरी होता है कि व्यक्ति बांग्लादेश का नागरिक है.

क्या है पूरा मामला?

देपाली दास असम के कछार जिले के हवाईथांग इलाके के एक गांव में अपने परिवार के साथ रहती हैं. उनके खिलाफ मामला तब शुरू हुआ जब असम पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को रिपोर्ट भेजी. इसमें कहा गया था कि वह 25 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से असम आई एक संदिग्ध विदेशी हैं. इसके बाद फरवरी 2019 में कछार के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें विदेशी घोषित कर दिया.

देपाली दास के बेटे आदित्य (33) ने बताया कि 2019 में कुछ पुलिसकर्मी गांव में उनके पिता की फास्ट-फूड की दुकान पर आए और कहा कि उनकी मां को कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करने के लिए साथ चलना होगा. लेकिन उन्हें सीधे सिलचर सेंट्रल जेल ले जाया गया, जहां वह दो साल से ज्यादा समय तक रहीं.

कैसे मिली देपाली को ज़मानत?

बराक घाटी में नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता कमल चक्रवर्ती ने बताया कि उन्होंने मई 2021 में उन्हें जमानत दिलाने में मदद की. यह जमानत सुप्रीम कोर्ट के 2020 के उस सामान्य आदेश के आधार पर मिली थी, जिसमें कहा गया था कि जो विदेशी दो साल की हिरासत पूरी कर चुके हैं, उन्हें जमानत पर रिहा किया जा सकता है.

आदित्य ने बताया कि पिछले कई सालों से उनका परिवार अदालतों और पुलिस के चक्कर लगा रहा था. जमानत पर रिहा होने के बाद देपाली दास को हर हफ्ते ढोलाई पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगानी पड़ती थी. यह उनके लिए मुश्किल था क्योंकि उनके पिता बहुत बीमार हैं और उनकी देखभाल भी देपाली दास को ही करनी पड़ती है. उन्होंने बताया कि शुक्रवार शाम को उन्होंने गृह मंत्रालय के सीएए नागरिकता पोर्टल से अपनी मां का प्राकृतिककरण प्रमाणपत्र डाउनलोड किया.

कैसे मिली देपाली को राहत?

दिसंबर 2019 में जब नागरिकता संशोधन कानून पास हुआ था, तब असम में इसका काफी विरोध हुआ था. खासकर असमिया भाषी ब्रह्मपुत्र घाटी में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे. हालांकि बराक घाटी के बांग्ला भाषी जिलों कछार, करीमगंज और हैलाकांडी में इसका अलग असर देखने को मिला.

यह इलाका बांग्लादेश से करीब 125 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है. यहां बड़ी संख्या में बंगाली हिंदू आबादी रहती है, जो विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए यहां आई थी. इसलिए इस क्षेत्र में सीएए को राहत देने वाले कानून के रूप में देखा गया.

कैसे पुलिस रिपोर्ट ने दिलाई नागरिकता?

देपाली दास के मामले में वही जांच रिपोर्ट अहम साबित हुई, जो असम पुलिस के सब-इंस्पेक्टर ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को भेजी थी. उनके वकील धर्मानंद देब ने बताया कि इस रिपोर्ट में साफ तौर पर बांग्लादेश के सिलहट जिले के परानी बनियाचुंग नाम का पता लिखा था और कहा गया था कि वह वहीं से असम आई थीं. यह एक आधिकारिक पुलिस रिपोर्ट थी, इसलिए इसे जरूरी सबूत के रूप में इस्तेमाल किया गया.

धर्मानंद देब के मुताबिक, इसी आधार पर यह साबित किया गया कि देपाली दास फरवरी 1988 में धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आई थीं. इसके बाद उन्हें नागरिकता संशोधन कानून के तहत भारतीय नागरिकता दे दी गई.

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