मिडिल ईस्ट वॉर ने इंडिया को कितना बदला, क्या न्यूट्रल से 'Power Player' बन गया भारत? Expert की राय
मिडिल ईस्ट वॉर के बीच भारत की विदेश नीति में बड़ा बदलाव दिख रहा है. क्या गुटनिरपेक्ष भारत अब मल्टी-अलाइनमेंट के जरिए ‘Power Player’ बन गया है? जानिए क्या कहते हैं प्रोफेसर संगीत रागी?
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने एक बार फिर भारत की विदेश नीति की असली परीक्षा ली है. एक तरफ भारत के गहरे रणनीतिक और आर्थिक संबंध इजरायल के साथ हैं, तो दूसरी ओर ऊर्जा और प्रवासी भारतीयों के लिहाज से ईरान और खाड़ी देशों से भी मजबूत जुड़ाव है. ऐसे जटिल समीकरणों के बीच नरेंद्र मोदी सरकार ने जिस संतुलित रुख को अपनाया है, वह पारंपरिक गुटनिरपेक्षता से अलग, एक ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ रणनीति का संकेत है.
भारत न तो खुलकर किसी एक पक्ष के साथ खड़ा दिखता है और न ही पूरी तरह तटस्थ रहता है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों (ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा) को प्राथमिकता देता है. यही वजह है कि 'मिडिल ईस्ट क्राइसिस' भारत के लिए सिर्फ कूटनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट पावर’ के तौर पर खुद को स्थापित करने का अवसर भी बनता गया है. इस मसले पर प्रोफेसर संगीत रागी ने स्टेट मिरर के प्रतिनिधि से बातचीत में क्या कहा, समझें उन्हीं की भाषा में.
दरअसल, संगीत रागी दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में प्रोफेसर और संध विचारक हैं. वह नेशनल और इंटरनेशनल मसलों पर बेबाक अपनी बात रखते हैं. उन्होंने यह पूछने पर कि क्या मिडिल ईस्ट वॉर के बीच ‘न्यूट्रल इंडिया’ ‘Power Player Bhaarat’ बन गया? इसके जवाब में में कहा, "पॉवर प्लेयर' जैसी कोई बात नहीं है. गुटनिरपेक्ष भारत और आज के भारत में अंतर है. हमारा स्टैंड साफ है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद नहीं होना चाहिए."
उन्होंने आगे कहा, "अगर कोई देश स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर कब्जा कर ले तो स्ट्रेट ऑफ मलक्का पर भी कोई जरूरत पड़ने पर वैसा ही कर सकता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर कब्जा इंडिया को स्वीकार नहीं है."
PM के स्टेटमेंट से साफ है, भारत किसके साथ?
आरएसएस विचारक संगीत रागी के अनुसार, इस मसले पर लोकसभा और राज्यसभा में पीएम मोदी अपना स्टैंड रख चुके हैं. पीएम ने कहा है कि ईरान जो दावा कर रहा है, वो हमें स्वीकार नहीं है. दूसरी बात भारत स्पष्ट तौर पर कह रहा है कि मिडिल ईस्ट में कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब व अन्य देशों में अमेरिकी एनर्जी और न्यूक्लियर बेसेज होने के बावजूद सिविलियन ठिकानों पर बमवारी नहीं होनी चाहिए.
रागी के मुताबिक, मजेदार बात यह है कि इस मसले पर ईरान की ओर से किए गए हमले पर तो वह बोले, पर इजरायल ने जो किया, उस पर कुछ नहीं बोला. ये जरूर कहा कि कहीं नागरिकों की जानमाल की क्षति नहीं होनी चाहिए. इस बयान का मतलब यह है कि भारत मिडिल ईस्ट वार में सऊदी अरब, यूएई, कतर, इजरायल व अमेरिका के साथ खड़ा है, लेकिन इसे पॉवर प्ले के रूप में नहीं लिया जा सकता.
अमेरिकी 'बॉसिज्म' पर भारत की राय क्या?
हां, भारत अमेरिकी 'बॉसिज्म' के साथ भी नहीं खड़ा है. चूंकि, अमेरिका का कोई विरोध नहीं कर रहा है. न रसिया और न ही चीन. इसलिए भारत भी चुप है. ऐसा इसलिए कि अपने राष्ट्रीय हितों की भारत भी अनदेखी नहीं करना चाहता.
