फोकट की पब्लिसिटी का नायाब नमूना सड़क से संसद तक चर्चित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ - ले. कर्नल सोढ़ी

पूर्व थलसेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब Four Stars of Destiny पर संसद में मचे बवाल को रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने बेवजह का राजनीतिक शोर करार दिया है. उनका कहना है कि यह विवाद किताब से ज्यादा उसकी “फोकट की पब्लिसिटी” बन गया है.

भारत के पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की वह किताब जो अभी छपी ही नहीं और जिसने, संसद (लोकसभा) तक को ठप करा डाला. बीते कई दशक का इतिहास पलट कर देखिए तो पहला उदाहरण होगा जब किसी अप्रकाशित किताब को लेकर मचे बे-वजह, बे-सिर-पैर के बवाल ने देश की संसद (लोकसभा) ही ठप करवा डाली हो.

सोशल मीडिया पर मौजूद किताब के तमाम अंशों को जितना मैंने पढ़ा है. उसे पढ़कर किताब में ऐसा कहीं लिखा नहीं मिला है जिसके चलते संसद ही ठप करवा डाली गई हो. मुझे तो लगता है कि भारत के पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एम एम नरवणे यानी मनोज मुकुंद नरवणे (General MM Narvane) की वह किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ (Four Stars of Destiny) जो अभी प्रकाशित तक नहीं हुई है, उस किताब के मुद्दे पर संसद की कार्यवाही ही ठप कर दिया जाना, खुले तौर पर घर बैठे किताब की पब्लिसिटी फोकट में कर डालने जैसा है.

यह तमाम बेबाक बातें बयान की हैं भारतीय थलसेना के पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने. जेएस सोढ़ी नई दिल्ली में स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन से एक्सक्लूसिव बात कर रहे थे. हालांकि इस बीच सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि अपनी अप्रकाशित किताब पर मचे बवाल से लेखक नरवणे हाल-फिलहाल एकदम खुद को अलग करने में जुटे हैं. जिसके मुताबिक उन्होंने कहा है कि वे अब एक नई उसी अप्रकाशित किताब का अगला भाग लिख रहे हैं.

क्‍या बवाल की कोई वजह है भी?

यहां उल्लेखनीय है कि इन्हीं पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एम एम नरवणे का एक उपन्यास The Cantonment Conspiracy बीते साल मार्च 2025 में भी रिलीज हो चुका है. उस उपन्यास की मगर कहीं कोई चर्चा तक नहीं हुई. फिर इन्हीं जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब का शोर देश की गलियों से गुजरता हुआ संसद तक कैसे जा पहुंचा? पूछने पर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी ने कहा, “इसी सवाल के जवाब की तलाश में तो मैं हैरत में हूं कि, जो किताब छपी ही नहीं उस पर संसद ठप हो गई. अगर यह किताब छप गई होती तो कोई बवाल ही नहीं मचता. क्योंकि जितना मैंने इस किताब को सोशल मीडिया पर पढ़ा है, और इस किताब के बारे में जानता हूं या सुना है. उसके मुताबिक तो यह एक बेहद सधी हुई संतुलित भाषा शैली वाली निर्विवादित किताब होनी थी.”

दो-दो पूर्व सेनाध्यक्ष गलत कैसे?

लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी के मुताबिक, “हां, इतना मैं और दुनिया समझ चुकी है कि जनरल नरवाणे की किताब का मुद्दा अगर संसद तक न पहुंचाया गया होता, तो इसकी शायद उतनी चर्चा कभी नहीं होता, जितना इस किताब का जिक्र संसद में करके चर्चा हुई है. बेशक मैंने पूरी किताब न पढ़ी हो मगर मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भारत की सेना का प्रमुख बनने तक कोई कोई बिरला ही पहुंच पाता है. जिस किताब की प्रस्तावना (फॉरवर्ड) देश के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने लिखी हो, जो किताब खुद भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष ने लिखी हो, उस किताब पर कोई और प्रश्नचिन्ह भला कैसे लगा सकता है? क्या देश के दो-दो पूर्व सेनाध्यक्ष जिनके हाथों में कभी देश की सेना की बागडोर रही हो, उन्हें इतना भी नहीं पता होगा कि क्या देश और देश की सेना के खिलाफ हो सकता है, का भी ज्ञान न हो. किताब को लेकर मचा या मचाया गया बवाल मुझे तो पॉलिटकिल बवाल लगता है. जिसकी कोई जरूरत ही नहीं थी.”

