साधू का श्राप, शोर से रूठने वाली देवी और कामदेव की मौत; ये खास 5 वजहें जिनकी वजह से इन जगहों पर नहीं मनाई जाती होली
भारत में जहां एक ओर होली रंग-गुलाल के साथ धूमधाम से मनाई जाती है, वहीं कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां सदियों से यह त्योहार वर्जित है. इन जगहों पर श्राप, देवी की मान्यता और दुखद ऐतिहासिक घटनाएं आज भी लोगों को होली से दूर रखे हुए हैं.
Holi 2026 : होली का त्योहार भारत की संस्कृति का सबसे रंगीन और खुशहाल पर्व है. हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा को, इस बार 4 मार्च को, पूरे देश में लोग रंग-गुलाल, पिचकारी, ढोल-नगाड़े और मिठाइयों के साथ होली मनाते हैं. दुनिया के कई हिस्सों में भी ये उत्सव फैल चुका है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में ही कुछ ऐसी जगहें हैं जहां सदियों से होली नहीं मनाई जाती? वहां के लोग रंग छूने से भी डरते हैं, क्योंकि पीछे कुछ ऐसी पुरानी कहानियां और मान्यताएं हैं जो आज भी जिंदा हैं. चलिए जानते है कि आखिर ऐसा क्यों?.
1. हरियाणा का दुसेरपुर गांव 300 साल पुराना श्राप
हरियाणा के कैथल जिले के दुसेरपुर गांव में होली मनाने का रिवाज आज से 300 साल से भी ज्यादा का है. जहां अब न रंग उड़ते है न कोई गुलाल खेलता है. होली जो भारत देश का पर्व है और लोगो इसे मनाने के लिए जश्न में डूब जाते है. लेकिन दुसेरपुर गांव अब तक एक साधु के श्राप के चपेट में है. इस बात में कितनी सच्चाई है इसका पता लगाने के लिए Etv Bharat की टीम दुसेरपुर गई जहां स्थानीय लोगों ने इस श्राप की कहानी बयां कि. वहां के बड़े बूढ़ों के अनुसार, गांव के लिए होलिका दहन की तैयारी करने के लिए जंगल से सूखी लकड़ियां बटोरने गए. तभी वहां कुछ लड़कों को शरारत सूझी और उन्होंने समय से पहले ही होलिका दहन शुरू कर दी. ऐसा होता देख स्नेही राम साधु ने उन्हें रोकने की कोशिश की. लड़के उनकी बात नहीं माने और साधू की कद-काठी का मजाक बनाने लगे साधु का कद छोटा था इसलिए वह उसे बौना-बौना कहने लगे. साधू को अपना यह अपमान बर्दाश्त न हुआ और वह उसी होलिका में खुद गए. इस दौरान उन्होंने मरते-मरते गांव वालों को श्राप दिया कि इस गांव में कभी होली नहीं मनाई जाएगी. हालांकि कुछ समय बीत जाने के बाद जब लोगों ने होली मनाने की कोशिश की तो, गांव वालों के साथ अजीबो-गरीब घटनाएं हुई. यहां तक की कुछ लोगों की मौत तक हो गई. जिसके बाद दुसेरपुर में होली मनाने का सिलसिला 300 साल से भी ज्यादा से रुका है. वहीं स्थानीय लोगों ने बताया कि जब वह इस श्राप से मुक्त होने लिए उपाय तलाशा तो कहा गया कि अगर होली के दिन इस गांव कोई बछड़ा पैदा हो या नवजात, तब जाकर गांव श्राप से मुक्त होगा. लेकिन 300 साल बाद भी ऐसा संजोग बना ही नहीं कि गांव में कहीं बछड़ा या नवजात पैदा हुआ हो. ऐसे में गांववालों ने मिलकर एक शिलालेख बनवाई जिसमें बताया गया है कि इस गांव में होली नहीं मनाई जाती है.
2. उत्तराखंड के खुरजान और क्विली गांव
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में दो छोटे-छोटे गांव हैं खुरजान और क्विली. यहां की हवा में शांति है, पहाड़ हैं, जंगल हैं. लेकिन होली के दिन यहां सन्नाटा छा जाता है. कोई ढोल नहीं बजता, कोई रंग नहीं उड़ता क्यों? क्योंकि यहां के लोग अपनी कुल देवी मां त्रिपुर सुंदरी को बहुत मानते हैं. TV9 के मुताबिक, मान्यता है कि देवी को शोर-शराबा, तेज आवाजें और चमकीले रंग बिल्कुल पसंद नहीं. अगर गांव में होली की धूम मचाई तो देवी रुष्ट हो जाएंगी और गांव पर कोई बड़ी विपदा आ जाएगी जैसे बीमारी, सूखा या कोई अनहोनी. इसलिए 150 सालों से यहां होली नहीं मनाई जाती. लोग सिर्फ देवी की पूजा करते हैं, शांत मन से प्रार्थना करते हैं. नई पीढ़ी भी इस परंपरा को मानती है क्योंकि उनके लिए देवी की कृपा सबसे बड़ा त्योहार है. वहां के स्थानीय लोग कहते है कि ऐसा नहीं है कि उन्होंने अन्य राज्यों की तरह होली मनाने की कोशिश नहीं की बल्कि ऐसा करने पर गांव में महामारी फैल गई और होली का त्यौहार मनाना बंद गया.