नैतिकता के लिहाज से तो अमेरिका की भी आलोचना होनी चाहिए. क्योंकि अमेरिका 'बॉसिज्म' दिखा रहा है. किसी देश के मामले में न केवल दखल दे रहा है, बल्कि वह संप्रभुता का हनन भी कर रहा है. फिर भी अमेरिका के खिलाफ बयान देकर भारत उसे नाराज क्यों करे? न तो यूएई, सऊदी अरब अरब या खाड़ी व मिडिल ईस्ट के अन्य देश चाहते हैं कि ईरान न्यूक्लियर पॉवर न बने. कमोवेश भारत भी इसी राय के पक्ष में है.
फिर ऐसी बात भी नहीं है कि ईरान ने भारत का साथ दिया हो. राजा पहलवी के शासनकाल से ही बात करें तो न तो उसने 1971 में, न ही कश्मीर मसले पर न ही उसके बाद भारत का साथ दिया. अयातुल्लाह खामेनेई कश्मीर पर भी भारत के पक्ष में कभी नहीं रहे. उन्होंने यहां तक कहा था कि मुसलमान एकजुट हो जाएं तो कश्मीर इंडिया हो ही नहीं सकता. ऐसे में भारत क्यों खामखाह अपने राष्ट्रीय हितों की बलि दे.
यहां पर इस बात का जिक्र कर दें कि कभी गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) का प्रतीक माना जाता था भारत. आज बहु-आयामी कूटनीति (Multi-Alignment) के जरिए एक “पावर प्लेयर” के रूप में उभरता दिख रहा है. सवाल यह है कि क्या मल्टी अलाइनमेंट वाला यह बदलाव वास्तविक है या सिर्फ धारणा? आइए इसे सात महत्वपूर्ण प्रश्नों के जरिए समझते हैं.
1. क्या ‘गुटनिरपेक्ष भारत’ अब अप्रासंगिक हो चुकी है?
शीत युद्ध के दौर में Non-Aligned Movement (NAM) के संस्थापक देशों में शामिल भारत ने खुद को अमेरिका और सोवियत संघ जैसे ध्रुवों से दूर रखा. देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू की नीति का मूल उद्देश्य था - रणनीतिक स्वतंत्रता. लेकिन आज का वैश्विक परिदृश्य बदल चुका है. अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच भारत पूरी तरह ‘न्यूट्रल’ नहीं रह सकता. भारत अब किसी एक गुट से दूरी बनाकर नहीं, बल्कि कई शक्तियों के साथ संबंध बनाकर अपने हित साध रहा है. इसलिए ‘गुटनिरपेक्षता’ अब ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ में बदल गई है.
2. क्या भारत की ‘Multi-Alignment’ रणनीति उसे ताकतवर बना रही है?
आज भारत एक साथ कई वैश्विक मंचों पर सक्रिय है. जैसे चतुष्पक्षीय सुरक्षा संवाद (QUAD) में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ, तो दूसरी ओर BRICS और Shanghai Cooperation Organisation (SCO) में चीन और रूस के साथ. यह संतुलन दिखाता है कि भारत किसी एक ध्रुव पर निर्भर नहीं है. यह ‘Multi-Alignment’ भारत को एक लचीली और प्रभावशाली शक्ति बनाता है, जहां वह अपने हितों के अनुसार साझेदारी चुन सकता है. अब नाटो के साथ भी भारत की नजदीकी बढ़ी है.
3. क्या रूस-यूक्रेन युद्ध ने भारत की नई विदेश नीति को उजागर किया?
Russia-Ukraine War के दौरान भारत ने खुलकर किसी पक्ष का समर्थन नहीं किया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में कई बार तटस्थ रुख अपनाया. एक ओर भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदा, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक रिश्ते बनाए रखे. इस संतुलन ने यह साबित किया कि भारत अब नैतिकता के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है.
4. क्या ‘Global South’ की आवाज बनकर भारत अपनी सॉफ्ट पावर बढ़ा रहा है?
