शिमला, मसूरी और नैनीताल तक हर पहाड़ी शहर में क्यों होती है ‘मॉल रोड’? दिलचस्प है इसके पीछे की कहानी
भारत के किसी भी पहाड़ी कस्बे में कदम रखते ही जो चीज सबसे पहले ध्यान खींचती है, वह है वहां की चहल-पहल से भरी मॉल रोड. सैलानियों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है. आखिर हर हिल स्टेशन में मॉल रोड क्यों होती है?
Mall Road Shimla
(Image Source: X/ @SidHimachal )भारत के किसी भी पहाड़ी कस्बे में कदम रखते ही जो चीज सबसे पहले ध्यान खींचती है, वह है वहां की चहल-पहल से भरी मॉल रोड. शाम ढलते ही यहां सैलानियों की भीड़ उमड़ पड़ती है, कैफे और दुकानों में रौनक बढ़ जाती है और पूरा शहर मानो इसी एक सड़क पर सिमट आता है. यही वजह है कि सैलानियों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है. आखिर हर हिल स्टेशन में मॉल रोड क्यों होती है?
इस सवाल का जवाब केवल पर्यटन या आधुनिक सुविधाओं में नहीं, बल्कि इतिहास, भूगोल और ब्रिटिश दौर की उस विरासत में छिपा है, जिसने भारत के पहाड़ी शहरों की संरचना को आकार दिया. मॉल रोड को समझना दरअसल भारत के हिल स्टेशनों के विकास की पूरी कहानी को समझना है.
कैसे हुई मॉल रोड की शुरुआत?
भारत के ज्यादातर हिल स्टेशन ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित किए गए थे. अंग्रेजों ने मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए पहाड़ी इलाकों में छुट्टियां बिताने के लिए ऐसे ठिकाने बसाए. शिमला, मसूरी, नैनीताल. डार्जलिंग और उटी जैसे शहर मूल रूप से अंग्रेजों ने विश्राम स्थलों के रूप में बसाए गए थे. इन शहरों को छोटे ब्रिटिश नगरों की तर्ज पर डिजाइन किया गया था, जहां पैदल चलने के लिए चौड़ी सड़के और एक केंद्रीय सामाजिक स्थल अनिवार्य हिस्सा हुआ करता था. इसी सोच से मॉल रोड की छवि जन्मी.
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‘मॉल’ शब्द का असली अर्थ क्या?
आज ‘मॉल’ शब्द सुनते ही शॉपिंग कॉम्प्लेक्स का ख्याल आता है, लेकिन उस दौर में ‘मॉल’ का अर्थ सार्वजनिक पैदल मार्ग या सैरगाह हुआ करता था. मॉल रोड वह मुख्य मार्ग था जहां ब्रिटिश अधिकारी और उनके परिवार शाम की सैर करते, सामाजिक मेलजोल बढ़ाते थे. यह स्थान लंबे समय तक स्थानीय निवासियों के लिए बंद भी रहा, जिससे यह विशेषाधिकार और सत्ता का प्रतीक बन गया.
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शहर का दिल कैसे बनी मॉल रोड?
समय के साथ मॉल रोड हिल स्टेशनों की पहचान बन गई. इसे जानबूझकर इतना चौड़ा और समतल बनाया गया कि लोग आराम से टहल सकें और आसपास के प्राकृतिक दृश्यों का आनंद ले सकें. मॉल रोड के आसपास चर्च, क्लब, लाइब्रेरी और प्रशासनिक भवन बनाए गए ताकि सभी प्रमुख संस्थान पैदल दूरी पर रहें. आजादी के बाद भी यही ढांचा कायम रहा और मॉल रोड स्वाभाविक रूप से स्थानीय जीवन का केंद्र बन गई.