गौतम गंभीर की 'नो सुपरस्टार' टीम ने कैसे रचा इतिहास? ऐसे बदली भारतीय क्रिकेट की पूरी तस्वीर

8 मार्च 2026 को टीम इंडिया ने ICC खिताब जीतकर इतिहास रचा. जानें कैसे गौतम गंभीर की रणनीति और ‘नो सुपरस्टार’ टीम मॉडल ने बदली भारतीय क्रिकेट की सोच.

( Image Source:  ICC-X )
By :  सागर द्विवेदी
Updated On : 9 March 2026 7:34 AM IST

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में 8 मार्च 2026 का दिन एक अहम मोड़ के रूप में याद किया जाएगा. पहली बार ऐसा हुआ जब भारत ने कोई ICC टूर्नामेंट जीता और टीम में ऐसा कोई ‘महानायक’ नहीं था जिसकी चमक बाकी खिलाड़ियों को पीछे छोड़ दे. यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि भारतीय क्रिकेट की सोच में आए बड़े बदलाव का संकेत भी थी.

टीम की कप्तानी सूर्यकुमार यादव के हाथों में थी और उन्होंने देश को यह कप दिलाने में अहम भूमिका निभाई. हालांकि वह कपिल देव, महेंद्र सिंह धोनी, रोहित शर्मा, सौरव गांगुली या विराट कोहली जैसे करिश्माई नेताओं की श्रेणी में नहीं आते. इस टीम की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि यहां कोई एक खिलाड़ी टीम से बड़ा नहीं था—हर खिलाड़ी टीम का हिस्सा था और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई.

क्या इस जीत के पीछे असली दिमाग कोच गौतम गंभीर का था?

इस विजेता टीम पर अगर किसी एक व्यक्ति की सबसे स्पष्ट छाप दिखाई देती है, तो वह हैं मुख्य कोच गौतम गंभीर. लंबे समय से भारतीय क्रिकेट की ‘स्टार संस्कृति’ के आलोचक रहे गंभीर ने ऐसी टीम बनाने का सपना देखा था जिसमें हर खिलाड़ी की अहमियत हो और कोई भी नाम टीम से बड़ा न हो.

पिछले दो वर्षों में उन्होंने इस टीम को धीरे-धीरे तैयार किया. कुछ खिलाड़ियों को मौका दिया, कुछ को बाहर किया और कई प्रतिभाओं को तराशा. आज जब टीम ने ICC ट्रॉफी जीती, तो यह साफ दिखा कि यह केवल खिलाड़ियों की जीत नहीं बल्कि गंभीर की सोच की जीत भी है.

क्या भारत की जीत का श्रेय सिर्फ कप्तान को नहीं बल्कि पूरे सिस्टम को जाता है?

पहले भारतीय टीमों को अक्सर उनके कप्तानों के नाम से जाना जाता था-'कपिल्स डेविल्स', 'धोनी की आर्मी' या 'रोहित की टीम'. लेकिन अब यह सोच बदलती दिख रही है. अब भारतीय क्रिकेट भी वैश्विक खेलों के उस ट्रेंड की ओर बढ़ रहा है जहां कोच की रणनीति और सिस्टम सबसे अहम भूमिका निभाते हैं. गंभीर के नेतृत्व में टीम की रणनीति, खिलाड़ियों का चयन और मैदान पर खेलने का तरीका काफी हद तक कोच की सोच से प्रभावित दिखाई देता है. इस प्रक्रिया में चयन समिति के अध्यक्ष अजीत अगरकर का भी अहम योगदान रहा, जिन्होंने खिलाड़ियों की लोकप्रियता के बजाय प्रदर्शन को प्राथमिकता दी.

क्या गौतम गंभीर ‘स्टार कल्चर’ के खिलाफ हमेशा से रहे हैं?

गंभीर की सोच लंबे समय से साफ रही है. वह मानते हैं कि कुछ खिलाड़ियों को जरूरत से ज्यादा महिमामंडित किया जाता है, जबकि कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी नजरअंदाज हो जाते हैं. 30 जुलाई 2025 को लंदन के ओवल टेस्ट से एक दिन पहले पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने एक दिलचस्प बात साझा की. उन्होंने बताया कि वह अक्सर भगत सिंह की जीवनी पढ़ते रहते हैं और उनसे बेहद प्रेरित हैं.

