सुनेत्रा पवार बनीं महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम, सीएम देवेंद्र फडणवीस की ऐसी क्या मजबूरी?

अजित पवार के निधन के तीन दिन बाद सुनेत्रा पवार का महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनना केवल सहानुभूति का फैसला नहीं था. इसके पीछे महायुति सरकार की मजबूरी, एनसीपी के संभावित विलय का डर, शरद पवार से दूरी, जांच एजेंसियों का साया और सत्ता संतुलन की रणनीति छिपी है.;

( Image Source:  ANI )
Edited By :  नवनीत कुमार
Updated On : 31 Jan 2026 8:01 PM IST

महाराष्ट्र की राजनीति में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि निजी शोक और सत्ता का फैसला इतनी तेजी से एक-दूसरे में गुथ गए हों. दिवंगत उपमुख्यमंत्री Ajit Pawar के विमान हादसे में निधन के महज तीन दिन बाद उनकी पत्नी Sunetra Pawar का उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेना सिर्फ संवेदनात्मक फैसला नहीं था. यह एक सोची-समझी राजनीतिक चाल थी, जिसमें सत्ता संतुलन, पार्टी अस्तित्व और गठबंधन की मजबूरियां शामिल थीं. यही वजह है कि यह फैसला जितना भावनात्मक दिखा, उतना ही रणनीतिक भी था.

सुनेत्रा पवार का महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक क्षण है, लेकिन इसके मायने सिर्फ लैंगिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं हैं. यह संदेश भी है कि अजित पवार गुट सत्ता में निरंतरता चाहता है. राकांपा (NCP) विधायक दल का नेता चुने जाने और राज्यसभा सदस्यता छोड़ने के फैसले ने साफ कर दिया कि यह ताजपोशी अस्थायी नहीं, बल्कि सत्ता की धुरी को वहीं बनाए रखने की कोशिश है.

देवेंद्र फडणवीस की ‘मजबूरी’ क्या थी?

मुख्यमंत्री Devendra Fadnavis के लिए यह फैसला समर्थन से ज्यादा मजबूरी का था. महायुति सरकार की स्थिरता अजित पवार गुट पर टिकी थी; उनके अचानक निधन से सरकार का संतुलन बिगड़ सकता था. ऐसे में सुनेत्रा पवार को आगे बढ़ाना गठबंधन को टूटने से बचाने का सबसे तेज और सुरक्षित रास्ता था. भले ही वित्त विभाग अपने पास रखकर शक्ति-संतुलन साधना पड़ा.

महायुति का गणित: कुर्सी से ज्यादा संख्या

महायुति में BJP, शिंदे गुट और राकांपा (अजित गुट) की संख्या-राजनीति अहम है. अजित पवार के बिना राकांपा विधायकों के टूटने का खतरा था. सुनेत्रा पवार को नेतृत्व देकर यह संदेश गया कि गुट एकजुट है और सत्ता में हिस्सेदारी सुरक्षित है. यही महायुति के लिए सबसे जरूरी था.

पवार परिवार का संतुलन

पवार परिवार की राजनीति में विरासत हमेशा निर्णायक रही है. सुनेत्रा पवार का आगे आना सहानुभूति के साथ-साथ परिवार की पकड़ बनाए रखने का तरीका भी है. राज्यसभा की खाली सीट पर पार्थ पवार की संभावित एंट्री से यह साफ है कि परिवार सत्ता और संगठन दोनों मोर्चों पर निरंतरता चाहता है.

शरद पवार को ‘आउट ऑफ लूप’ क्यों रखा गया?

एनसीपी के संस्थापक Sharad Pawar को इस फैसले से दूर रखना कोई संयोग नहीं था. अजित गुट के नेता जानते थे कि अगर सीनियर पवार प्रक्रिया में आए, तो शर्तें बदल सकती हैं. यही वजह है कि विधायक दल का नेता चुनने से लेकर शपथ तक की प्रक्रिया बेहद तेज रखी गई ताकि ‘वीटो पावर’ से बचा जा सके. 

विलय का डर और अस्तित्व की राजनीति

सूत्रों के मुताबिक अजित गुट और शरद पवार गुट के संभावित विलय की चर्चाएं चल रही थीं. अजित पवार के बिना विलय होने पर गुट की पहचान खत्म हो सकती थी. सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम बनाकर गुट ने यह सुनिश्चित किया कि सत्ता में उनका ‘एंकर’ बना रहे भले ही विलय की आंधी चले.

जांच एजेंसियों का साया

महायुति में बने रहने से कई नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों की जांच से राहत मिली है. शरद पवार का बीजेपी से दूरी का रुख जगजाहिर है. ऐसे में सत्ता से बाहर जाना सिर्फ राजनीतिक नहीं, कानूनी जोखिम भी बढ़ाता. सुनेत्रा पवार की ताजपोशी सत्ता और सुरक्षा दोनों की गारंटी के रूप में देखी जा रही है.

कमजोर नेतृत्व या नियंत्रित कमान?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुनेत्रा पवार अपेक्षाकृत नई हैं, जिससे सहानुभूति तो मिलती है, पर संगठन पर ‘रिमोट कंट्रोल’ अनुभवी नेताओं के हाथ में रहता है. वित्त विभाग का सीएम के पास रहना भी इसी संतुलन का हिस्सा है ताकि सत्ता का वास्तविक केंद्र नियंत्रित रहे.

स्टॉप-गैप या दीर्घकालिक दांव?

क्या यह सिर्फ अस्थायी व्यवस्था है? जवाब समय देगा. फिलहाल यह साफ है कि यह फैसला महायुति की स्थिरता, अजित गुट के अस्तित्व और पवार परिवार की राजनीतिक निरंतरता तीनों को साधने का प्रयास है. जैसे-जैसे विलय की चर्चाएं आगे बढ़ेंगी, सुनेत्रा पवार की भूमिका सिर्फ प्रतीक रहेगी या निर्णायक बनेगी. यही महाराष्ट्र की राजनीति का अगला अध्याय तय करेगा.

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