भारत ने खुद को विकासशील देशों की आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है. G20 Summit 2023 की मेजबानी के दौरान भारत ने Global South के मुद्दों - कर्ज संकट, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा - को प्रमुखता दी. इसके अलावा वैक्सीन डिप्लोमेसी, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI मॉडल) और मानवीय सहायता के जरिए भारत ने अपनी सॉफ्ट पावर को मजबूत किया है. इससे भारत एक जिम्मेदार और भरोसेमंद वैश्विक नेता के रूप में उभरा है.
5. चीन के बढ़ते प्रभाव ने भारत को ‘Power Player’ बनने पर मजबूर किया?
China के बढ़ते वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव, खासकर Belt and Road Initiative (BRI), ने भारत के लिए रणनीतिक चुनौती पैदा की है. Galwan Valley clash के बाद भारत ने अपनी विदेश और सुरक्षा नीति को और आक्रामक बनाया. QUAD में सक्रियता, इंडो-पैसिफिक रणनीति और पड़ोसी देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाना - ये सभी कदम भारत को ‘रिएक्टिव’ से ‘प्रोएक्टिव’ बना रहे हैं.
6. आर्थिक और सैन्य ताकत ने भारत की कूटनीति को नया आयाम दिया?
भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और रक्षा क्षेत्र में भी तेजी से आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है. आईएमएफ (IMF) के आंकड़ों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है. इसके साथ ही रक्षा निर्यात और रणनीतिक साझेदारी (जैसे फ्रांस से राफेल डील) ने भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत किया है. आर्थिक शक्ति और सैन्य क्षमता मिलकर कूटनीति को प्रभावी बनाते हैं - और यही भारत के ‘Power Player’ बनने की नींव है.
7. क्या ‘Neutral’ से ‘Power Player’ बनने में कोई जोखिम भी हैं?
जहां एक ओर भारत की नई विदेश नीति उसे वैश्विक मंच पर ताकतवर बना रही है, वहीं इसके कुछ जोखिम भी हैं: अमेरिका और रूस दोनों के साथ संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. चीन के साथ तनाव कभी भी बढ़ सकता है. ‘Global South’ की अपेक्षाओं पर खरा उतरना आसान नहीं. इसके अलावा, अगर भारत बहुत ज्यादा ‘Power Politics’ में उलझता है, तो उसकी पारंपरिक नैतिक छवि को नुकसान पहुंच सकता है.
क्या है मल्टी-अलाइनमेंट पॉलिसी?
पीएम नरेंद्र मोदी की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति का मतलब है - एक साथ कई वैश्विक शक्तियों के साथ रणनीतिक रिश्ते बनाना, बिना किसी एक गुट में बंधे. भारत आज QUAD में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ काम करता है,तो BRICS और (SCO) में चीन-रूस के साथ भी जुड़ा है. इसका उद्देश्य है - राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए हर मंच का लाभ उठाना. यह नीति लचीली, व्यावहारिक और परिणाम-आधारित कूटनीति को दर्शाती है, जहां भारत वैश्विक शक्ति संतुलन में सक्रिय भूमिका निभाता है.
भारत की गुट निरपेक्षता (Non-Alignment) क्या है?
भारत की गुट निरपेक्षता नीति शीत युद्ध के दौर में Jawaharlal Nehru के नेतृत्व में शुरू हुई, जिसका उद्देश्य था.अमेरिका और सोवियत संघ जैसे शक्तिशाली गुटों से दूरी बनाकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना. Non-Aligned Movement (NAM) के जरिए भारत ने यह संदेश दिया कि वह किसी सैन्य या राजनीतिक ब्लॉक का हिस्सा नहीं बनेगा. इस नीति का मूल आधार था. शांति, संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता. गुट निरपेक्षता ने भारत को वैश्विक स्तर पर नैतिक नेतृत्व और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की.
बदलाव असली है या सिर्फ धारणा?
भारत की विदेश नीति में आया बदलाव सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक है. ‘Neutral India’ अब पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन वह अब एक निष्क्रिय तटस्थता नहीं, बल्कि सक्रिय रणनीतिक स्वायत्तता में बदल चुका है. आज भारत न तो किसी का ‘Follower’ है और न ही पूरी तरह ‘Neutral’. वह एक ऐसा ‘Power Player’ बन रहा है, जो अपने हितों के अनुसार वैश्विक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है. आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस संतुलन को कितनी कुशलता से बनाए रख पाता है, क्योंकि असली परीक्षा यहीं है.