3. झारखंड का दुर्गापुर गांव – राजा-रानी की दुखद मौत का शोक
झारखंड के बोकारो जिले में दुर्गापुर नाम का एक गांव है, जहां दुर्गा पहाड़ी की तलहटी में लोग रहते हैं. यहां होली के दिन रंग नहीं, बल्कि शोक मनाया जाता है. कहानी 200-350 साल पुरानी है उस समय दुर्गापुर के राजा दुर्गा प्रसाद देव का शासन था. रामगढ़ के राजा दलेल सिंह से उनकी पुरानी रंजिश थी. एक बार होली के दिन युद्ध छिड़ गया. रामगढ़ के राजा ने दुर्गापुर पर हमला किया। लड़ाई में राजा दुर्गा प्रसाद की हत्या हो गई. राजा की मौत की खबर सुनकर रानी ने भी नदी में कूदकर जान दे दी. कई निर्दोष गांव वाले और बच्चे भी मारे गए. गांव वाले इस दुख को कभी नहीं भूल पाए. तब से होली उनके लिए शोक का दिन बन गई. कुछ साल बाद कुछ लोग होली मनाने की कोशिश की, लेकिन उसी दिन दो मौतें हो गईं और महामारी फैल गई. लोग मानते हैं कि रंग खेलने से राजा-रानी की आत्मा नाराज होती है इसलिए आज भी यहां रंग छूना अपशकुन माना जाता है. अगर कोई बाहर से आकर रंग लगाए तो भी लोग डरते हैं. गांव में 11 टोले हैं, लेकिन सब एक साथ इस परंपरा को निभाते हैं.
4. गुजरात का रामसन गांव आग की भयानक घटना
गुजरात के बनासकांठा जिले में रामसन गांव बसा है. मान्यता है कि भगवान राम वनवास में यहां आए थे. लेकिन 200 साल पहले होलिका दहन के दिन एक भयानक हादसा हुआ. होलिका की आग इतनी तेज फैली कि पूरे गांव में लग गई. कई घर जलकर राख हो गए, लोग बहुत डर गए. हादसे के बाद गांव वालों ने फैसला किया अब कभी होली नहीं मनाएंगे. तब से न होलिका दहन होता है, न रंग खेला जाता है. गांव आज भी शांत रहता है, लोग सिर्फ मंदिर में पूजा करते हैं.
5. दक्षिण भारत क्यों नहीं मनाता होली
होली मुख्य रूप से उत्तर भारत में बड़े उत्साह से मनाई जाती है, जबकि दक्षिण भारत में यह उतना प्रचलित नहीं है. इसके बारें खुद इंडियन माइथोलॉजिस्ट देव दत्त ने लिखा है कि दक्षिण भारत में होली न मनाने के कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कारक हैं. होली की जड़ें उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में हैं. जहां कृष्ण-राधा की प्रेम-लीला और वसंत ऋतु की शुरुआत से जुड़ी कथाएं मानी जाती हैं. वहीं दूसरी कहानी रति और कामदेव से जुड़ी है जब कामदेव भगवन शिव को उत्तेजित कर उनकी तपस्या को भंग कर रहे थे. तभी क्रोधित होकर शिव ने कामदेव को अपनी तीसरी नेत्र से भस्म कर दिया. रति से जुदाई सह न पाई और शिव की दयलुता को जानते हुए अपने पति कामदेव को वापस पाने की इच्छा जाहिर की. शिव जो गुस्से और तांडव के लिए जाने है उतने ही वह शांत स्वभाव के भी है. उन्होंने रति को उनका पति कामदेव लौटा दिया यूं कहें कि कामदेव का पुर्नजन्म हुआ लेकिन बिना शरीर के जिनका नाम पड़ा अनांग. अनांग जिसका अर्थ है बिना शरीर का वो लोगों के दिमाग और मन में बसे प्यार और कामुकता के लिए. देवदत्त के मुताबिक, कामदेव की मृत्यु के बाद उनका पुनर्जन्म कृष्ण के रूप में भी हुआ, और इसीलिए होली कामवासना (काम) के प्रेम (प्रेम) में परिवर्तन का प्रतीक है. तमिलनाडु में फाल्गुन पूर्णिमा को लोग कामदेव के बलिदान को याद करते हैं न कि रंगों का जश्न मनाते हैं. यहां के लोग कामदेव की पत्नी रति के विलाप के रूप में शोक गीत गाते हैं. कई जगहों पर लोग कामदेव की राख की पूजा भी करते हैं. दक्षिण में अपना अलग त्योहार जैसे पोंगल, ओणम, उगादी अधिक लोकप्रिय हैं. कुछ जगहों (जैसे महाराष्ट्र-कोंकण प्रभाव वाले इलाके) में रंग पंचमी या काम दहनम मनाया जाता है, लेकिन रंगों का हुड़दंग उत्तर प्रदेश जैसा नहीं. बॉलीवुड और उत्तर भारतीय प्रवास से अब शहरों (बेंगलुरु, हैदराबाद) में थोड़ी धूम दिखती है, पर यह मूल रूप से उत्तर भारतीय त्योहार ही रहा. यह हिंदू धर्म की विविधता दिखाता है, एक ही त्योहार अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूप लेता है.