NCERT की 8वीं क्लास की किताब पर क्यों मचा है बवाल? SC बोला, न्यायपालिका को बदनाम करने की नहीं मिलेगी इजाजत

क्लास 8 की नई एनसीईआरटी सोशल साइंस की किताब को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मामलों का जिक्र किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है. मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत किसी को नहीं दी जाएगी.

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Edited By :  समी सिद्दीकी
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NCERT Book Controversy: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कक्षा 8 की नई एनसीईआरटी (NCERT) की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के जिक्र पर कड़ी आपत्ति जताई है. मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इस मामले का स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) लिया और कहा कि वह धरती पर किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं देंगे.

यह मामला उस समय सामने आया जब क्लास 8 की सोशल साइंस की नई एनसीईआरटी किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का जिक्र किया गया. इस के साथ ही किताम में न्याय व्यवस्था के सामने मौजूद अहम चुनौतियों का जिक्र किया गया है.

क्या है पूरा मामला?

  • एनसीईआरटी की जो नई सोशल साइंस की किताब आई है, उसमें एक चैप्टर 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका'है.
  • इस चैप्टर में पहले की तुलना में ज्यादा विस्तार से बताया गया है कि अदालतें कैसे काम करती हैं और लोगों को न्याय कैसे मिलता है. इसके साथ ही इसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का भी जिक्र है.
  • पहले की किताबों में अदालतों की संरचना और भूमिका पर ज्यादा ध्यान दिया गया था. लेकिन नई किताब में एक हिस्से में न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार के मुद्दे और इसका न्याय तक पहुंच पर पड़ने वाले असर को समझाया गया है.
  • किताब में लिखा गया है कि लोग न्यायपालिका के अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं गरीब और वंचित लोगों के लिए इससे न्याय तक पहुंच की समस्या और बढ़ सकती है. इसलिए राज्य और केंद्र स्तर पर न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ाने और पारदर्शिता लाने की कोशिश लगातार की जा रही है.
  • इस चैप्टर में अदालतों में लंबित मामलों के आंकड़े भी दिए गए हैं. इसमें बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट में करीब 81 हजार मामले लंबित हैं. हाई कोर्टों में लगभग 62.40 लाख मामले लंबित हैं. वहीं जिला और अधीनस्थ अदालतों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं.
  • किताब में कहा गया है कि न्याय व्यवस्था में अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार एक बड़ी चिंता का विषय है. साथ ही लंबित मामलों की भारी संख्या को भी न्याय देने में बड़ी बाधा बताया गया है.
  • किताब में जजों की कमी को देरी का एक प्रमुख कारण बताया गया है. इसके अलावा जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और अदालतों में पर्याप्त बुनियादी ढांचे की कमी भी देरी की वजह बताई गई है.
  • चैप्टर में यह भी बताया गया है कि जजों को अपने पेशेवर और निजी आचरण के लिए आचार संहिता का पालन करना होता है. न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही के आंतरिक तंत्र का भी जिक्र किया गया है.
  • इसके साथ ही यह जानकारी दी गई है कि नागरिक सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रिवेंस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (CPGRAMS) के जरिए शिकायत दर्ज करा सकते हैं.
  • किताब के अनुसार, वर्ष 2017 से 2021 के बीच न्यायपालिका से जुड़ी 1,600 से अधिक शिकायतें इस शिकायत प्रणाली के जरिए हासिल हुई थीं.

कोर्ट ने इस मामले में क्या कहा?

  • मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने इस पूरे घटनाक्रम को गहराई तक जड़ जमाए हुआ बताया. उन्होंने कहा कि यह एक “सोचा-समझा और जानबूझकर उठाया गया कदम” लगता है.
  • वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात तो की गई है, लेकिन नौकरशाही या राजनीति जैसे अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का कहीं जिक्र नहीं है. उनके मुताबिक, इस बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा गया है.
  • इस पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान की मूल संरचना में जिस संवैधानिक नैतिकता की कल्पना की गई है, वह यहां नजर नहीं आ रही है.
  • मुख्य न्यायाधीश ने दोहराते हुए कहा कि मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि हम इस मामले में उचित कदम उठाएंगे.
  • इस दौरान उन्होंने कहा कि वह धरती पर किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं देंगे.

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