नेहरू का 1961 का लेटर बना मुद्दा! निशिकांत दुबे ने शेयर किया पोस्ट, आखिर किस बात का इशारा कर रहे BJP सांसद?

संसद में किताबों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नेहरू के पुराने खत तक पहुंच गया है. बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने पत्र शेयर कर कांग्रेस पर निशाना साधा, जिससे सियासी संग्राम और तेज हो गया.;

( Image Source:  ANI & X/nishikant_dubey )
Edited By :  नवनीत कुमार
Updated On : 4 Feb 2026 8:30 PM IST

भारतीय संसद में शुरू हुआ किताबों का विवाद अब खुलकर राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है. शुरुआत उस वक्त हुई जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख की किताब का हवाला देते हुए सरकार को घेरने की कोशिश की. इसके जवाब में सत्ता पक्ष की ओर से भी किताबों और दस्तावेजों का जिक्र शुरू हुआ, जिससे बहस और तीखी हो गई.

इस पूरे विवाद में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने अलग रणनीति अपनाई. उन्होंने गांधी परिवार से जुड़ी किताबों का हवाला देते हुए कांग्रेस पर पलटवार किया. इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की, जिसमें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का एक पुराना पत्र सामने रखा गया.

ज्यादा बोलेंगे तो बड़ा विवाद हो जाएगा

दुबे ने नेहरू के इस पत्र को शेयर करते हुए लिखा कि अगर वह इस मुद्दे पर ज्यादा बोलेंगे तो बड़ा विवाद खड़ा हो जाएगा. इस पोस्ट के जरिए उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधने की कोशिश की और संकेत दिया कि नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े कई ऐसे पहलू हैं, जिन्हें लेकर राजनीतिक बहस छिड़ सकती है.

नेहरू का 1961 का पत्र क्या कहता है?

बीजेपी सांसद के पोस्ट के मुताबिक, जवाहरलाल नेहरू 30 जनवरी, 1961 को एक लेटर लिखते हैं. इसमें वो कहते हैं, “माय डियर करिअप्पा मुझे आपके 26 और 27 जनवरी के दो खत मिले. यह अच्छी बात होगी अगर आप एडविना माउंटबेटन मेमोरियल फंड की मदद के लिए कोई डांस प्रोग्राम या कोई शो करें लेकिन मुझे डर है कि मैं बैंगलोर में ऐसे किसी शो में शामिल नहीं हो पाऊंगा.”

संसद को प्राथमिकता देने की बात

पोस्ट के मुताबिक, नेहरू आगे लिखते हैं, “संसद का हमारा अगला सेशन फरवरी की शुरुआत में शुरू हो रहा है और मई तक चलेगा. मेरे लिए संसद छोड़कर बैंगलोर में किसी शो में जाना ठीक नहीं होगा. असल में यह सेशन हमारा बजट सेशन है और इसलिए बहुत जरूरी है. मुझे मार्च में कॉमनवेल्थ प्रधानमंत्रियों की मीटिंग में शामिल होने के लिए कुछ समय के लिए लंदन जाना होगा. मैं जितनी जल्दी हो सके संसद में वापस आ जाऊंगा.”

पत्र में और क्या कहा गया?

वो आगे लिखते हैं, “जहां तक AIR द्वारा रानी की खबरें देने की बात है, उन्होंने ऐसी खबरों को काफी अहमियत दी है. अक्सर यह खबर बिल्कुल शुरुआत में होती थी. खैर, कल उनका भारत में आखिरी दिन है और फिर वह पाकिस्तान जाएंगी. वह तीन हफ्ते बाद वापस आएंगी.आपका, जवाहरलाल नेहरू.”

क्यों बदल रही राजनीतिक बहस?

इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि संसद में बहस अब केवल नीतियों या वर्तमान मुद्दों तक सीमित नहीं रही. राजनीतिक दल एक-दूसरे को घेरने के लिए इतिहास, किताबों और निजी दस्तावेजों तक का सहारा ले रहे हैं. इससे राजनीतिक विमर्श का स्वरूप बदलता नजर आ रहा है, जहां तथ्य और व्याख्या दोनों ही राजनीतिक हथियार बन चुके हैं.

और बढ़ेगा यह ‘किताबी विवाद’?

मौजूदा हालात बताते हैं कि यह विवाद जल्दी थमता नहीं दिख रहा. किताबों, पत्रों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के जरिए एक-दूसरे पर हमले जारी रहने की संभावना है. आने वाले दिनों में यह बहस संसद के भीतर ही नहीं, बल्कि चुनावी मंचों और सोशल मीडिया तक फैल सकती है, जिससे राजनीतिक माहौल और गर्माने के आसार हैं.

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