'नेहरू-इंदिरा वाली गलती कर रहे हैं मोदी', नरवणे की न छपी किताब पर बवाल और पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल के भर-भर के खुलासे

एमएम नरवणे की किताब ‘Four Stars of Destiny’ के कुछ कथित अंशों को लेकर संसद में बवाल मचा है. चीन, गलवान और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर सवालों से सियासत गरमा गई है. स्टेट मिरर से बातचीत में पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल अमरदीप त्यागी ने इस मसले पर बेबाक टिप्पणी की है.;

By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 11 Feb 2026 7:30 PM IST

पूर्व आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे की अनपब्लिश्ड पुस्तक 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' को लेकर देशभर की राजनीति में तहलका मचा है. कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी पार्टियां संसद सत्र को ठप रखने पर आमदा हैं. विपक्ष इसे 'अभिव्यक्ति की आजादी' पर हमला बता रहा है. इतना ही नहीं, राहुल गांधी का दावा है कि केंद्र सरकार चीन से डरती है और उसे देश की सुरक्षा की चिंता नहीं है. इसको लेकर माहौल इतना गरमा गया है कि विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए अवश्विास प्रस्ताव का नोटिस भी दे दिया.

आखिर, एक अनपब्लिश्ड बुक को लेकर क्यों मचा है इतना बवाल? वास्तव में नरवणे में अपनी पुस्तक में कुछ ऐसा लिखा है, जो देश की सुरक्षा पर सवाल उठाता है? इस पर स्टेट मिरर हिंदी से बातचीत में पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल अमरदीप त्यागी ने कई बड़े खुलासे किए हैं. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान से जंग हो तो सरकार कांग्रेस की हो या बीजेपी की, सेना को फ्री हैंड देती है, लेकिन जब चीन की बातें आती है तो शीर्ष नेतृत्व चाहे किसी का भी क्यों न हो, वे बगलें झांकने लगता है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ. नेहरू के समय भी यही हुआ, इंदिरा ने भी 1967 में गलती की थी. अब उसी तरह की गलती पीएम मोदी ने की है.

‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ क्या है और विवाद क्यों?

कारगिल वार के दौरान जम्मू में एलओसी पर तैनात रहे लेफ्टिनेंट कर्नल अमरदीप त्यागी ने राष्ट्रीय सुरक्षा और एमएम नरवणे की पुस्तक पर बेबाक टिप्पणी की है. हालांकि, उन्होंने बाचतीत में कहा कि कुछ बातें ऐसी होती हैं, बोलने की नहीं होती, लेकिन जब बात अभिव्यक्ति की आजादी और देश की आन बान की हो तो चुप रहना मुश्किल होता है.

संसद से सड़क तक: विपक्ष क्यों हमलावर?

लेफ्टिनेंट कर्नल के मुताबिक पूर्व आर्मी चीफ द्वारा लिखित पुस्तक 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' अभी प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट और आंतरिक स्रोतों से सूचना हासिल कर राहुल गांधी व अन्य विपक्षी दलों ने इसे बड़ा बना दिया है. ईस्ट लद्दाख, गलवान घाटी और 29 से 31 अगस्त 2020 को भारत-चीन सीमा बॉर्डर पर क्या हुआ, को लेकर मसला उतना गंभीर नहीं है, जितना इसे बना दिया गया है. मोदी सरकार की गलती सिर्फ यह है कि उन्होंने सेना को देर से 'जो करना है करो' की सूचना दी. उस समय केंद्र सरकार का रवैया ठीक वैसा था, जैसे कि वार जैसी स्थिति में आर्मी चीफ के हाथ में कोई 'हॉट पोटैटो' थमा दिया हो. ऐसे में कोई भी आर्मी चीफ क्यों न हो, हतप्रभ हो सकता है. खासकर, उस स्थिति में जब वो देश के शीर्ष नेतृत्व से आदेश के लिए घंटों बार-बार फोन लगा चुका हो.

 

सैन्य सलाह बनाम राजनीतिक निर्णय: असली मुद्दा क्या है?