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गहन जांच क्‍यों है जरूरी?

बकौल पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल सोढ़ी, “इतनी फोकट पब्लिसिटी तो लाखों रुपए खर्च करके प्रकाशित किताब को भी नहीं मिलती है. जितनी पब्लिसिटी घर-बैठे जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब को मिल गई. देख लीजिए आज नहीं तो कल, जब भी किताब बाजार में आएगी तब उसमें ऐसा कुछ नहीं निकलेगा कि जिससे जनरल नरवणे, देश और फौज की अस्मिता पर आंच आ सके. मैं तो कहता हूं कि जनरल नरवणे की किताब में क्या लिखा है क्या नहीं लिखा है. इससे ज्यादा जांच इस बात की होनी चाहिए कि किताब लीक क्यों कब और कहां से किसने किस मकसद से की? ताकि इस किताब पर मचे बे-वजह बवाल की जड़ तो देश और दुनिया को पता चल सके.

आखिर किताब लीक कहां से क्यों हुई?

यह मेरी निजी राय है. मैं अपने विचार किसी पर न तो थोप रहा हूं. न ही मैं किसी और ने इस किताब को लेकर क्या कहा? इसमें कोई इंट्रेस्ट रखता हूं. एक फौजी हूं. और किसी फौजी वह भी देश के पूर्व थलसेनाध्यक्ष या उनकी अप्रकाशित किताब पर ही सवाल लगाकर बे-सिर पैर का बवाल काट दिया जाए, तो पूर्व फौजी होने के नाते मेरी नैतिक जिम्मेदारी है कि मैं इस बवाल की जड़ को समझूं तो सही. अगर यह महज एक पॉलिटिकल स्टंट भर था. जिसका कुछ लोगों ने अपने अपने हिसाब से बेजा इस्तेमाल किया होगा. तो भी मैं दावे से कह सकता हूं कि किसी भी बवाल की जड़ में कम से किताब के लेखक और देश के पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एम एम नरवाने की तो इस तमाशे में कहीं दूर-दूर तक कोई भूमिका नहीं रही होगी. मान लिया जाए कि अनुभवी पूर्व सेनाध्यक्ष और किताब के लेखक जनरल एम एम नरवणे का इस फोकट की पब्लिसिटी में कोई जाने-अनजाने हाथ नहीं रहा होगा, तो सवाल यह तो पैदा होता ही है न कि आखिर किताब लीक कहां से क्यों हुई? स्टेट मिरर हिंदी के सवाल के जवाब में भारतीय थलसेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा, “लीक क्यों हुई? इस सवाल का जवाब पाने के लिए ही तो दिल्ली पुलिस ने मुकदमा दर्ज करके पड़ताल शुरू की है.

ऐसे पता चलेगा ‘लीक’ कैसे हुई

हां, इतना जरूर है कि यह किताब भारत के सेना-मुख्यालय में प्रकाशन की कानूनन-विभागीय अनुमति के लिए जरूर दाखिल हुई है. जहां से किसी भी कीमत पर किताब को लीक करने का जोखिम कोई फौजी अफसर या कारिंदा उठाने की कोशिश नहीं कर सकता है. क्योंकि इस अक्षम्य अपराध की सजा भारत की फौज का हर फौजी जानता है. रही बात और कहां से किताब लीक हो सकती है? तो इस नजर से तो जिन लोगों को इस किताब की पांडुलिपि (कच्ची कॉपी पढ़कर अपने विचार देने को भेजी) भेजी गई और लेखक के अलावा, किसी के पास किताब नहीं है. अप्रकाशित किताब कहां से लीक हुई? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए बस इन्हीं बिंदुओं के आसपास धुरी घूम रही होगी. यह जांच का विषय है मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता हूं. क्योंकि न किताब लीक से मेरा कोई वास्ता है न ही लीक कांड की जांच मैं कर रहा हूं. यह काम दिल्ली पुलिस कर रही है. उसकी जांच से ही इन बिंदुओं के जवाब मिल सकते हैं.”

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