उसी बातचीत में उन्होंने एक सवाल पूछा कि भगत सिंह के सबसे बड़े नायक कौन थे. वह युवा क्रांतिकारी जिसकी तस्वीर वह अपनी जेब में रखते थे?' फिर खुद ही जवाब दिया- करतार सिंह सराभा. सिर्फ 19 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ने वाले इस क्रांतिकारी की बहादुरी का जिक्र करते हुए गंभीर ने कहा कि इतिहास में कुछ नामों को ही बार-बार याद किया जाता है, जबकि कई बड़े योगदान देने वाले लोग भुला दिए जाते हैं.

क्या टीम में बड़े नामों की ‘इम्युनिटी’ खत्म हो गई है?

गंभीर के कोच बनने के बाद टीम चयन में कई बड़े फैसले देखने को मिले. लंबे समय से खराब फॉर्म में चल रहे कुछ बड़े खिलाड़ियों को टीम से बाहर का रास्ता दिखाया गया. इस दौरान कई आलोचकों ने इसे विवादास्पद बताया और सोशल मीडिया पर भी उन्हें कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी. लेकिन गंभीर अपने फैसलों पर अडिग रहे.

नए कप्तान शुभमन गिल को भी एक समय सुपरस्टार माना जाने लगा था, लेकिन खराब फॉर्म के चलते उन्हें टी20 वर्ल्ड कप टीम से बाहर कर दिया गया. यह दिखाता है कि अब टीम में किसी भी खिलाड़ी को सिर्फ नाम के आधार पर जगह नहीं मिलेगी.

क्या गौतम गंभीर हमेशा अनदेखे खिलाड़ियों को मौका देते रहे हैं?

गंभीर की सबसे खास बात यह है कि वह अक्सर उन खिलाड़ियों पर भरोसा करते हैं जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं. इंग्लैंड दौरे के दौरान उन्होंने वॉशिंगटन सुंदर को लगातार मौका दिया, जबकि कई विशेषज्ञ कुलदीप यादव को टीम में शामिल करने की मांग कर रहे थे. इसी तरह हर्षित राणा को भी उन्होंने लगातार समर्थन दिया.

कई विशेषज्ञों ने संजू सैमसन को टीम से बाहर करने की सलाह दी थी, लेकिन गंभीर ने उन पर भरोसा बनाए रखा. इसी तरह खराब फॉर्म के बावजूद अभिषेक शर्मा को मौका मिला और उन्होंने फाइनल में शानदार अर्धशतक लगाकर भरोसा सही साबित किया.

क्या खिलाड़ियों के साथ गंभीर का रिश्ता अलग है?

खिलाड़ियों के साथ गंभीर का रिश्ता भरोसे पर आधारित माना जाता है. एक दिलचस्प घटना 2024 IPL के दौरान सामने आई. कोलकाता नाइट राइडर्स के कोच रहते हुए सुनील नरेन शानदार प्रदर्शन कर रहे थे. उस दौरान वेस्टइंडीज के कप्तान रोवमैन पॉवेल ने गंभीर से अनुरोध किया कि वह नरेन को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी के लिए मनाएं. कहा जाता है कि जब गंभीर ने नरेन से इस बारे में बात की तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि 'अगर आप वेस्टइंडीज टीम के कोच बनें.' इस पर दोनों हंस पड़े और बात वहीं खत्म हो गई.

क्या गंभीर की सोच ही इस टीम की सबसे बड़ी ताकत बनी?

गंभीर हमेशा से अलग सोच के लिए जाने जाते हैं. उनके लिए टीम में नाम से ज्यादा महत्व प्रदर्शन का है. एक बार उनसे पूछा गया कि क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेसी में से वह किसे चुनेंगे. इस पर उन्होंने चौंकाते हुए जवाब दिया- मार्कस रैशफोर्ड.

क्या इस जीत से भारतीय क्रिकेट में एक नई क्रांति की शुरुआत हुई है?

टी20 वर्ल्ड कप की यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं बल्कि एक नई सोच की शुरुआत है. गंभीर ने यह साबित कर दिया है कि टीम की सफलता किसी एक सुपरस्टार पर निर्भर नहीं होती. उनका मानना है कि एक मजबूत सिस्टम बनाना जरूरी है, जो भविष्य में आने वाले खिलाड़ियों के लिए रास्ता तैयार करे. जैसे भगत सिंह अपनी जेब में कর্তार सिंह सराभा की तस्वीर रखते थे, वैसे ही गंभीर भी शायद हमेशा इस विचार को साथ रखते हैं कि असली बदलाव वही लाता है जो अलग सोचने का साहस रखता है.

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