कर्तव्य पथ पर खामोश कदमों की गर्जना: ‘साइलेंट वॉरियर्स’ लिखेंगे गणतंत्र दिवस 2026 की नई कहानी, दिखेगा अचंभित करने वाला करतब

Republic Day 2026: आजाद भारत के इतिहास में पहली बार बड़े पैमाने और व्यवस्थित तरीके से कर्तव्य पथ पर 'साइलेंट वॉरियर्स' का करबत देखने को मिलेगा. इस दल में शामिल ऊंट, देसी कुत्ते और जांस्कर टट्टू न केवल मार्च बल्कि अचंभित करने वाला नजारा पेश करेंगे.;

By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 8 Jan 2026 3:57 PM IST

Republic Day 2026 Silent Warriors: रिपब्लिक डे 2026 पर कर्तव्य पथ एक बार फिर देशभक्ति, पराक्रम और परंपरा का साक्षी बनने जा रहा है. इस बार यह नजारा कुछ अलग और बेहद खास होगा. पहली बार बड़े पैमाने पर गणतंत्र दिवस परेड में ‘साइलेंट वॉरियर्स’ का मार्च होगा. ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ. यहां पर ‘साइलेंट वॉरियर्स’  का मतलब उन योद्धाओं से है जो सीमाओं पर खामोशी से देश की रक्षा करते हैं. ऊंट दस्ते के साथ-साथ आर्मी डॉग्स और लद्दाख के दुर्गम इलाकों में तैनात जांस्कर टट्टू पहली बार अहम भूमिका निभाएंगे.

गणतंत्र दिवस यानी 26 जनवरी को 'साइलेंट वॉरियर्स' चौंकाने वाला नजारा देखने को मिलेगा. देश भर के लोगों को यह नजारा इससे पहले भी देखने को नहीं मिला है. इस दल में दो बैक्ट्रियन ऊंट, चार जांस्कर टट्टू, चार रैप्टर, दस भारतीय नस्ल के आर्मी कुत्ते और सेना की सेवा मौजूद छह पारंपरिक मिलिट्री कुत्ते शामिल होंगे. गणतंत्र दिवस पर भारत एक दुर्लभ और अचंभित करने वाला नजारा दिखेगा. जब भारतीय सेना के जानवर कर्तव्य पथ पर गर्व से मार्च करेंगे, जो सहनशक्ति, बलिदान और भारत की अनोखी ऊंची-ऊंचाई वाली सैन्य क्षमता का प्रतीक होगा.

कहने का मतलब है कि भारतीय सेना के रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स (RVC) के जानवरों का एक खास दल दिखाया जाएगा, जो देश की सबसे चुनौतीपूर्ण सीमाओं की सुरक्षा में जानवरों द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका का खुलासा करेगा. इस दल में दो बैक्ट्रियन ऊंट, चार जांस्कर टट्टू, चार रैप्टर, दस भारतीय नस्ल के आर्मी कुत्ते शामिल होंगे. साथ ही पहले से सेवा में मौजूद छह पारंपरिक मिलिट्री कुत्ते शामिल कुत्ते भी देखने को मिलेगा.

गणतंत्र दिवस 2026 पर जब जानवरों का दल कर्तव्य पथ पर सलामी मंच के सामने से गुजरेगा, तो यह एक मार्मिक याद दिलाएगा कि भारत की रक्षा शक्ति केवल मशीनों और सैनिकों से ही नहीं बनी है. सियाचिन की बर्फीली ऊंचाइयों से लेकर लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानों और आपदा प्रभावित नागरिक क्षेत्रों तक, इन जानवरों ने चुपचाप कर्तव्य, साहस और बलिदान का बोझ साझा किया है.

साइलेंट वॉरियर्स’ कौन?

भारतीय सेना के 'साइलेंट वॉरियर्स' यानी सेना के जानवरों का दस्ता है. इनका अचंभित करने वाला करतब और बड़े पैमाने पर बतौर मार्च पास्ट व्यवस्थित प्रदर्शन आजाद भारत में पहली बार 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के मौके पर कर्तव्य पथ पर दिखेगा. इस दस्ते में लद्दाख में हाल ही में तैनात किए गए बैक्ट्रियन ऊंट, सियाचिन जैसे ऊंचे इलाकों में इस्तेमाल होने वाले जांस्कर टट्टू, निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले शिकारी पक्षी और आतंकवाद विरोधी अभियानों, बम का पता लगाने, खोज और बचाव और आपदा राहत में इस्तेमाल होने वाले प्रशिक्षित सेना के कुत्ते शामिल होंगे.

