मुस्लिमों और दलितों पर भेदभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट जज की तीखी टिप्पणी, बोले– 75 साल बाद भी समाज में दरारें कायम

सुप्रीम कोर्ट के जज ने मुस्लिमों और दलितों के खिलाफ जारी भेदभाव पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि संवैधानिक नैतिकता को लोकप्रिय या बहुसंख्यक सोच से ऊपर रखना होगा.

( Image Source:  sci.gov.in )
Edited By :  प्रवीण सिंह
Updated On :

भारत को आज़ाद हुए 75 साल से ज़्यादा हो चुके हैं, लेकिन समाज के भीतर मौजूद गहरी दरारें अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. इसी कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्जल भुइयां ने कहा है कि देश में मुस्लिमों और दलितों के खिलाफ भेदभाव आज भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बना हुआ है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि “संवैधानिक नैतिकता” को हर हाल में “लोकप्रिय या बहुसंख्यक नैतिकता” से ऊपर रखा जाना चाहिए.

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां 21 फरवरी को हैदराबाद में आयोजित एक सेमिनार को संबोधित कर रहे थे. इस कार्यक्रम का आयोजन तेलंगाना जजेज़ एसोसिएशन और तेलंगाना स्टेट ज्यूडिशियल अकादमी की ओर से किया गया था. अपने भाषण में उन्होंने साफ कहा कि व्यक्तिगत नैतिकता या समाज में प्रचलित सोच कई बार संविधान द्वारा तय मानकों से टकराती है.

  1. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्जल भुइयां ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता को हर स्थिति में सार्वजनिक या लोकप्रिय नैतिकता से ऊपर रखा जाना चाहिए, चाहे वह बहुसंख्यक समाज की सोच ही क्यों न हो.
  2. उन्होंने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत या समाज में प्रचलित नैतिकता अक्सर संविधान द्वारा तय मूल्यों से टकराती है और यही टकराव धर्म, जाति और पहचान के आधार पर भेदभाव को जन्म देता है.
  3. जज ने कहा कि आज़ादी के 75 साल बाद भी समाज में गहरी दरारें मौजूद हैं, जो यह साबित करती हैं कि कानूनी समानता के बावजूद सामाजिक समानता अभी पूरी तरह हासिल नहीं हो सकी है.
  4. दिल्ली में मुस्लिम छात्रा को नाम के आधार पर मकान न मिलने की घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह भेदभाव की समस्या का सिर्फ “हिमखंड का सिरा” है.
  5. ओडिशा में दलित महिला द्वारा बनाए गए भोजन को बच्चों द्वारा न खाने देने की घटना समाज में जातिगत भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका सीधा उदाहरण है.
  6. उन्होंने 2009 के नाज़ फाउंडेशन मामले का हवाला देते हुए कहा कि लोकप्रिय नैतिकता को मौलिक अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता और राज्य को संविधान के अनुसार ही काम करना होगा.
  7. न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि किसी समुदाय के प्रति समाज की नापसंदगी या असहमति, संविधान प्रदत्त अधिकारों को सीमित करने का वैध आधार नहीं बन सकती.
  8. उनके अनुसार संवैधानिक नैतिकता लोकतांत्रिक संस्थाओं को यह सिखाती है कि वे संख्या, शक्ति और सत्ता के बल पर मनमानी न करें, बल्कि मूल संवैधानिक मूल्यों का पालन करें.
  9. उन्होंने जिला अदालतों के न्यायाधीशों से अपील की कि वे बहुसंख्यक सोच या दबाव से प्रभावित हुए बिना केवल संविधान और कानून के प्रति निष्ठावान रहकर फैसले सुनाएं.
  10. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज थर्गुड मार्शल का उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश की असली शक्ति जनता का विश्वास है, जो स्वतंत्रता और संविधान के प्रति ईमानदारी से अर्जित होता है.

Similar News