BMC Results 2026: ये हैं ठाकरे ब्रदर्स के हार के 10 बड़े कारण, पहली बार मुंबई को मिलेगा भाजपा का मेयर

बीएमसी चुनाव 2026 के नतीजों ने साफ कर दिया कि उद्धव और राज ठाकरे का गठबंधन मुंबई में असरदार साबित नहीं हो सका. मराठी मानुष पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता, बहुसांस्कृतिक वोट बैंक की अनदेखी, एमएनएस की ध्रुवीकरण वाली राजनीति और विकास के मुद्दों से दूरी ठाकरे ब्रदर्स पर भारी पड़ी. बीजेपी-शिंदे गुट ने इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक स्थिरता को मुद्दा बनाकर बढ़त हासिल की. नतीजों के साथ ही मुंबई में पहली बार भाजपा के नेतृत्व वाला प्रशासन बनता दिख रहा है.;

By :  सागर द्विवेदी
Updated On : 16 Jan 2026 11:29 PM IST

मुंबई बीएमसी चुनाव 2026 के परिणाम ने यह साफ कर दिया है कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का गठबंधन जमीन पर वैसा असर नहीं दिखा सका, जैसा उम्मीद की जा रही थी. एशिया के सबसे अमीर नगर निगम के चुनाव में 'मराठी मानुष' का कार्ड इस बार खास कमाल नहीं कर पाया और इसका सीधा नुकसान ठाकरे ब्रदर्स को उठाना पड़ा.

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, शिवसेना (यूबीटी) जहां 66 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, वहीं राज ठाकरे की एमएनएस सिर्फ 9 सीटों तक सिमटती नजर आ रही है. नतीजे यह इशारा कर रहे हैं कि भावनात्मक गठबंधन का दांव उद्धव ठाकरे पर उल्टा पड़ गया. 2026 का बीएमसी चुनाव ठाकरे बंधुओं की रणनीतिक चूकों को बेनकाब करता दिख रहा है. इसी के साथ आइए खबर में जानते हैं ठाकरे ब्रदर्स के फेल होने के 10 बड़े कारण.

1. सिंगल बास्केट ब्लंडर

एक कहावत है कि अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखने चाहिए. लेकिन ठाकरे ब्रदर्स ने पूरी चुनावी रणनीति मराठी वोटर्स पर केंद्रित कर दी. सिर्फ एक समुदाय पर फोकस करने की वजह से मुंबई के बाकी वर्गों ने खुद को अलग-थलग महसूस किया और गठबंधन से दूरी बना ली.

2. महानगर की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करना

मुंबई बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक शहर है. भले ही मराठी वोट करीब 35% हों, लेकिन वे अकेले सत्ता दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. बाकी 65% आबादी को एमएनएस की उकसावे वाली राजनीति ने असहज कर दिया.

3. बाकी मुंबई का गणित बिगड़ गया

मुंबई में लगभग 22% उत्तर भारतीय, 20% मुस्लिम और 18% गुजराती-मारवाड़ी समुदाय हैं. यही वर्ग मिलकर हार-जीत तय करते हैं. राज ठाकरे के प्रति झुकाव दिखाकर उद्धव ठाकरे इन बड़े वोट बैंक समूहों के निशाने पर आ गए.

4. धर्मनिरपेक्ष छवि का नुकसान

एमवीए (महा विकास अघाड़ी) के दौर में उद्धव ठाकरे की पहचान एक उदार और समावेशी नेता की थी. लेकिन राज ठाकरे से हाथ मिलाने के बाद यह छवि कमजोर पड़ी और लोगों में कट्टरता का संदेश गया.

5. लाउडस्पीकर विवाद की पुरानी टीस

मस्जिदों के लाउडस्पीकर को लेकर राज ठाकरे का आक्रामक रुख 20% मुस्लिम मतदाताओं के लिए आज भी एक बड़ा मुद्दा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उद्धव का साथ देने वाले कई मुस्लिम वोटर्स एमएनएस से गठबंधन को पचा नहीं सके.

6. उत्तर-दक्षिण विभाजन की यादें ताजा

उत्तर और दक्षिण भारतीयों को लेकर एमएनएस का पुराना रवैया किसी से छिपा नहीं है. उद्धव ठाकरे के साथ राज ठाकरे का गठबंधन होते ही इन समुदायों की पुरानी आशंकाएं फिर से जाग गईं.

7. पहचान बनाम विकास की लड़ाई

जहां ठाकरे ब्रदर्स ने ‘मराठी गौरव’ को मुद्दा बनाया, वहीं बीजेपी-शिंदे गुट ने इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क, पानी, पुनर्विकास और लोकल ट्रांसपोर्ट जैसे मुद्दों पर फोकस किया. समझदार वोटर्स ने विकास को प्राथमिकता दी.

8. एमवीए का पुराना जादू गायब

2024 के आम चुनावों में यूबीटी-कांग्रेस-एनसीपी की तिकड़ी ने मुंबई में दम दिखाया था. लेकिन इस बार कांग्रेस की समावेशी राजनीति की जगह एमएनएस का ध्रुवीकरण वाला ब्रांड आ गया, जो मतदाताओं को रास नहीं आया.

9. बीजेपी विरोधी वोटों का बंटवारा

यूबीटी और एमएनएस के साथ आने से कांग्रेस को अकेले मैदान में उतरना पड़ा. इससे बहुकोणीय मुकाबले बने और विपक्षी वोट बंट गए. इसका सीधा फायदा बीजेपी और शिंदे शिवसेना को मिला.

10. रणनीतिक आत्मघाती गोल

अंकगणित के बजाय खून के रिश्ते को तरजीह देकर उद्धव ठाकरे ने भले ही पारिवारिक मोर्चे पर मजबूती दिखाई, लेकिन राजनीतिक रूप से मुंबई का बड़ा वोट बैंक गंवा दिया.

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