मुंबई कोई धर्मशाला नहीं, 'भईया' बन गया था 'गाली'; यूपी-बिहार से आने वाले क्‍यों रहते थे बाल ठाकरे के निशाने पर?

बीएमसी चुनाव नज़दीक आते ही महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भाषा, पहचान और ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ की बहस तेज़ हो गई है. राज ठाकरे और के. अन्नामलाई के बीच छिड़ी जुबानी जंग ने मराठी अस्मिता को फिर सियासी केंद्र में ला खड़ा किया है. यह विवाद सिर्फ मौजूदा बयानबाज़ी तक सीमित नहीं, बल्कि बाल ठाकरे की उस आक्रामक राजनीति की याद दिलाता है, जिसमें यूपी-बिहार से आए लोगों को लेकर तीखे और विवादित रुख अपनाए गए थे.;

Edited By :  प्रवीण सिंह
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महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भाषा, पहचान और बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा तेज़ी से उभर आया है. बीएमसी चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है और नेताओं के बयान अब सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि सीधे समाज की नस को छू रहे हैं. इसी कड़ी में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे और तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई के बीच शुरू हुई जुबानी जंग ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है.

एक तरफ मराठी अस्मिता और भाषा को लेकर आक्रामक तेवर हैं, तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय एकता और समान अधिकारों की बात कही जा रही है. यह विवाद सिर्फ दो नेताओं की बयानबाजी नहीं है, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले यह साफ संकेत दे रहा है कि महाराष्ट्र में पहचान की राजनीति फिर केंद्र में आने वाली है. इसी बहस के बीच एक पुराना सवाल भी फिर उठ खड़ा हुआ है कि आखिर बाला साहब ठाकरे उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले लोगों को लेकर क्या सोचते थे.

क्‍या सोचते थे बाल ठाकरे?

बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र की राजनीति में बाल ठाकरे एक ऐसे नेता रहे, जिन्होंने बिना चुनाव लड़े, बिना किसी संवैधानिक पद पर बैठे, दशकों तक सत्ता और सियासत की दिशा तय की. मुंबई उनकी राजनीति का केंद्र रही और मराठी अस्मिता उनकी वैचारिक रीढ़. लेकिन इसी राजनीति का एक विवादित पहलू था - उत्तर प्रदेश और बिहार से मुंबई आने वाले लोगों को लेकर उनका खुला और आक्रामक विरोध.

बाल ठाकरे का मानना था कि मुंबई और महाराष्ट्र की पहचान मराठी मेहनतकशों से बनी है और बाहर से आने वाले लोग न सिर्फ स्थानीय संसाधनों पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मराठी भाषा और संस्कृति को भी पीछे धकेल रहे हैं. यही सोच समय के साथ उनके बयानों में तीखे शब्दों और उग्र लहजे के रूप में सामने आई.

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‘मुंबई सबकी नहीं’ की सोच

बाल ठाकरे बार-बार कहते रहे कि मुंबई कोई धर्मशाला नहीं है, जहां कोई भी आकर बस जाए. उनका तर्क था कि देश के दूसरे राज्यों की सरकारें अपने लोगों को रोज़गार देने में नाकाम रही हैं और उसका बोझ मुंबई उठा रही है. इसी सोच के तहत उन्होंने एक बार यहां तक कह दिया कि मुंबई में बाहर से आने वालों के लिए परमिट सिस्टम लागू किया जाना चाहिए, ताकि शहर पर “बाहरी दबाव” कम हो सके. उनकी नजर में सबसे ज़्यादा निशाने पर रहे उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले मज़दूर और कामगार. बाल ठाकरे के दौर में “भईया” शब्द एक राजनीतिक पहचान बन गया, जिसे शिवसेना के कार्यकर्ता खुलेआम इस्तेमाल करते थे. जिस तरह दिल्‍ली में कभी 'बिहारी' अपमानसूचक शब्‍द की तरह इस्‍तेमाल किया जाता था, ठाकरे के दौर में मुंबई में भईया का भी कुछ ऐसा ही इस्‍तेमाल देखा जाता रहा.

बिहार पर सबसे तीखे हमले

साल 2008 में बाल ठाकरे के कुछ बयान ऐसे आए, जिन्होंने देश भर में भारी विवाद खड़ा कर दिया. शिवसेना के मुखपत्र में छपे लेखों में बिहार को भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और अराजकता का प्रतीक बताया गया. बिहारियों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया और यह तर्क दिया गया कि जिस राज्य में व्यवस्था ही नहीं, वहां के लोग मुंबई आकर क्या सुधार लाएंगे. उनका यह रुख सिर्फ राजनीतिक आलोचना नहीं था, बल्कि एक तरह से सामाजिक वर्गीकरण था, जिसने उत्तर भारतीयों के खिलाफ माहौल को और जहरीला किया.

‘पहले मराठी, बाद में भारतीय’

बाल ठाकरे की राजनीति में राष्ट्रवाद जरूर था, लेकिन वह मराठी पहचान से होकर गुजरता था. इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2009 में देखने को मिला, जब सचिन तेंदुलकर ने कहा कि “मुंबई हर भारतीय की है”. इस बयान पर बाल ठाकरे भड़क गए. उन्होंने साफ कहा कि मैदान पर खेलना अलग बात है, लेकिन मराठी अधिकारों पर टिप्पणी करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उनका संदेश साफ था - मुंबई में रहना है तो मराठी भावनाओं का सम्मान करना होगा.

खेल, कलाकार और निजी जीवन तक दखल

बाल ठाकरे की राजनीति सिर्फ क्षेत्रीयता तक सीमित नहीं रही. उन्होंने खेल और सिनेमा की दुनिया में भी अपने विचार खुलकर रखे. सानिया मिर्ज़ा और शोएब मलिक की शादी को लेकर उन्होंने यह तक कह दिया कि अगर कोई खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहता है, तो उसका दिल भी भारत के लिए धड़कना चाहिए. उन्होंने सानिया की पहचान, पहनावे और निजी फैसलों तक पर टिप्पणी की, जिससे यह साफ हो गया कि ठाकरे की राजनीति में निजी और सार्वजनिक के बीच की रेखा बहुत पतली थी.

ठाकरे ने आईपीएल और शाहरुख खान को भी नहीं बख्‍शा था. जब शाहरुख़ ख़ान ने आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शामिल करने की वकालत की थी, तो बाल ठाकरे ने इसे देशद्रोह की तरह देखा और शाहरुख़ पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें “निशान-ए-पाकिस्तान” दिया जाना चाहिए. वहीं उनका मानना था कि आईपीएल क्रिकेट की आत्मा को नष्ट कर रहा है और इसे बंद कर देना चाहिए.

राजनीति से आगे एक विचारधारा

बाल ठाकरे के समर्थक उन्हें मराठी स्वाभिमान का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें विभाजनकारी राजनीति का चेहरा कहते हैं. उनके बयान अक्सर सीमा लांघते दिखे, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जो कहा, बिना झिझक कहा और उसी पर डटे रहे. आज जब महाराष्ट्र में फिर भाषा, पहचान और बाहरी बनाम स्थानीय की बहस तेज़ हो रही है, तो बाल ठाकरे का नाम बार-बार सामने आ रहा है.

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