ये ‘साइलेंट वॉरियर्स’ उन सैनिकों और सहायक बलों का प्रतीक हैं, जो बिना किसी प्रचार के देश की सीमाओं पर हर परिस्थिति में तैनात रहते हैं. रेगिस्तान में ऊंटों के साथ गश्त, बर्फीले पहाड़ों में जांस्कर टट्टुओं की मदद और आतंक और खोज अभियानों में प्रशिक्षित आर्मी और देसी डॉग्स इस में शामिल हैं. केंद्र सरकार ने इन अनाम नायकों को सम्मान देने के लिए गणतंत्र दिवस पास्ट का फैसला लिया है.

ये साइलेंट वॉरियर्स न केवल सहयोगी के रूप में बल्कि चार पैरों वाले योद्धाओं के रूप में भी मार्च करते हैं, जो लचीलेपन, वफादारी और सभी परिस्थितियों में राष्ट्र की रक्षा करने के भारतीय सेना के अटूट संकल्प के प्रतीक हैं.

आत्मनिर्भर भारत की पहचान

साइलेंट वॉरियर्स भारतीय सेना के ऑपरेशनल इकोसिस्टम में परंपरा, नवाचार और आत्मनिर्भरता की पहचान बनकर सामने आए हैं. इस दल का नेतृत्व मजबूत बैक्ट्रियन ऊंट करेंगे, जिन्हें हाल ही में लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानों में ऑपरेशन के लिए शामिल किया गया है. अत्यधिक ठंड, पतली हवा और 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई के लिए पूरी तरह से अनुकूल, ये ऊंट 250 किलोग्राम तक का भार उठा सकते हैं. कम से कम पानी और चारे के साथ लंबी दूरी तय कर सकते हैं.

लद्दाख के जांस्कर टट्टू भी करेंगे 'मार्च'

गणतंत्र दिवस परेड में साइलेंट वॉरियर्स के शामिल होने से रेतीले इलाकों और खड़ी ढलानों पर वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ लॉजिस्टिकल सपोर्ट और घुड़सवार गश्त क्षमता में काफी वृद्धि हुई है. उनके साथ जांस्कर टट्टू मार्च करेंगे. जांस्कर टट्टू लद्दाख की एक दुर्लभ और स्वदेशी पहाड़ी नस्ल है. अपने छोटे कद के बावजूद, ये टट्टू असाधारण सहनशक्ति के लिए जाने जाते हैं, जो 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर और माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक गिरने वाले तापमान में 40 से 60 किलोग्राम भार लंबी दूरी तक ले जा सकते हैं. 2020 में शामिल होने के बाद से, उन्होंने सियाचिन ग्लेशियर सहित कुछ सबसे कठिन इलाकों में सेवाएं दी हैं.

घुड़सवार गश्त में अहम भूमिका

लॉजिस्टिक्स से परे, जांस्कर टट्टू घुड़सवार गश्त में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. कभी-कभी एक ही दिन में 70 किलोमीटर तक की दूरी तय करते हैं और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं.

'साइलेंट वॉरियर्स' दल में चार रैप्टर भी शामिल होंगे, जिनका उपयोग बर्ड-स्ट्राइक नियंत्रण और निगरानी के लिए किया जाता है, जो ऑपरेशनल सुरक्षा और प्रभावशीलता के लिए प्राकृतिक क्षमताओं के सेना के अभिनव उपयोग का प्रतीक है.

RVC सेंटर मेरठ में तैयार होते हैं 'साइलेंट वॉरियर्स'

RVC सेंटर और कॉलेज, मेरठ में रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स द्वारा पाले, प्रशिक्षित और तैयार किए गए ये कुत्ते आतंकवाद विरोधी अभियानों, विस्फोटक और खदानों का पता लगाने, ट्रैकिंग, गार्डिंग, आपदा प्रतिक्रिया और खोज और बचाव अभियानों में सैनिकों का समर्थन करते हैं.

पिछले कुछ दशकों में, आर्मी कुत्तों और उनके हैंडलर्स ने असाधारण बहादुरी दिखाई है और युद्ध और मानवीय अभियानों में साहस के कार्यों के लिए वीरता पुरस्कार और प्रशंसा पत्र अर्जित किए हैं.

सेना में इन नस्लों के कुत्ते की भी एंट्री

आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के विजन के तहत, सेना ने तेजी से मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बई और राजापलायम जैसी स्वदेशी कुत्तों की नस्लों को शामिल किया है. कर्तव्य पथ पर उनकी उपस्थिति रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत के प्रयास और विशेष सैन्य भूमिकाओं में देशी नस्लों के सफल एकीकरण को रेखांकित करेगी.

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