एंटी-एजिंग टेक्नोलॉजी से बदलेगा इंसान का भविष्य? अब 150 साल तक जी सकेंगे लोग! जानें क्या कहती है नई रिसर्च
क्या इंसान की उम्र अब 150 साल तक पहुंच सकती है? उम्र बढ़ने के प्रोसेस को समझने वाली नई वैज्ञानिक रिसर्च और एंटी-एजिंग तकनीकों ने इस सवाल को गंभीर बना दिया है.;
क्या इंसान की उम्र अब 100 साल की सीमा से आगे निकलकर 150 साल तक पहुंच सकती है? एंटी-एजिंग टेक्नोलॉजी और उम्र बढ़ने के बॉयोलॉजिकल प्रोसेस पर हो रहे नए शोध ने इस सवाल को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है. वैज्ञानिक अब सिर्फ यह नहीं देख रहे कि लोग कितने साल जिंदा रह सकते हैं.
बल्कि यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर के भीतर उम्र बढ़ने की रफ्तार को कैसे धीमा किया जाए. डीएनए में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को पढ़ने वाली एपिजेनेटिक क्लॉक जैसी तकनीकों ने यह साइन दिया है कि हमारी जैविक उम्र, असली उम्र से अलग हो सकती है.
उम्र बढ़ी, लेकिन सेहत घटी?
बीते सौ सालों में मेडिकल साइंस ने मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया है. दवाइयों, सर्जरी, टीकाकरण और आधुनिक मशीनों ने जीवन को लंबा तो किया है, पर कई बार लोग मशीनों के सहारे जिंदा रहते हैं, लेकिन लो लाइफ क्वालिटी के साथ. यही वजह है कि अब वैज्ञानिक सिर्फ लाइफस्पैन (कितने साल जिए) पर नहीं, बल्कि हेल्थस्पैन (कितने साल हेल्दी जिए) पर ध्यान दे रहे हैं.
जैविक उम्र बनाम असली उम्र?
दरअसल कैलेंडर बताता है कि आपकी उम्र कितनी है, लेकिन आपका शरीर कितनी उम्र का महसूस कर रहा है. यह दोनों अलग बात है. यहीं से आती है एपिजेनेटिक क्लॉक की अवधारणा. फेमस वैज्ञानिक स्टीव हॉर्वाथ ने एक ऐसा मेथड डेवलप किया है, जो डीएनए पर होने वाले सूक्ष्म रासायनिक बदलावों (DNA methylation) के आधार पर यह अंदाजा लगाता है कि शरीर असल में कितना “पुराना” हो चुका है. यानी, 60 साल का व्यक्ति बायोलॉजिकल तौर से 45 का भी हो सकता है और 30 साल का शख्स अंदर से 50 का.
क्या इस तकनीक से 150 साल तक जी सकते हैं?
कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर हम उम्र बढ़ने की सेलुलर प्रोसेस को समझ लें और उसे धीमा या कंट्रोल कर सकें, तो इंसान की उम्र बहुत आगे तक बढ़ सकती है. लेकिन यह कोई जादू नहीं है. इसके लिए ज़रूरी होगा:
- टिश्यू की मरम्मत की क्षमता बढ़ाना
- जीन थेरेपी में क्रांतिकारी बदलाव
- सूजन (inflammation) को कंट्रोल रखना
- अंगों को लंबे समय तक हेल्दी बनाए रखना
डीएनए के अलावा ये चीजें रखती हैं मायने
विशेषज्ञों का कहना है कि डीएनए मेथिलेशन एक इंडिकेटर जरूर है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. आपकी लंबी और स्वस्थ जिंदगी इन चीजों पर भी निर्भर करती है:
- आंतों की सेहत (Gut health)
- न्यूट्रिशन की कंडीशन
- नींद की क्वालिटी
- मानसिक तनाव का लेवल
- प्रदूषण और टॉक्सिन का असर
- लाइफस्टाइल और फिजिकल एक्टिविटी
यानी, विज्ञान आपको दिशा दिखा सकता है, लेकिन रास्ता आपको खुद तय करना होगा.
असली लंबी उम्र कैसी होनी चाहिए?
लंबी जिंदगी का मतलब यह नहीं कि आप बिस्तर पर पड़े रहें या दवाइयों पर निर्भर रहें. असल मायने में लंबी उम्र वह है, जब व्यक्ति खुद चल-फिर सके, दिमागी रूप से सतर्क रहे, इमोशनली बैलेंस रहे और किसी पर निर्भर न हो. 100 साल जीना तभी मायने रखता है, जब आप उन सालों को पूरी क्षमता के साथ जी सकें.
क्या 150 साल जीना तय?
ईमानदारी से कहें तो, अभी कोई निश्चित जवाब नहीं है. ये सभी मॉडल संभावनाओं पर आधारित हैं, गारंटी पर नहीं. लेकिन अगर किसी व्यक्ति का शरीर लगातार हेल्दी रहता है, सूजन कम रहती है, मांसपेशियां मजबूत रहती हैं और अंग सही काम करते रहते हैं, तो शरीर के “फेल” होने का कोई तत्काल कारण नहीं होता.
भविष्य का विज्ञान क्या कहता है?
आने वाले समय में अगर रिजेनरेटिव मेडिसिन, जीन थेरेपी और टिश्यू लेवल पर रिपेयरिंग की तकनीकें विकसित होती रहीं, तो 150 साल की उम्र कोई नामुमकिन सपना नहीं रह जाएगी. लेकिन यह धीमी, निरंतर और गंभीर वैज्ञानिक प्रगति का नतीजा होगा. कोई अचानक चमत्कार नहीं.