देश के टॉप लीडरशिप और सेना के बीच संबंधों को लेकर लेफ्टिनेंट कर्नल बताते हैं, वर्तमान समय और पहले के समय में फर्क आ गया है. आज के दौर में राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच ​केवल औपचारिक संबंध रह गए हैं. पहले ये संबंध अनौपचारिक भी होते थे. अलग-अलग मसलों पर सेना के टॉप अधिकारी या फिर राष्ट्रपति, पीएम और रक्षा मंत्री अचानक कॉल कर भी हॉट लाइन या तय स्थान पर बात कर लिया करते थे. इस दौरान कई मसलों पर पेशेवर तरीके से बातचीत के साथ अनौपचारिक बातें भी होती थीं. सभी खुलकर अपना पक्ष रखते थे. पहले बातचीत में किसी मसले पर मतभेद होने पर मामला विवाद तक नहीं पहुंचता था. अब मतभेद को गलत तरीके से लिया जाता है. वह सोशल मीडिया में छा जाता है. विपक्षी दल भी मसले को जरूरत से ज्यादा तूल दे देते हैं. संसद सत्र को ठप कर दिया जाता है. तरह-तरह के निगेटिव नैरेटिव गढ़े जाते हैं, जिससे माहौल खराब होता है और सरकार पर सवाल उठते हैं.

इतिहास के आईने में: 1971, 1967 और ऑपरेशन पराक्रम

लेफ्टिनेंट कर्नल अमरदीप त्यागी ने कहा कि सेना और टॉप लीडरशिप में अहम मुद्दों पर भ्रम की स्थिति या मतभेद कोई नया मसला नहीं है. भारत-पाक युद्ध 1971 का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, उस समय जनरल मानेकशॉ और तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के बीच भी मतभेद हुए थे. मानेकशॉ ने पाकिस्तान से वार के मसले पर सरकार की ओर से अंतिम फैसला सुनाने को कहा था. इस पर इंदिरा गांधी ने कहा था, इसमें मैं क्या करूं. आपको जो करना है करो. मूव कीजिए. इस पर मानेकशॉ ने कहा था, मैम, क्या आप सेना के 'मूव' का मतलब जानती है. उन्होंने कहा मूव का मतलब होता है 'ओपन वार' यानी पाकिस्तान के साथ फायर खोलना. कोई भी 'वार' ऐसे नहीं लड़ा जाता. इसके लिए सेना को तैयारी करनी होती है. हमें समय चाहिए. इसे इंदिरा गांधी ने अहम का मसला नहीं बनाया था. उन्होंने मानेकशॉ से कहा था कि आप अपना समय ​लीजिए, पर जो करना है, कीजिए.

 

इसके बाद, मानेकशॉ ने कहा था कि इसमें मैं सियासी हस्तक्षेप नहीं चाहता. इंदिरा ने भी कहा था, आप फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं. अगर, आज कोई आर्मी चीफ राजनीतिक नेतृत्व से ऐसा कह दे, तो बवाल हो जाएगा. उसकी नौकरी जा सकती है. एक जमाने देश के राष्ट्रपति तक कई मसलों पर खुलकर ऐसे चर्चा करते थे. ठीक वैसे ही जैसे कि दो दोस्त आपस में करते हैं. अब बातचीत काफी कंप्लीकेटेड और फॉर्मल हो गई है.

गलवान, ईस्ट लद्दाख और 31 अगस्त 2020 की रात क्या हुआ था?

अब किसी जनरल की हिम्मत नहीं है, वो ऐसा जवाब दे दे. उन्होंने साल 2001 में संसद पर हुए हमले का जिक्र करते हुए कहा कि पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने सेना से पाकिस्तान पर हमला करने के लिए जरूरी तैयारी करने का आदेश दिया था. भारत पाकिस्तान सीमा पर 10 महीने तक आर्मी चीफ ने फौज को बैठाए रखा. आपरेशन पराक्रम शुरू होना था. पाकिस्तान पर अटैक का प्लान था. सेना तैयार थी. 10 महीने तक फौज सीमा पर बैठी रही. माइन को लगाने और हटाने में कई सैनिकों की मौत तक हो गई. और बड़ी संख्‍या में सिविलियन भी मरे.

जब वार शुरू करने का वक्त आया तो शीर्ष नेतृत्व पलट गया. आखिरी मौके पर कहा गया, 'लड़ाई नहीं होगी.' जबकि उस समय टू कोर कमांडर अंबाला कैंट में सेना को आक्रामक पोस्चर का आदेश दे चुके थे. सेना बॉर्डर पर पहुंच गई थी. इस बीच हुआ ये था कि अमेरिकन सेटेलाइट ने सेना की इन तैयारियों को भांप लिया था. ठीक उसी समय तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाडीस अमेरिकी दौरे पर थे. अमेरिका ने दबाव डाला. दबाव में आकर वाजपेयी सरकार ने पाकिस्तान पर हमले को रोक दिया. पहले देश की सुरक्षा के मसले पर इतना हो जाता था, न तो राजनीति होती थी, न ही शीर्ष नेतृत्व बात का बतंगड़ बनाते थे, न ही सेना ऐसा करती थी.

चीन का नाम आते ही शीर्ष नेतृत्‍व को सांप सूंघ जाता है

उन्होंने राहुल गांधी द्वारा नरवणे की पुस्तक पब्लिश न होने के बावजूद तथाकथित रूप से उसमें शामिल मुद्दों को उठाने के मसले पर कहा, 'जब से मोदी जी आए हैं, सारी कमांड उनके हाथ में है. सबकुछ वही तय करते हैं. 'ऑपरेशन सिंदूर' नाम किसने तय किया था. क्या आपको लगता है कि सेना अपने मुहिम का नाम 'ऑपरेशन सिंदूर' रखेगी. पीएम माइक्रो लेवल तक दखल रखते हैं. साल 2020 में पूर्वी लद्दाख और गलवान एरिया में दो कारणों से मामला बिगड़ा. पहला दोनों देशों के बीच कॉन्ट्रैक्ट था कि कोई हथियार नहीं चलाएगा. दूसरा, देश का राजनीतिक नेतृत्व पाकिस्तान के खिलाफ तो मोर्चा खोलने के लिए तैयार रहता है, लेकिन चीन का नाम आते ही सांप सूंघ जाता है. ज​बकि सेना लड़ने के लिए तैयार थी.

31 अगस्त की रात को जब चीनी सेना वार के मकसद से भारतीय सीमा की ओर आगे बढ़ रही थी, तो आर्मी चीफ को घंटों तक इंतजार कराने के बाद रक्षा मंत्री ने रात के 10 बजे कह दिया, 'पीएम मोदी जी से बात हो गई है. आप जो करना चाहो करो.' तब तक तो चीनी टैंक आपके दरवाजे तक पहुंच चुके थे. सेना को लास्ट मिनट यह क्यों कहा गया? ऐसे में नरवणे की हालात हाथ में हॉट पोटैटो थमाने जैसी हो गई थी. सरकार ने फैसला लेने में देर कर दी. उसी मसले को आंतरिक स्रोतों से जानकारी मिलने के बाद राहुल गांधी सियासी रूप से कैश कर रहे हैं. अब एमएम नरवणे की किताब में इसकी चर्चा है या नहीं, ये तो वही बताएंगे. या फिर उनका सोर्स क्या है ये राहुल गांधी बताएंगे. जहां तक मुझे लगता है आर्मी चीफ ने इसकी चर्चा किसी सियासी लीडर से की होगी.

लेफ्टिनेंट कर्नल ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, यहां पर इस बात का भी जिक्र कर दें कि किसी भी देश के साथ वार की घोषणा आर्मी चीफ नहीं करता. इसका फैसला राजनीतिक नेतृत्व को लेना होता है. आजादी के बाद से देश को कोई पीएम चीन के साथ युद्ध नहीं चाहता. परदे के पीछे हकीकत यही है. ऐसा हार के डर की वजह से हिम्मत न कर पाने के कारण होता है. कोई भी सियासी नेतृत्व हार का सामना कर डि​सक्रेडिट नहीं होना चाहता. पीएम मोदी ने 2020 में जो गलती ​की, वही गलती 1967 में इंदिरा गांधी ने की थी. उन्होंने चीनी हमले के बावजूद नाथूला और जलेप ला में वही किया था.

 

जलेप ला और नाथुला में क्‍या हुआ था?

त्‍यागी ने कहा कि एक सैन्य अधिकारी ने दिल्ली के आदेश पर जलेप ला खाली कर दिया था, हालांकि उन्‍होंने उस अधिकारी का नाम नहीं बताया. वहीं, नाथूला दर्रे मोर्चे पर मेजर जनरल सगत सिंह राठौर ने तत्कालीन पीएम को ऐसा करने से इनकार कर दिया था. जबकि उन्हें भी कहा गया था कि पीछे हट जाओ. लेकिन उन्होंने एसओपी के आधार पर चीन के खिलाफ मार्चो खोल दिया था. वहीं, जलेप ला में चीन ने फॅायर खेाल दिया था. फायर खोलना मतलब युद्ध की घोषणा. पीएमओ से सगत सिंह को ऐसा करने का आदेश नहीं था. उन्होंने विदाउट ऑर्डर चीन के खिलाफ फायर खोल दिया था. उनसे पूछा गया कि ऐसा किसके आदेश पर ऐसा आपने किया? उन्होंने जवाब दिया था डेड सोलजर ने ऑर्डर दिया था. मैंने खोल दिया. पीएम ने उस समय सख्त नाराजगी जाहिर की थी. कहा गया था था दो न्यूक्लियर पावर देश के बीच ऐसा करने का मतलब आप समझते हैं. 2020 में भी हालात वही थे. सरकार नहीं चाहती थे कि चीन के साथ युद्ध की नौबत आए. सरकार को यही स्टैंड लेना था, तो विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन के विदेश मंत्री से हॉट लाइन पर बात, उसी समय क्यों नहीं की?

जूनियर जनरल को क्‍यों बनाया गया CDS?

1971 में क्या हुआ? बांग्लादेश को आजादी दिलाने में इंदिरा ने अहम भूमिका निभाई. लेकिन नैरेटिव क्या बना? यही न कि मैदान में भारत जंग जीत गया, पर टेबल पर हार गया. वर्तमान सरकार की भी सेना के साथ अग्निवीर, सीडीएस की नियुक्ति, चीन के साथ वार खोलना है या नहीं, सैन्य तैयारी जैसे मसलों को लेकर मतभेद उभरे थे. बावजूद इसके सैन्य प्रमुख ने कभी सरकार से कोई असहमति नहीं जताई. ऐसा इसलिए कि वो सैन्य प्रमुख के पेशेवर काम का तरीका था. उन्होंने ये भी कहा कि जनरल विपिन रावत के हादसे में निधन के बाद एमसम नरवणे को सीडीएस क्यों नहीं बनाया गया? सरकार ने एक साल तक इंतजार क्यों किया? उनके रिटायरमेंट के बाद अनिल चौहान को सीडीएस बनाया गया, जबकि वो नरवणे के सामने काफी जूनियर जनरल थे.

CDS नियुक्ति और सैन्य नेतृत्व पर सवाल

अमरदीप त्यागी का कहना है कि किसी राष्ट्र की ताकत नारेबाजी या दिखावे से नहीं, बल्कि कड़वी सच्चाइयों को सुनने की क्षमता से तय होती है. खासतौर पर उन लोगों से जो उसकी रक्षा के लिए जिम्मेदार हैं. दुर्भाग्यवश, आज भारत में यही क्षमता कमजोर पड़ती दिखाई देती है. इतिहास गवाह है कि जब राजनीतिक सत्ता पेशेवर सैन्य सलाह का सम्मान करती है, तभी निर्णायक परिणाम निकलते हैं. फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ इसलिए सफल हुए क्योंकि उनमें सत्ता को सच कहने का साहस था. उतनी ही अहम थीं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, जिन्होंने परिपक्वता दिखाई, सेना पर भरोसा किया और सैन्य मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचीं. परिणाम ऐतिहासिक और निर्णायक रहा. आज वह परंपरा लगभग समाप्त होती दिख रही है.

क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल है?

देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला न तो केवल एक किताब का है और न ही एक व्यक्ति का. यह लोकतंत्र में ईमानदार सैन्य सलाह के लिए सिकुड़ती जगह का सवाल है.

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